स्वातत्र्योत्तर काल के उत्तरार्द्ध में समाज के बुनियादी परिवर्तनों का ध्रुवीकरण सा होने लगा। जिसमें शिक्षा के वृहद् प्रकाश में परिवार की संरचना के बीज अंकुरित हो पल्लवित होने से व्यक्ति के परिवेश, विनिवेश, राजनीतिक व सांस्कृतिक एवं संस्कारों के विभिन्न क्षेत्रों में टूटते-बिगड़ते नये प्रेम-प्रसंगों के अनुबन्ध सृजित हुये। इन सब आधारों को समेटे पं. राम स्वरूप पाण्डेय का साहित्य सृजन अनुपम है। जो आपके लिखे उपन्यास “जल बिन मीन पियासी’ में परिलक्षित होता है।