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अन्य ठाकुर कवि

अन्य ठाकुर कवि

साहित्य के इतिहास में ‘ठाकुर’ नाम के तीन अन्य कवियों का उल्लेख आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने किया है। जिसमें से दो असनी वाले ब्रह्मभट्ट थे और तीसरे ठाकुर बुन्देलीखण्डी थे। तीनों रीतिकालीन कवि रहे। इनका कविवर ‘ठाकुर प्रसाद’ के काव्य से तुलनात्मक दृगदर्शन संक्षेप में करने से इनके विषय में ज्ञानवर्द्धन किया जा सकता है और कविवर ‘ठाकुर प्रसाद’ के काव्य का निरुपण भी सम्भव हो सकेगा।

प्रथम ठाकुर

असनी निवासी थे और इनका जन्म सं. १७०० वि. के लगभग माना जाता है। आपके काव्य का दृगदर्शन उनकी इस रचना से देखने को मिल सकता है-

           “वोरे रसालन की चढ़ि डारन कूकत क्वैलिया मौन गहै ना।

           ठाकुर कुंजन कुंजन गुंजत भौरन भीर चुपैबो चहै ना।

           सीतल मंद सुगन्धित वीर, समीर लगेतन धीर रहैना।

           व्याकुल कीन्हों वसंत बनाय के, जाय के कंत सो कोऊ कहैना।

     इसमें रीतिकालीन काव्य-रस का रस-प्लावन बहुत सुन्दर है।”

दूसरे ठाकुर

आपका जन्म असनी में सं. १८४० वि. में हुआ था। आप रीतिकाल के उत्तरार्द्ध के काव्य के कवि है। यही इनकी इस रचना में देखने को मिलता है।

           “प्रात भुकाभुकि में पछपाय कै गागर लै घर ते निकरीती।

           जान परी न कितीकअवार है जाय परी जहँ होरी धरीती।

           ‘ठाकुर’ दौरे परे मोहि देखि कै भागि बचीरी, बड़ी सुघरीती।

           वीर की सो जो कि पार न देउ तौ मै होरिहारन हाथ परीती।”

    

इस में रीतिकालीन काव्य की छाप स्पष्ट देखने को मिलती है। किन्तु उपरोक्त दोनों ठाकुर कवियों से तीसरे बुन्देली ‘ठाकुर’ का काव्य अलग है।

ठाकुर कवि

यह तीसरे ‘ठाकुर’ कवि बुंदेलखंड निवासी थे। आपका जन्म सं. १८२२ वि. में ओरछा के एक कायस्थ परिवार में हुआ था आपके विषय में आगे विस्तृत चर्चा की गई है। यहाँ मात्र एक रचना का दृगदर्शन करिये। जिसमें कवि अपने विषय में कहता है कि-

           “ठाकुर कहत हम बैरी वेवकूफन के,

           जालिम दमाद है अदेनिया ससुर के।

           चोरन के चोर रस भोजन के पात साहि,

           ‘ठाकुर’ कहावत पै चाकर चतुर के।”

 इस प्रकार कविवर ‘ठाकुरप्रसाद’ और अन्य तीन ‘ठाकुर’ कवियों के परिचय और काव्य से स्पष्ट हो जाता है कि ‘ठाकुर प्रसाद’ बुन्देली-काव्य के कवि थे और इनका काव्य भी बुन्देली सौष्ठव की छवि लिये हुये है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने अपने हिन्दी साहित्य के इतिहास में तीन ठाकुर कवियों का उल्लेख किया है। उनमें से तीसरे ‘ठाकुर’ कवि को आपने बुंदेलखंड का कवि बताया है। किन्तु कविवर पं. ठाकुरदास ‘ठाकुर’ पर किसी की दृष्टि न पड़ना एक आश्चर्य की बात है। तीसरे ‘ठाकुर’ का नाम ‘ठाकुर दास’ है किन्तु इनका जन्म ओरछा के कायस्थ परिवार में हुआ था। जबकि कवि ठाकुरदास का जन्म गढ़कुंडार में ब्राह्मण कुल के पं. हाथीराज के प्रसिद्ध परिवार में हुआ था। आपके परिवार को ओरछा नरेश द्वारा बड़ा आदर और मान-सम्मान दिया जाता था। जनश्रुति के अनुसार जब पं. हाथीराज ज्योतिषी राजा के बुलावे पर जाते थे तो पालकी में बैठ कर जाते जिसे दस कहार आगे और ग्यारह कहार पीछे सम्भलते थे।

इस चौथे ठाकुर को लगभग १२५ वर्ष की आयु तक जीवित रहने की चर्चा ग्राम वासियों में प्रचलित है। यह सब कवि की चौथी पीढ़ी के विद्धान कवि एवं साहित्य मनीषी जिनका जन्म गढ़-कुड़ार में हुआ श्री राजाराम तिवारी से ज्ञात हुआ। आप स्वयं वयोवृद्ध है और अपनी स्मृति से इस कुल-कवि के विषय में जानकारी रखते है। अतः कवि पं. ‘ठाकुरदास’ विषयक जानकारी प्रामाणिक मानी जानी चाहिये। आपने यह भी वताया कि कवि ‘ठाकुरदास’ का कविता-साहित्य उन्हें ग्राम उवौरा के वरुआ द्वारा प्राप्त हुआ। इस प्रकार इस कवि का काव्य ‘मुखरित’ रूप में अज्ञात रहा। जिसे ‘बुन्देली भाषा-साहित्य के इतिहास’ में सर्वप्रथम लेखक द्वारा खोज कर सही स्थान प्राप्त कराना उनके काव्य-गौरव को प्रतिष्ठा प्रदान करना माना जाना चाहिए।

तीसरे ठाकुर के ‘ठाकुर ठसक’ के काव्य में बुन्देली ठसक है तो कविवर ठाकुर दास की कविता में ठेठ वुन्देली की खनक और भाषा में बुन्देली विचारों की भनक स्पष्ट परिलक्षित होती है। अतः पं. ‘ठाकुरदास’ कवि अपने रीति कालीन बुन्देली कवियों से विलक्षण, अतुलनीय और विलग है। अतःबुंदेलखंड का यह कवि और इनके समग्र साहित्य को प्रकाश में लाने का दायित्वपूर्ण कार्य करना अभी अभीष्ट है। बुंदेलखंड के दोनों ठाकुर कवियों में तुलना करने पर कुछ सत्य स्थापित किये जा सकते है-

एक रुपता  –  (१) दोनों बुंदेलखंड के निवासी है।

                  (२) दोनों ने बुन्देली-भाषा को काव्य का आधार बनाया।

                  (३) दोनों राज दरबारी कवि रहे। राज-श्लाघा गान किया।

भिन्नता  –   (१) ‘ठाकुर दास’ का जन्म गढ़-कुण्डार और दूसरे का ओरछा हुआ।

               (२) एक कायस्थ कुल में तो दूसरे का ब्राह्मण कुल में जन्म हुआ।

             (३) एक हिम्मत बहादुर और दूसरे भगवन्त सिंह के दरवारी कवि रहे और दोनों ने अपने-अपने राज्याश्रितों की श्लाघा काव्य बनाये।

               (४) एक ठाकुर ने अपने काव्य परिचय में अपना जन्म स्थान कुड़ार दिया है।

               (५) एक कवि के पिता का नाम गुलाब राय और दूसरे के पिता का नाम पं. हाथीराज था।

               (६) एक कवि की भाषा बुन्देली मिश्रित है तो दूसरे की बुन्देली है।

कवि ठाकुरदास के जन्म-काल की प्रमाणिकता ओरछा नरेश महाराज भगवंत सिंघ के शासन काल सं. १७४१ वि. से. सं. १७४६ वि. (ओरछा का इतिहास) और कवि-कुल के आधारों से सिद्ध होती है। कहते है कि बालमुकुन्द की लड़की रामकुंवर ११० वर्ष की आयु में सन् १९४७ ई. में दिवंगत हुई थी। इस प्रकार बालमुकुन्द का जन्म सन् १८२७ ई० वनता है। बेनी की आयु लगभग ६० वर्ष और  श्री ठाकुरदास की आयु १२५ वर्ष बताई गई है। इस प्रकार उनका सम्भावित जन्म वर्ष लगभग सन् १६६५ ई. और सं. १७२२ वि. के आस-पास सम्भावित है। आपके विषय में विस्तृत शोध कर अन्य तथ्यों को प्रकट करना शोधार्थियों का कार्य है।

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