तोमर काल, चन्देलकाल एवं बुन्देलकाल में छुआरा का उपयोग विभिन्न प्रकार से किया गया । यह फल की श्रेणी में आता है । बगीचा में उत्पादन होता है । छुआरा अर्थात पिण्ड खजूर सूख जाने पर पिण्ड खजूर ही छुआरा कहलाता है। फल के बाद मेवा की श्रेणी में प्रचलित हो जाता है पिण्ड खजूर गर्म तासीर का होता है ठण्ड में उत्पादन होता है इसके खाने में शीत कम होती है -
" पिण्ड खजूर-सर्दी दूर ”
लोक कवि ने कहा है -
"पिण्डखजूर खायें, ठण्ड खॉ भगायें ।
ईके खयें से वैद्य के घर कबऊँ नई जायें ||”
जिस प्रकार के अंगूर के सुखाने पर किशमिश का रूप मेवा की श्रेणी में आता है वैसा ही पिण्डखजूर बुन्देलखण्ड का 'छुआरा" कहलाता है इसे कच्चा-पका दोनों प्रकार से भोजन में उपयोग किया जाता है। यह शाही व्यंजन के रूप में जाना गया है। सामग्री
पिण्ड खजूर एक पाव, काली मिर्च दाना दो, जीरा, धनिया पत्ती, नमक थोड़ा |
विधि - खजूर को पानी से धोयें, छीलकर गुठली निकाल लेवें, काली मिर्च, धनियां, जीरा लोड़ा से महीन पीसें थोड़ा नमक मिलावें । लीजिए चटनी तैयार । पुड़ी, पराठा तथा भोजन की थाली में परोंसे । यह चटनी ज्यादा स्वादिष्ट एवं भोजन को रूचिकर बनाती है पौष्टिक होती है ।
पौष्टिकता - पिण्ड खजूर अथवा छुआरा में कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, वसा की मात्रा होती है। जीरा, काली मिर्च में खनिज लवण हरी धनिया में विटामिन 'सी' ।
उपरोक्त चटनियाँ व्यंजन के स्वाद को चौगुना करती है दैनिक आहार तालिका के आयोजन में सन्तुलित आहार में पौष्टिक तत्व युक्त होती हैं। भोजन को रूचिकर बनाती हैं जो स्वास्थ्यवर्धक हैं ।
सम्पूर्ण बुन्देली व्यंजन पौष्टिक तत्वों से युक्त हैं। बुन्देलखण्ड की जलवायु के अनुरूप है। मौसम के अनुसार वर्जित भी है । वैज्ञानिक दृष्टिकोण से परिपूर्ण हैं बुन्देली व्यंजन । व्यंजनों का अध्ययन आवश्यक है। समझाना जरूरी है। संतुलित आहार वर्ग विशेष को कितना लेना जरूरी है यह आहार तालिका के अनुसार समझा जा सकता है । प्रत्येक आयु वर्ग एवं कामकाज के अनुसार कैलोरी की कितनी आवश्यकता है । यह उक्त तालिका से विदित होता है । कभी-कभी, संतुलित आहार के अनुरूप न चलकर वही आहार सुपोषण के स्थान पर कुपोषण सिद्ध होता है बुन्देलखण्ड के जनमानस अब जागरूक हैं इसलिए कुपोषण के शिकार नहीं होंगे । शिक्षा पद्धति से पच-अपच का अर्थ समझा जाता है । बुन्देलखण्ड कृषिप्रधान खण्ड है जहां समस्त उपजें विद्यमान हैं। बुन्देलखण्ड का प्रत्येक जनपद धन, धान्य, जर (जमीन) जल से समृद्ध हैं बुन्देलखण्ड के राजाओं ने प्रत्येक जनपदीय क्षेत्र में कुआँ, बावरी, ताल, तलैयाँ निर्मित की थी । वर्तमान शासन काल में भी प्रत्येक गाँव में तालाब, कुआँ का निर्माण कराया गया है। जिससे सर्वोत्तम उपज हो सके ।