उपन्यास – राजधानी में आठ दिन , हीरा पड़ा बाजार में
व्यंग्य – शहर बन्द क्यों है , बचिये भभूत गिर रही है
कहानी संग्रह – रक्तदान , हर दिन अकाल , लकीर
सुबोध कुमार श्रीवास्तव स्वतंत्रता काल के साहित्यकार हैं। अतएव आपके लेखन में युग-काल के सुधार, ‘हीरों की गिरती साख’ का अच्छा चित्रण किया है। आपने अपने सशक्त व्यंग्यवाणों से ‘बन्द शहर’ भभूतिया अन्धविश्वासों पर प्रहार किये हैं। इसके साथ समाज-सुधार की संचेतना की बात कही है।