पता – डॉ. महेन्द्र की गली दतिया गेट, झाँसी (उ.प्र.)
शिक्षा – पी-एच.डी.
सेवा निवृत्त – चिकित्सा विभाग
उपन्यास – लोक-परलोक (अप्रकाशित)
खण्डकाव्य – झाँसी रचना परित्याग , रानी गणेश कुँवरि
काव्य संग्रह – ओस बिन्दु , विन्ध्याचल की छाँव में
समीक्षा – गीता गोविन्द
डॉ. डी.पी. खरे पारदर्शी का अप्रकाशित उपन्यास “लोक-परलोक” पारिवारिक द्वन्द्वों का दस्तावेज है। जिसमें पति-पत्नी के बीच के कलह से ‘इहलोक ही समस्या ग्रस्त है तो परलोक की बात करना व्यर्थ है। उपन्यासकार डॉ. खरे ने अपने इस उपन्यास में समाज को यह संदेश दिया है कि लोक जीवन में सुधार ही परलोक में स्वर्ग प्राप्त करने की बात सोचना चाहिये। उपन्यास की भाषा सरल, सम्वाद पात्रानुसार गठित हैं। उपन्यासकार ने इहलोक को सँवारने का संदेश समाज को दिया है।