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बुन्देली व्यंजन की ऐतिहासिकता और वैज्ञानिकता

personडॉ. प्रेमलता नीलम sourceस्रोत: बुंदेलखंड के व्यंजन की वैज्ञानिकता

लेखिका की कलम से..

बुन्देलखण्ड संस्कृति, संस्कार, रीतिरिवाज, लोक बोली भाषा, लोकाभूषण, लोक वस्त्राभरण, वीर सपूतों का समृद्ध जनपदीय क्षेत्र है । किसी भी देश प्रान्त नगर, गाँव की लोक संस्कृति एवं परम्परा को वहाँ की वेश-भूषा, रहन-सहन, खान-पान बोली से पहचाना जाता है । प्रत्येक जनपद के लोक जीवन एवं संस्कृति में अंतर होता है । चाहे मालवा हो, छत्तीसगढ़ हो, बघेली, ब्रज, राजस्थानी, पंजाबी, गुजराती, तमिल, तेलुगू या मराठी, अवधि, मैथिल क्षेत्र हो इन सभी क्षेत्रों में बोली भाषा के साथ-साथ, खान-पान अर्थात व्यंजनों में अंतर होता है । बुन्देलखण्ड की लोक संस्कृति से जुड़े व्यंजन अर्थात् भोजन, पेय पदार्थों अन्य क्षेत्रों की तरह रूचिकर स्वादिष्ट एवं पौष्टिक हैं । प्रत्येक जनपद की निजलोक व्यापी संस्कृति है जिसे इतिहास के पन्नों पर पढ़ा व समझाया गया है। कुछ शिलालेखों से ज्ञात हुआ है। बुन्देलखण्ड का प्राचीनतम् पुराना इतिहास है । हर्षवर्द्धन (606-47 ई.) के पश्चात् चंदेल काल, तोमर काल, बुन्देलकाल, पुनरूत्थान युग तथा आधुनिक युग बीसवीं सदी के शतक से वर्तमान काल तक, बुन्देलखण्ड की लोक संस्कृति में लोकगीत, लोक साहित्य, लोक पहनावा, लोकनृत्य, लोक देवी देवता और लोक आभूषण, लोक व्यंजन का महत्वपूर्ण स्थान रहा है और आज भी है। व्यंजन ने वैज्ञानिक दृष्टि से प्रमुख स्थान स्थापित किया है जिस प्रकार अन्य प्रांतों के भोज में विशिष्ट व्यंजनों का प्रधानता होती है वैसी है। बुन्देलखण्ड में त्यौहारों तथा वैवाहिक अवसरों पर विशेष व्यंजनों को आवश्यक रूप से तैयार कर समूह भोज में अर्थात "पंगत' में परोसा जाता है जैसे “बरा”, “कढ़ी”, “चना दाल”, “लुचई (पुड़ी)" बुन्देलखण्ड में दो प्रकार के भोजन की परम्परा है- (1) कच्चा भोजन जिसमें दाल चॉवल, रोटी सब्जी, कढ़ी, बरा, अचार, पापड़, सलाद, चटनी (2) पक्का भोजन-सब्जियाँ रसीली सूखी पुड़ी पापड़ अचार, हलुआ, खीर या मीठा में अन्य मिष्ठान, बुँदी का रायता आदि । इसे समूदी रोटी (भोजन) भी कहते हैं । अन्य व्यंजन समयानुसार प्रचलन में है । "गकरियाँ" सभी वर्ग का प्रिय व्यंजन है । मालपुआ शाही व्यंजन है किन्तु सभी वर्ग समाज में "पुआ' के नाम से पकाया जाता है । पुआ मीठा व्यंजन है । खड़बरा, बिड़ई (पूरनपुड़ी) किसी भी समय इच्छानुसार भोजन में लिया जाता है । ये व्यंजन पौष्टिकता से युक्त होते हैं। बुन्देली संस्कृति की कुछ मान्यताएँ जो पहचानी जाती और जीवनोद्देश्य जीवनादर्शलोकाचार के अंतर्गत आती है। खान-पान से जनपदीय पहचान होती है । बुन्देलखण्ड में एक प्रचलित कहावत है जिसे लोक कवियों ने अभिव्यक्त किया है

"मउआ मेवा बेर कलेवा,
गुलगुच बड़ी मिठाई ।
इतनी चीजें चाहो तो
गुड़ाने करो सगाई ।"

मउआ (महुआ) बेर का कलेबा अर्थात नाशता गुलचुच मउआ का पका फल है जो मीठा होता है। बुन्देलखण्ड गोंडवाना की पहचान है। महुआ की सर्वाधिक उपज इसी जनपद में होती है। महुआ हलषष्टी व्रत में पूज्यनीय है । खेतीहर कृषक, श्रमिक वर्ग, मजदूर वर्ग, गकरियाँ का उपयोग अधिक करते हैं इससे उन्हें पौष्टिकता मिलती है ऊर्जा-शक्ति में वृद्धि होती है कार्यक्षमता के लिए पर्याप्त कैलोरी प्राप्त होती है ।

"चली मूढ़ पे धरे टुकनियाँ
जा में धरीं भरता और गकरियाँ ।
चलीं ठुमकीली चाल,
लयें हाथन में गगरियां ।

किसान की पत्नि गकरियों का व्यंजन लेकर खेत पर जाती है। भोजन में पोषक तत्वों का समावेश हो तो शरीर हस्टपुष्ट होता है । लोककवि ने कहा है !

"कपड़ा पैरे जग भाता, व्यंजन खायें मन भाता ।
पोषक तत्व मिलें भोजन में निरोग काया पा जाता ।”

व्यक्ति के स्वस्थ्य होने की पहचान है संतुलित आहार । बुन्देलखण्ड के व्यंजन रूचिकर होते हैं, पर कब और किस व्यंजन को खाया जाये, किस व्यंजन को नहीं ! लोक मान्यता है जो लोकहितार्थ भी है । शरीर की सुन्दर कद-काठी इसकी पहचान है। वैसे तो लोकविश्वास बदलते रहते हैं फिर कुछ परम्परागत लोक मान्यताएँ मानना आवश्यक है ! जो समाज के हित में है । भोजन के सम्बंध में लोक मान्यताएँ इस प्रकार है -

"चैत मीठी चीमरी, वैशाख मीठो मठा,
जेठ मीठी डूबरी, आसाढ़ मीठे लटा,
सावन मीठी डूबरी, खाँड़ भादो भुंजे चना ।
क्वार मीठी कॉकरी ल्याव कोरी टोरकें,
कातिक मीठी कुदई, दही डारो मोर कें ।
आगहन खाओ जूनरी भुरो नीबू जोर कें ।
माद्य मीठे पोंडा बेर फागुन होरा वाले,
समै-समै की मीठी चीजें सुगर खवैया खाबे ।
इन बातन खॉ जो न जानै सो जनम पछताबे ।"

कुछ व्यंजन समयानुसार लाभदायक हैं कुछ व्यंजन मौसम के अनुसार वर्जित भी हैं जैसे….

"चैत गुर बैसाखै तेल जेठे मउआ आसाढ़े बेल
सावन भाजी-भादो मही क्वॉर करेला कातिक दही
अघनै जीरो पूसै धना, मावै मिसरी फागुन चना
इतनी चीजें खैहों सभी मरहौं नई तो पर हो सही ।"

भोजन संबंधी से मान्यताएँ अनुभव के आधार पर सही मान्य की गई है । जैसे पुराना पान और नया घी सौभाग्य से ही प्राप्त होते है ऐसी मान्यता लोक प्रचलित है । बुन्देली कहावत में इस प्रकार कहा गया है -

"पान पुराने घी नओ उर कुलवंती नार ।
जे तीनइं तब पाइये जब प्रसन्न करतार ||"

भोजन संबंधी अनेकों मान्यताएँ हैं जिसे वार्णित करना लोक हितार्थ है । भोजन संबंधी त्रुटियों में सुधार हो सके । भोजन के पहिले बेर और भोजन के बाद गन्ना का सेवन लाभदायक स्वास्थ्य वर्धक होता है। भूख में भुने चना भी चिरौंजी का स्वाद देते हैं चना में प्रोटीन होता है । सयानों ने कहा है "जो पर्चे सो खावैं रूचे सो बोले ।" खाद्य सामग्री में कुछ सब्जियाँ कच्ची भोजन में सेवन की जाती है लेकिन सभी नहीं ! सलाद में शामिल है गाजर, ककड़ी, पत्ता गोभी, मूली, शलजम, पालक, प्याज, हरी मिर्च, धनियाँ पत्ती । हृदय रोगियों को लौकी का कच्चा रस लाभदायक है । शक्कर की बीमारी वालों को करेला का रस आवश्यक रूप से पीना चाहिए । आर्योवेद में बतलाया है शक्कर की मात्रा घटती बढ़ती हो तब भिण्डी धोकर काटे और पानी डालकर वह पानी पियें डायबिटीज नियंत्रित होती है । उक्त सब्जियों के अतिरिक्त कच्ची सब्जियों को भोजन में वर्जित है । द्विदल धान्य में गेहूँ चना, हरा मटर, मूँग खड़ी दाल, अंकुरित कर खाने से पोषक तत्व शरीर को मिलते हैं । बुन्देलखण्ड में हरा चने को बूंट कहते हैं इन्हें खाने से प्रोटीन प्राप्ति होती है पर आग से भूँजकर इसी बूँट को "होरा" कहते हैं खाने में सोंदापन होता है पर पौष्टिकता समाप्त हो जाती है। इसी प्रकार मक्का के दाने से युक्त बॉल को "भुन्टा" कहते हैं। इसे भी भूँज कर नमक मिर्च, नींबूरस लगाकर खाने का प्रचलन है खाने में आनंद की प्राप्ति तो होता लेकिन पौष्टिक तत्वहीन हो जाता है। अधिक पौष्टिक तत्व तेज ताप में नष्ट हो जाते हैं ऐसा शोध से ज्ञात हुआ है। "होरा" या "भुन्टा' मौसम पर ही इस्तेमाल किए जाते हैं यदि समयावधि के पश्चात् भोजन में प्रयोग किया तब अपच के आसार दृष्टिगोचर होते हैं । कच्चे चावल की कनी गले की नोक की तरह हानिकारक होती है अतः पेट संबंधी विकार होते हैं । भोजन संबंधी जानकारी बहुत जरूरी हैं । अतः मनुष्य को स्वस्थ प्रसन्न रहने के लिए संतुलित आहार लेना चाहिए । “समस्त पौष्टिक तत्वों से युक्त भोजन को संतुलित आहार कहते हैं ।" वानस्पतिक और प्राणीञ्य भोज्य पदार्थों में पौष्टिक तत्व होते हैं । वनस्पति के अंतर्गत सभी प्रकार के अन्न, फल, सब्जियाँ, कंदूल फल, मेवा आदि प्राणी जगत् से दूध, दूध से बने पदार्थ जैसे दही मठा, मक्खन, पनीर, घी, समस्त वसायुक्त खाद्य सामग्री ! पोषकता युक्त भेजन के मानव

शरीर में निम्न कार्य हैं -

1) शरीर की वृद्धि करना ।
2) शरीर को ऊर्जा प्रदान करना ।
3) रोग रोधन क्षमता उत्पन्न करना ।
4) शरीर की कोशिकाओं की टूट-फूट की पूर्ति करना तथा नव ऊतक का निर्माण करना ।
5) शरीर को हष्ट-पुष्ट सुन्दर सुडौल बनाना ।

मनुष्य के भोजन की अनियमितता से शरीर कमजोर हो जाता है । कुपोषण का शिकार होता है विविध रोगों से ग्रस्त हो जाता है । बुन्देली कहावतें शिक्षाप्रद हैं जिसे-"जैसो खाओ अन्न, ऊँसई भओ मन ।" शारीरिक और मानसिक गतिविधियों पर इसका प्रभाव पड़ता है । वृद्ध सयाने कहते हैं, "हम खबै नई जिअत, हम जीवेखाँ खाउत है ।" भारतीय गृहिणी रसोई तैयार करने में निपुण होती है । रसोई रस से परिपूर्ण होती है उसे रसदार रसोई कहते हैं। कहावत है, जीकौ खाइये मतवा, ऊकौ गाइये गितवा ।" अर्थात जिसके द्वारा पकाया हुआ अन्न खायें उसकी सराहना करें। भोजन के पौष्टिक तत्व छः होते हैं - (1) प्रोटीन (2) कार्बोहाइड्रेट (3) वसा (4) खनिज लावण (5) विटामिन्स (जीवन सत्व) (6) जल । शारीरिक रचना में जल की मात्रा 90 प्रतिशत होती है । बुन्देली लोक संस्कृति में भोजन के बाद पानी पीने की शिक्षा भी दी है । पहिली शिक्षा यह भोजन के बाद एक-दो घण्टे बाद पर्याप्त पानी पिएं, तत्पश्चात् प्रति घण्टे के बाद पानी का सेवन करें। गाँव-गाँव में आदर्श कुएँ राजा महाराजाओं ने निर्मित करवाये थे ताकि जन मानस को शुद्ध जल मिले । अशुद्ध जल से अनेकों जीवाणुओं का जन्म होता है इसलिए पुराने जमाने में कुआँ बाबरी के नजदीक पेड़ पौधा नहीं हुआ करते थे। पीने के पानी का कुँआ चारों तरफ से बँधा होता था ऊपर से शेड होता था जाली से आच्छादित होता था । गंदी नालियाँ कुआँ से दूर होती थीं । आज के परिवेश में जलशोधन की बहुत पद्धतियाँ विज्ञान द्वारा संचालित हैं जिससे शुद्ध जल मिल जाता है। काव्यात्मक संदेश यह कहता है ।।…..

"जैसो अनजल खाइये तैसोई मन होय ।
जैसो पानी पीजिए, तैंसी बानी होय ।।

भोजन पकाते समय तथा भोजन गृहण करते समय साफ स्वच्छ जल का प्रयोग करना चाहिए यह लोक हित में है। सब्जियाँ काटने के पहिले साफ पानी से धोयें ताकि जीवजन्तु पके भोजन में न मिल सकें। बर्तनों का रखरखाव प्रचीन काल में बड़े तौर तरीके से किया जाता था । दाल, कढ़ी, सब्जी, चॉवल मिट्टी के बर्तनों में पकाया जाता था । दूध मिट्टी के बर्तन में उबाला जाता था इन बर्तनों में स्वच्छता, सोंदापन होता था इसे "हड़िया' कहते थे । ये कई बनक-ठनक की होती थी । भारतीय खाद्य संरक्षण संविधान के आधार पर बुन्देलखण्ड में भी खाद्य सामग्री का संरक्षण किया जाता था जिससे भोजन की सामग्री सुरक्षित होती थी, जीवाणुओं से बचाव के बहुत रसायनिक उपाय अपनाये जाते थे ! धीरे-धीरे विज्ञान की उपलब्धियों के हाथ लम्बे होते गये जिसमें सुविधाएँ प्राप्त होने लगी ।

कुछ विद्वानों ने इसकी भी चर्चा की है कि प्रागैतिहासिक युग में आदिमानव माँस खाता था जिसे सामुहिक आखेट से प्राप्त करते थे। परन्तु आखेट युग के पहिले मानव फल-फूल पत्तों का ही भोजन करता था । आदिमानव को भोजन, पेय पदार्थ और वस्त्रों का ज्ञान ही नहीं था । इतिहास के अनुसार रामायण काल महाभारत काल में शाकाहारी भोजन प्रचलित था । चॉवल के बने विविध व्यंजन, कई प्रकार की चटनी मधुर पेय के अतिरिक्त दूध, दही, मठा, मक्खन, पनीर, घी जैसे शक्ति दायक पदार्थ भोजन में ग्रहण किए जाते थे । इस काल की एक विशेषता थी जिसका अन्न खाते थे उस पर हथियार नहीं चलाते थे । समाज को जो बड़ा भोज देता था उसका सम्मान होता था । भोजन में पोषक तत्वों को सम्मिलित किया जाता था इसलिए इस काल में भयानक रोग नहीं होते थे । हरी सब्जियों का प्रयोग होता था ।

मौर्य शुंगकाल में महाभारत काल की तरह दूध, से बने पौष्टिक भोजन का प्रचलन था पोषक युक्त खाद्य सामग्री का संरक्षण किया जाता था जिसे खान-पान उपयोग किया जाता था । जिससे शारीरिक सौष्ठव को बढ़ाता था । जनपदों में वनों की अधिकता होने के कारण वनों से प्राप्त शहद जंगली फल कन्दमूल आदि भोजन में सम्मिलित थे । "हर्षकाल" और "कादम्बरी' में किया है । साठी चॉवल तंडुल, आटा, सत्तू, जंगली कंदफल और पशुओं का शिकार उनका आहार था सम्पूर्ण पोषक तत्व और विटामिन का समावेश भोजन में होता था । अतः हर्षकाल का आहार श्रेष्ठतम था जिससे जनमानस का जीवन सुख समृद्धि से युक्त था। इसके बाद चंदेल काल- बुन्देलखण्ड की सुख समृद्धि का काल रहा है इसलिए इस काल में आहार में विविधता और सम्पन्नता दिखाई देती है । खाद्य सामग्री की उपज इस काल में उन्नत थी अतः कृषक वर्ग उच्च श्रेणी में स्थान पाते थे । इसकी खेती से प्राप्त गेहूं, चॉवल, चना, जौ, मक्का आदि से निर्मित पकवान पशुओं से प्राप्त दूध, दही मठा और दूध से बने मिष्ठान पदार्थ वनोपज से प्राप्त कंदफल तथा जलाश्यों से प्राप्त कमल ककड़ी कमल गट्टे सिंघाड़े आदि । गन्ने ईश से बने राब, गुड़ शक्कर और उनसे बने रसीले व्यंजन तथा अनेक प्रकार की सब्जियाँ विटामिन सी, कैल्शियम, खनिज लवण से भरपूर थी, उस समय मिलावट नहीं होती थी । पौष्टिकता से युक्त भोजन शक्तिदायक बताने में समर्थ्य था। इस काल में बौद्ध जैन धर्म द्वारा माँस-भक्षण पर नियंत्रण किया गया था, सुरा पान भी वर्जित था । किन्तु सामान्य क्षत्रिया और सामंत भी मद्यपान करते थे । "अहो सुरायाः सौंदर्यमद्य" कहकर मद्यपान करते थे। यह सुरा स्वास्थ्य वर्धक होती थी, वर्तमान परिपेक्ष्य जैसी भयावह स्थिति नहीं होती थी । सम्पूर्ण दिन के क्रियाकलाप के पश्चात् स्वातः सुखाय हेतु उपयोग किया जाता था। फलों के रस ज्यादा प्रचलित थे जो सौंदर्यवर्धक भी थे । तोमर काल में विविधता पाई गई जैसे बरा-बरी लपसी, कसार, सेव, लड्डू, मोती चूर के लड्डू घेवर (मैदा, घी, चीनी से बनी मिठाई) लुचई (पुड़ी) खाजे (खजूर मैदा से बने पदार्थ) फेंनी, गूझा, दहोरी (दही से बनी वस्तुएं) बिढ़ई, दाल मूँग, मसूर, उड़द, चना दाल आटे और चावल से बने व्यंजन । मॉड़े-रोटी, कढ़ी, पकौड़ी, समोसा, बड़े गूझा, (रंगों और विविध चित्रों से सुसज्जित) बड़े गुझा विवाह के समय बेटा-बेटी की ससुराल बनाकर टिपारे में रखे जाते थे । यह प्रथा आज भी है। बुन्देल खण्ड की लोक संस्कृति में रचे पके हैं बुन्देली व्यंजन इससे सम्बंधों में मिठास आती है। जैस पक्यात् और विवाह पर "पंगत' में देने वाला भोज रिश्तों को मजबूत बनाता है। यह बुन्देली संस्कृति का परिचायक भी है । पछयावर (दही या छाछ का बना मधुर पेय है जो भोजन के बाद लिया जाता है।) सिखिरिन अर्थात श्रीखण्ड (दही, केशर, शक्कर, गरी का बना हुआ भोज्य पदार्थ है ।) श्री खण्ड महाराष्ट्र में भी प्रचलित है प्राचीन काल में एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश की संस्कृति से मेल खाते हैं जैसे "सिखिरिन" बुन्देल का व्यंजन है महाराष्ट्र में इसी को " श्रीखण्ड” कहते हैं। गुजरात के 'खमन' ढोकला बुन्देलखण्ड की "बफोरी" है खाद्य सामग्री वही है पकाने की विधि वही होती है । तोमर काल में मठा का सेवन, नमक, जीरा, हींग से निर्मित पेय बहुतायत प्रचलित था । बासौंधी (खोबा दूध से मिश्रित सुंगधित दूध) दूध सम्पूर्ण आहार है । समस्त पौष्टिक तत्व पाये पाये जाते हैं दूध-दूध से बने व्यंजन से शारीरिक विकास होता है । शक्ति दायक होता है । रोग रोधक क्षमता बढ़ाता है। दूध का प्रयोग बहुत प्रकार से किया जाता है जैसे हल्दी दूध, चिरौंजी इलायची दूध, सौंठ दूध बादाम केशर दूध, पिस्ता दूध आदि । इन पेय पदार्थों को सभी वर्ग के लोग उपयोग करते थे। आज भी पौष्टिक पेय के अंतर्गत है

जिससे सभी आयु वर्ग के लिए लाभदायक है। बुन्देलखण्ड में "आम का पना" पेय पदार्थ के रूप में सर्वाधिक प्रचलित है। गर्मी के मौसम में इसे पिया जाता है इससे लू से बचा जा सकता है। इसी प्रकार इमली का पका हुआ फल पेय के उपयोग में लिया जाता था । आम और इमली का पना गुड़, शक्कर, जीरा के मिश्रण से तैयार किया जाता है। इनमें से कुछ व्यंजन लुप्त हो गये हैं। कुछ मौजूद हैं। तोमर काल सुख सम्पदा से युक्त रहा है। बुन्देल काल-16वीं, 17वीं शती से भक्ति का जोर था तुलसी, केशव, हरिराम ब्याज की रचनाओं का अध्ययन इस काल में बहुचर्चित रहा है। इन कवियों की रचनाओं में जेवनार गीत का उल्लेख मिला है । जिसमें दाल (चने की), भात (चॉवल), कढ़ी, बरा, मगौरा, पापर, कोंच कचरियां, बिजौरा, खाँड, घी, मांडे मिर्च चूर्ण और आम का अचार भोजन में रखे जाते थे । जिसे समूंदी रोटी भी कहा जाता था । मिर्जापुरी मॉड़े की जगह पर लुचई (पुड़ी) का उपयोग होने लगा साथ में तरकारी एवं लप्सी का चलन आरम्भ हुआ । रसोई दो प्रकार की प्रचलित हुई (1) कच्ची (2) पक्की । कच्ची रोटी अर्थात् समूंदी रोटी । पक्की रसोई में पुड़ी, कचौड़ी पपरिया, खाजे, विरकारी मालपुआ, लडुआ, मोहन भोग, खीर, खुरमी । इस काल में गुड़ आटा एवं खस-खस से निर्मित पुआ का प्रचलन अधिक था, विविध चटनी तथा रायता बुंदी, ककड़ी, लौकी का तैयार किया जाता है, रायता खाने के अंत में जरूर पिया जाता है। जिससे सम्पूर्ण भोजन पाचनशील हो जाता है खाना की पत्तल में खाड़ (शक्कर) अनिवार्यत: परोसा जाता था सामूहिक भोज (पंगत, ज्योनार) में आज भी प्रचलित हैं । कलेवा अर्थात नाशता में गर्म जलेबी, दूध, दूध का हलुआ कचौड़ी, समोसा, भजिया, मगौड़ा का चलन था । ब्यारी (रात्रिभोज) से पक्की रसोई के बाद दूध का प्रयोग किया जाता था । गांव में महुआ से बने मुरका, लटा और डुबरी, भुने चना, जबा, गेहूं से बना सत्तू बेर से बना बिरचुन, गुड़ से पगे गेहूं की गिरधारी तथा गुड़ में पगे बेसन के सेब मिष्ठान के रूप में बड़ी रूचि के साथ खाये जाते थे । महेरी, लपसी, मीड़ा, लपटा, अमघोरा, चना भाजी के दर भजिया रूचि अनुसार भोजन में सम्मिलत थे । इनमें से कुछ आज भी चलन में है । भोजन के पश्चात् बुन्देलखण्ड में बीड़ा खाने का रिवाज रहा है जो आज भी प्रचलन में है। इस काल में राजदरबारों में राजमहल में (बीड़ा रखने का पात्र) पानदान रखे जाते थे

जिसमें सम्पूर्ण पान मसाले होते थे, पान पत्ता कत्था सुपाड़ी चूना लौंग इलायची जायपत्ती पिपरमेंट और तम्बाखू अलग रखी जाती थी । इसका उद्देश्य होता था भोजन के बाद पानी एक घण्टा बाद पिया जाता है इस दौरान पान का स्वाद बना रहना, मुख सम्बंधी विकारों को दूर करना, दाँतो, जबड़ा, जिव्हा का व्यायाम होना । चूना के माध्यम से दाँतों को कैल्शियम मिला । मुख में छाले यदि है तो कत्था के माध्यम से ठीक होता है। पान पत्ता का उत्पादन महोबा बाँदा में अधिक है। पान मुख सौंदर्य का प्रसाधन भी है। वर्तमान में पान का उपयोग कई प्रकार के पान मसालों के साथ किया जाता है। प्राचीन काल में मान-सम्मान का मुख्य साधन था पान अब मुख रोग दूर नहीं होते बल्कि मुख रोगों की उत्पत्ति होती है। इसलिए पान चूना, कत्था, सुपाड़ी लौंग इलायची पिपरमेंट, जायपत्ती के साथ चबाकर रसास्वादन लेना चाहिए बजारू पान मसाले हानिकारक होते हैं । वर्तमान में बीड़ा का उपयोग कई प्रकार के नाम से तम्बाकूनुमा मसालों का चलन हो गया है जिससे अनेकों मुख संबंधी रोग जन्म लेते हैं मात्र मुख ही नहीं आंतरिक अंगों में श्वास एवं फेंफड़े, पाचन प्रणाली प्रभावित होती है। श्रेष्ठ यह है कि हम अपनी प्राचीन परम्पराओं से जुड़े और जीवन को स्वस्थ्य आनंदमयी बनायें ।

बुन्देली व्यंजन का महत्व एवं कार्यों को जानना आवश्यक है।

बुन्देली आहार का महत्व एवं परिभाषा - आहार एवं पोषण, मानव की तीन आवश्यकताएँ हैं। रोटी, कपड़ा, मकान इनमें से रोटी अर्थात भोजन मानव की प्रथम आवश्यकता है। किसी भी मशीनरी को चलाने के लिए ईंधन की आवश्यकता होती है, जैसे मोटर, गाड़ियों के लिए पेट्रोल, डीजल की तथा रेल इंजन के लिए कोयला या विद्युत ऊर्जा की उसी तरह मानव शरीर भोजन सीगी ईंधन अथवा ऊर्जा की आवश्यकता पड़ती है बिना ऊर्जा (ईंधन) के शरीर निरंतर सुचारू रूप से नहीं चल सकता । शरीर को निरंतर क्रियाशील बनाए रखने के लिए नवीन कोशिकाओं के निर्माण के लिए आवश्यक ऊर्जा भोजन द्वारा शरीर को मिलती है। फ्रूड न्यूट्रेशन के विद्वानों ने भोजन को परिभाषित करते हुए लिखा है ।

"भोजन व खाद्य पदार्थ है जो जीवित शरीर में जीवन प्रदान करने की क्षमता रखता है" अर्थात् भोजन वह खाद्य पदार्थ है जिसका शरीर में सात्मीकरण या अवशोषण होने के बाद ऐसे पदार्थों की वृद्धि हो सके जो मानव जीवन निर्वाह तथा बीमारी से प्रतिरोध करने में सक्षम हो।"
मनुष्य के सभी जैविक कार्य जैसे-श्वसन, उत्सर्जन, पाचन, अवशोषण, प्रजनन के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है। यह ऊर्जा उसे भोजन से ही प्राप्त होती है। शरीर को स्वस्थ्य रखने के लिए आवश्यक पौष्टिक तत्व भोजन से ही प्राप्त होते हैं। भोजन पाचन के बाद, भोजन रस विसरण द्वारा रूधिर में मिल जाता है एवं रूधिर (रक्त) के द्वारा यह भोजन रस शरीर के विभिन्न अंगों, ऊतकों एवं कोशिकाओं तक पहुँचाया जाता है। इन कोशिकाओं में इसका दहन होता है और ऊर्जा प्राप्त होती है जो शरीर के विभिन्न कार्यों को पूरा करने में सहायक होती है। यह ऊर्जा शरीर का एक निश्चित तापक्रम बनाए रखने में भी सहायक होती है मानव शरीर में विभिन्न जैविक क्रियाओं के फलस्वरूप, कोशिकाएँ टूटती फूटती रहती हैं। भोजन द्वारा शरीर में नई कोशिकाओं का निर्माण होता है, शरीर को ऊर्जा, शक्ति मिलती है। रोगाणु से लड़ने की क्षमता विकसित होती है । अतः शरीर की टूट-फूट और रोग रोधक क्षमता उत्पन्न करने के लिए सम्पूर्ण भोजन में तत्व प्रोटीन कार्बोहाइड्रेड, खनिज लवण, वसा, विटामिन्स, जल उचित मात्रा में होना आवश्यक है । बुन्देलखण्डी व्यंजन (भोज्य पदार्थ) में सभी पोषक तत्व पाये जाते हैं। मौसम के अनुसार आहार आयोजन पर ध्यान दिया जावे तो समयानुसार सभी तत्वों की प्राप्ति होती है । आवश्यकता है विभिन्न व्यंजनों को समझने की। बुन्देली व्यंजन, लिंग, आयु, स्वास्थ्य, क्रियाशीलता, मौसम, जलवायु तथा विशेष शारीरिक अवस्थानुसार भोज्य में लेना चाहिए पोषण विशेषज्ञों के अनुसार भोजन का इतिहास इस प्रकार से ज्ञात हुआ ।

कई शताब्दियों से मानव शरीर में भोजन का भौतिक एवं रासायनिक परिवर्तन तथा प्रभाव के बारे में जानकारी प्राप्त करने का इच्छुक था किन्तु तब इसका वैज्ञानिक दृष्टिकोण न होकर अंधविश्वास से परिपूर्ण था । सर्वप्रथम 370 ईसा पूर्व ग्रीक चिकित्सक हिपोकिट्स ने पहली बार भोजन को पाचन क्रिया को वैज्ञानिक दृष्टि से देखने का प्रयत्न किया था । इसके पश्चात् खोजों का सिलसिला शुरू हो गया ।

1743-1793 फ्रांस के लेवोजियर ने यह खोज निकाला कि भोजन के पाचन के लिए ऑक्सीजन की जरूरत है एवं पाचन के बाद भोजन ऊर्जा में बदल जाता है। 1897 में वैज्ञानिक अटवाटर ने व्यक्ति के आहार का विश्लेषण करके पोषण तत्वों का मूल्य ज्ञात किया। सन् 1911 में भारतीय अनुसन्धान समिति का उदय हुआ पोषक सलाहकारों ने पहली बार जन स्वास्थ्य के सम्बंध में अनुसंधान शुरू हुआ। इसी श्रृंखला में 1945 में आहार एवं कृषि स्वास्थ्य संगठन (F.A.O.) और यूनीसेफ की स्थापना हुई 1948 में विश्व स्वास्थ्य संगठन की स्थापना हुई तथा 1950 में भारत के मैसूर शहर में केन्द्रीय आहार एवं तकनीकि अनुसंधान शिक्षण केन्द्र (C.F.T.-R.I.) की स्थापना हुई । इन अनुसंधान केन्द्रों ने यह सिद्ध किया कि जो आहार हम करते हैं उसका हमारे बाह्य एवं आन्तरिक विकास पर कैसा प्रभाव पड़ता है एवं शरीरिक स्वास्थ्य के लिए उचित पौष्टिक तत्वों का भोजन होना अत्यंत आवश्यक है । अतः उक्त अनुसंधान से ज्ञात हुआ कि हमारे बुन्देलखण्ड के राजा-महाराजा, जन समूह जो भोजन करते थे वह अनुकूल था इसलिए उस समय भीषण तबाही भयानक रोगों का उत्पात नहीं था जैसा आज है। 7, 8वीं सदी का आहार क्रमशः मानवीकृत आहार का रूप लेता गया और जनमानस विविध तीज त्यौहार रीति रिवाज के अनुसार आहार पोषण में अनुभवी होता चला गया । बुन्देल खण्ड ने वीर योद्धाओं को जन्म दिया और स्वास्थ्य की दृष्टि से शक्तिशाली, वीर पुरूष की श्रेणी में स्थापित हुये इसका कारण था बुन्देलखण्ड का व्यंजन कंदमूल फल से लेकर द्विदल धान्य, वास से निर्मित भोजन से ऊर्जा को प्राप्त किया गया ।

उत्तम स्वास्थ्य के लिए पोषण शिक्षा का ज्ञान होना आवश्यक है दैनिक चर्या में इतना पोषक तत्व युक्त आहार हो कि यदि तीन-चार घण्टे भूख भी लगे तो आंतरिक अंगों को पूर्व आहार की पूर्ति से संतुलन बना रहे। अज्ञानता वश मात्र उदर की भूख मिटाने से व्यक्ति किसी न किसी बीमारी का शिकार हो जाता है । क्योंकि उसकी रोग रोधक क्षमता घट जाती है। बुन्देलखण्ड का व्यक्ति मेहनत कश है । शरीरिक, मानसिक रूप से क्रियाशील होता है। आहार आयोजना में आयुवर्ग के अनुसार नवजात शिशु से लेकर गर्भवती महिला, स्तनपान कराने वाली महिला, किशोर-किशोरी आहार-व्यवस्था वृद्ध एवं रोगी आहार तथा श्रमिक वर्ग में महिला एवं पुरूष के आहार में कैलोरी की पर्याप्त आवश्यकता पर विशेष ध्यान दिया जाता है। रसोई बनाते समय यह ध्यान रखा जाता है कि परिवार में किस व्यक्ति को कैसा व्यंजन देना है । यह सम्पूर्ण कार्यभार भोजन पकाने वाले रसोइये का होता है । बुन्देली व्यंजन में अतिथि सत्कार का भोजन, रोगी का भोजन, बच्चों का भोजन, त्यौहारों का भोजन, सामान्य दिनचर्या का भोजन पर विशेष महत्व दिया गया है । आवश्यकता है व्यंजन की पौष्टिकता का ज्ञान होना । यदि पौष्टिक तत्वों का ज्ञान नहीं है ऐसी स्थिति में अज्ञानतावश विभिन्न बीमारियों का शिकार होना पड़ता है । जैसे विटामिन “ए” की कमी से रतौंदी रोग हो (आँखों संबंधी) जाता है। विटामिन 'बी' की कमी से बेरी बेरी रोग हो जाता है। विटामिन 'सी' की कमी से स्कर्बी रोग, विटामिन 'डी' की कमी से रोगों को जन्म मिलता है । प्रोटीन, कार्बोज, वसा, खनिज लवण, जल पर्याप्त मात्रा में लेना चाहिए जिससे काया निरोगी बनी रहती है ।

शरीर को पूर्ण स्वास्थ्य रखने के लिए निम्न खाद्य पदार्थ शामिल किए जाते हैं । ऊर्जा या कैलोरी आपूर्ति

अनाज - चॉवल, गेहूँ, ज्वार, बाजरा, मक्का, चना से निर्मित खाद्य पदार्थ ।
कंदमूल - आलू, सूरना, सकला, मुहावरी, चुकंदर, मूली, गाजर
प्रोटीन की आपूर्ति - दालें सभी प्रकार की चना दाल, मटर फलियाँ सोयाबीन, जौ, मूंगफली, बादाम
दूध से बने पदार्थ - दूध सम्पूर्ण आहार है, पनीर, दही, मठा, दूध से बने सभी भोज्य पदार्थ
कैलोरी आपूर्ति - वनस्पति तेल, घी, मक्खन, चीन, शहद, गुड़, जैम, जैली ।

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