प्रत्येक क्षेत्र प्रत्येक प्रांत में रोटी का प्रचलन है बिना रोटी अर्थात चपाती के भोजन पूर्ण नहीं होता अंतर इतना है कहीं तबा रोटी कहीं कायला की रोटी कहीं तंदूरी रोटी कहीं रूमाली रोटी इच्छानुसार होती है इतना ही नहीं प्राचीन काल में लकड़ी के चूल्हे पर, कोयले की सिगड़ी पर, कण्डे की अंगीठी पर सेंकी जाती थी जो स्वादिष्ट होती थी धीरे-धीरे स्टोव जो मिट्टी तेल से जलता था उपयोग में आया आज वर्तमान में गैस चूल्हा ही शेष रहा किन्तु जो आंनद लकड़ी के चूल्हा में था वह अन्य में नहीं । रोटी सर्वाधिक प्रचलित है वह भी गेहूं के आटा की । जो आग से सम्पर्क में होने के बावजूद पौष्टिकता से युक्त है ।
खाद्य सामग्री - गेहूँ का आटा परिवार के सदस्यों की संख्यानुसार, आवश्यकतानुसार खाने का नमक ।
विधि - आटा गहरी थाली में रखें नमक डालें आटा के मध्य में अर्थात बीच में गड्डा कर पानी डालें । आस-पास से आटा समेटते हुये गूँथले । हथेली की मुट्ठी बनाकर गूँथते जायें अर्थात माढ़ते जायें । इखट्टा कर बीस मिनट को फूलने रख दें तत्पश्चात् पुनः गुमकी देकर माढ़ लेवे रोटी का जैसा आकार छोटा-बड़ा देना हो उसी अनुसार लोई बनायें और पाट पर रखकर बेलन पर बेल देवें । चूल्हे पर तबा या कयला रखकर गर्म करें फिर बिली हुई रोटी उस पर डाल दें दो मिनिट बाद पलट दें दो मिनिट बाद आग पर सेंके । फूलते ही रोटी को अलटा पलटा कर थाली में परोसें। दाल, सब्जी, कढ़ी किसी भी व्यंजन में खावें रूचिकर है ।
पौष्टिक तत्व - गेहूँ में - प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट
नमक - आयोडीन