बुंदेलखंड की सांस्कृतिक धरोहर का डिजिटल संग्रह
बुंदेलखंड विश्वकोश

आधुनिक काल (1911-1986 ई.)

ईसाई मिशनरियों और अंग्रेज विद्वानों के लोकसाहित्य-सम्बन्धी महत्त्वपूर्ण कार्य से प्रेरित होकर बंगाल, बिहार, गुजरात आदि प्रदेशों में सर्वेक्षण और संग्रह का कार्य 20वीं शती के दूसरे दशक से प्रारम्भ हुआ था। (1929  ई.) से आधुनिक काल का प्रवेश माना जाता है। जहाँ तक लोकनाट्यों का सम्बन्ध है, उनकी आधुनिकता के दो पक्ष बुन्देली प्रदेश मे मिलते हैं।1. सृजन की परम्परा और, 2. मंचन के प्रयोग।

सृजन-परम्परा का क्रमबद्ध अनुशीलन प्रस्तुत करना तो कठिन है, पर उदाहरण के तौर पर  टीकमगढ़-महारानी बृषभान-कुँवरि का सम्भ्रम मानलीला (1914  ई.) से स्पष्ट है कि दूसरे दशक मे ही लोकनाट्यों का सृजन प्रारम्भ हो गया था। रामरसिक कवयित्रियों ने जहाँ विभिन्न प्रकार के लोकगीतों की रचना की थी, वहाँ लीलापरक लोकनाट्यों का उद्भव हुआ। 

बिजावर महारानी का श्री युगल विरहलीला रहस रासपद्धति का लीला-लोकनाट्य है। ऐसे लोकनाट्य सिर्फ पद्यबद्ध होते हैं, इसलिए उन्हें लोकगीतिनाट्य कहना ठीक होगा। आधुनिक परिवेश और समाज की समस्याओं पर स्वाँग और नौटंकियाँ अधिक लिखे गए। आजादी के पहले के मंचन-प्रयोग परम्परित थे, पर बाद की नवीनता और मौलिकता के नाम पर विकृतियों के प्रतीक। लोकमंच में नए वैशिष्ट्य की तलाश लोकनाट्यों के प्रति आत्मीयता का रिश्ता कायम करने से ही होगी।

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