बुंदेलखंड की सांस्कृतिक धरोहर का डिजिटल संग्रह
बुंदेलखंड विश्वकोश

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बुंदेलखंड की समितियां
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धर्म दर्शन एवं अध्यात्म समिति

मनुष्य एक धार्मिक प्राणी है। धार्मिक भावना उसकी अन्तरात्मा की पुकार है। धर्म जीवन का संविधान है जो व्यक्ति के व्यक्तिगत सामाजिक नैतिक तथा आध्यात्मिक कर्तव्यों की व्याख्या करके कर्तव्य पालन के लिए प्रेरित करता है। धर्म का अर्थ साम्प्रदायिक परंपराओं का निर्वाह नही बल्कि कर्तव्यपालन है। किसी सम्प्रदाय विशेष में आस्था रखना, उसकी प्रथा परिपाटी अपनाना एक समुदाय विशेष की रीति नीति हो सकती है किंतु धर्म शब्द का जिस व्यापक अर्थों में प्रयोग होना चाहिए उसे मानवीय कर्तव्यों का समन्वय ही कहा जा सकता है। धर्म मनुष्य की सर्वोपरि आवश्यकता है।दर्शन मनुष्य के सर्वोच्च लक्ष्य की विवेचना करता है। दर्शन सत्य का साक्षात्कार है। दर्शन देशकाल  परिस्थितियों से परे शाश्वत और सार्वभौम सत्यों का समीक्षात्मक विवेचन है। जीवन, जगत, प्रकृति और अदृश्य शक्तियों के स्वरूप व संबंध की व्याख्या करना दर्शन का मुख्य लक्ष्य है। तर्क-वितर्क, साक्ष्य, अनुभव और चिंतन के आधार पर सत्य का अनुसंधान ही दर्शन है । दर्शन मनुष्य का स्वाभाविक चिंतन है। सत्य के लिए सत्य की खोज का अपना मूल्य होता है। दर्शन परम सत्य को प्राप्त करने का प्रयत्न करता है। परम सत्य के साक्षात्कार में अनवरत प्रयासरत महापुरुषों के चरित्र चिन्तन और आचरण के प्रतिफल को सभी स्वीकार करते हैIभौतिकता से परे जीवन का अनुभव प्राप्त करना आध्यात्मिकता है। धर्माचरण से साधकों को सतत साधना में विभिन्न अनुभव प्राप्त होते हैं। ऋषि, मुनि, संत महात्माओं और द्रष्टा महापुरुषों के अनुभवों को कोई झुटला नही सकता। इनकी आध्यात्मिक अनुभूतियां ज्ञान की सर्वोच्च अनुभूतियां हैं। जब मनुष्य ज्ञान भक्ति और निष्काम कर्म के मार्ग में निरंतर आगे बढ़ता है यो वह एक ऐसे स्थान पर पहुंचता है जहाँ केवल आनंद ही आनंद है। इस आनंद की वह अनुभूति तो कर सकता है परन्तु उसका वर्णन नहीं कर सकता है। यही वह स्थान है जहां शब्द साथ छोड़ देते हैं। व्याख्याओं का जहां दम घुटने लगता है। जवान गूंगी हो जाती है। हमारी  इन्द्रियों ने जिन अनुभूतियों और अवलोकनों का सपना भी नही देखा उन्हें हम बता भी तो नहीं सकते। यही वह पावन और परोक्ष जगत है जहाँ विश्वासों और मात्र विश्वासों की रोशनी में सन्मार्ग नज़र आता है जो आध्यात्मिक जगत का साक्षात्कार कराता है।धर्म दर्शन और अध्यात्म समिति बुन्देखण्ड की धर्म, दर्शन और अध्यात्म परंपरा को जनसामान्य  के समक्ष लाने का प्रयास करेगी। इस  कार्य के लिए निम्न समितियों का गठन करना आवश्यक है-धार्मिक परंपरा समन्वय समितिधर्मस्थल अनुसंधान समितिधर्माचार्यों की जानकारी समितिकथावाचक जानकारी समितिसंकीर्तन मंडल की जानकारी समितिधार्मिक साहित्य लेखक समितिधर्म प्रचारक समितिधर्म, दर्शन अध्यात्म समितिप्रोफेसर जय प्रकाश शाक्यप्रभारी-अध्यक्ष-दर्शनशास्त्र अध्ययन शाला एवं शोधकेंद्रमहाराजा छत्रसाल बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय छतरपुर म.प्र.

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संस्कृति समिति

किसी देश या राष्ट्र का प्राण उसकी संस्कृति होती है। संस्कृति का अर्थ है सम्यक कृति। सम्यक् कृति मानव के सभ्यता पूर्ण आचरण तथा उसके सात्विक कर्म सौन्दर्य की द्योतक है। संस्कृति प्रगतिशील साधनाओं की विमल विभूति है, राष्ट्रीय आदर्शों की गरिमामयी मर्यादा है। मानवता की रक्षा और विकास के सभी आधारभूत सिद्धान्त इसमें भरे पड़े हैं। संस्कृति के दो स्वरूप हैं– एक लोक संस्कृति दूसरी अभिजात्य संस्कृति। लोक संस्कृति अपने क्षेत्र विशेष में अंकुरित होती है, पनपती है, फैलती है तथा पूरे क्षेत्र को संस्कारित करती है। लोक के जीवन, व्यवहार चिन्तन, कार्यकलाप, रहन–सहन रीति–रिवाज, तीज–त्यौहार, व्रत, पूजन, शिल्प कला, स्थापत्य कला तथा ललित कला सभी के समन्वित रूप का नाम संस्कृति है और बुन्देलखंड क्षेत्र के जनमानस की सोच, कार्य–व्यवहार आदि का बोध कराने वाला शब्द है बुन्देली संस्कृति। बुन्देलखंड अपनी समृद्ध साहित्यिक सांस्कृतिक परम्परा के कारण सारे संसार में प्रतिष्ठित है।बुन्देली संस्कृति समन्वयवादी है। अनेक संघर्षों के बीच से समन्वय की प्रवृत्ति इसकी विशेषता है। ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन’ के कर्म सिद्धान्त पर बुन्देली संस्कृति की आधारशिला रखी गई है। इस संस्कृति में उदारता, सहिष्णुता त्याग का भाव, उच्च आदर्श, स्वगत कर्म प्रेरणा, निस्वार्थ भाव, तप, यज्ञ तथा लौकिक जीवन से ज्यादा आध्यात्मिक जीवन को महत्त्व देने का भाव निहित है। बुन्देली संस्कृति भारत के अनेक जनपदों की लोक संस्कृतियों से प्राचीन है। बुन्देली संस्कृति का क्षेत्र विस्तार अत्यन्त व्यापक है। इसकी व्यापकता लोक जीवन के समस्त कार्य व्यापारों में दृष्टव्य होती है। यहाँ के लोगों का रहन–सहन, खानपान बनावट रहित विशुद्ध भारतीय एवं ‘सादा जीवन उच्च विचार’ की भावना ओतप्रोत है। बुन्देलखंड में पर्वों एवं त्यौहारों को मनाने का अत्यधिक प्रचलन है। लोक जीवन की सफलता के लिए ये पर्व सच्चे साथी की भूमिका निभाते हैं। इन पर्व और त्यौहारों से लोक विश्वासों को जहाँ बल मिलता है वहीं लोगों में पारस्परिक सहयोग भावना में वृद्धि भी होती है।

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मार्शल आर्ट समिति

भारत की हृदय स्थली मध्य प्रदेश जिसके मध्य में बुन्देलखंड यहाँ की संस्कृति-इतिहास, कला-शिल्प की पहचान भारत में अलग स्थान रखती है। भारत के हरेक लोकांचल की अपनी-अपनी कलायें हैं जो यहाँ की धार्मिक-सांस्कृतिक-सामाजिक गतिविधियों से जुड़ी हैं।इसी तरह से समस्त कलाओं में शस्त्रकला का एक विशिष्‍ट स्थान है। हर अंचल की शस्त्रकला अपनी परम्परागत शैली में विद्यमान है जिसकी प्रतिष्‍ठा धार्मिक अनुष्‍ठानों से लेकर सामाजिक स्तर पर देखी जा सकती है। मध्य प्रदेश के मालवा, निमाड़, वघेलखंड सभी अंचलों में खासकर धार्मिक सन्दर्भों में शस्त्रकला अखाड़े अपनी निजी अस्मिता बनाये हुए हैं। अन्य कलाओं जैसे नृत्य संगीत विविध लोक-कलाओं के साथ अखाड़ा या शस्त्रकला भी एक आवश्यक अंग है।अखाड़ा हर क्षेत्र का वह धार्मिक पवित्र स्थल है जहाँ गुुरुओं के माध्यम से प्रशिक्षार्थी विभिन्‍न अस्त्र-शस्त्रों, कुस्ती, मल्लविधा आदि का प्रशिक्षण लेते हैं और इसके माध्यम से समाज का एक ऐसा वर्ग तैयार होता है जो अपने साथ समाज की रक्षार्थ एक आवश्यक अंग होता है। अखाड़े से प्रशिक्षण प्राप्त व्यक्ति अनुशासित होने के साथ-साथ आत्म-सम्मान, शारीरिक-मानसिक रूप से अपने-आपके सबल महसूस करता है आज के आपाधापी वाले समय में भी हमारी अमूल्य धरोहर अखाड़े एवं उनकी शस्त्रकला अपने मूल रूप में बरकरार है। परम्परा की निर्वाह हेतु बुन्देलखंड की शान यह शस्त्र विद्या सप्रमाण मौजूद हैं। किसी भी तीज, त्यौहार, राष्‍ट्रीय पर्वों पर इनकी झलक देखने को मिलती है और अपनी कला-कौशल से आम दर्शकों को परिचित कराते हैं इनके प्रदर्शनकारी कला रूप देखने से यह प्रतीत होता है कि एक तरफ करने वाले का शारीरिक व्यायाम तो होता ही है उसके साथ वह शस्त्र विद्या में पारंगत भी हो जाता है। स्वयं की रक्षा के साथ समाज की रक्षा में भी इनका योगदान शामिल होता है। अखाड़ों में ढाल, तलवार, लाठी, भाला, त्रिशूल, कटार आदि का प्रमुख रूप से प्रशिक्षण दिया जाता है।इनके साथ लेजम, पटा, बनेटी, मलखम्भ, कुस्ती, पल्टी आदि भी शामिल हैं। भारतीय संस्कृति में ये अखाड़े सामाजिक और धार्मिक शोभा यात्रा में अपनी भागीदारी करते हैं। लेजम चलाने में इनके पदचालन, ढोल की ताल पर पंक्तिबद्ध एवं लयबद्ध घंटों चलते रहते हैं।हमारी संस्कृति में शक्ति उपासना का महत्त्वपूर्ण स्थान है। शस्त्र शक्ति का प्रतीक है इनकी पूजा की जाती है। पूजा करने वाले के मन मेंं पवित्रता के साथ शक्ति का संचरण भी होता है। शस्त्र पूजा में देवी के समक्ष अस्त्र-शस्त्रों का प्रदर्शन होता है। हमारे शास्त्रों में हर देवी-देवता का अपना शस्त्र है। देवी-देवता के ये प्रतीक रूप शस्त्र हमारे जीवन में लोक विश्‍वास, मिथक, रूपक, संस्कारों की पहचान देते हैं। शिव का अस्त्र त्रिशूल है, देवी का खड़क, विष्णु का सुदर्शन, श्री राम का धनुष दुर्गा का शूल– ये सभी शस्त्र हमारी मिथकीय आस्था के प्रतीक हैं। शक्ति पूजा का आशय देवी उपासना ही है शस्त्र कौशल शक्ति और कला की एक ऐसी दुनिया है जो भगवती के चरणों में अपने को समर्पित कर दे, अपनी साधना में सफल होता है।मानवीय सुरक्षा और शत्रुओं के संहार के लिए आदिम काल से शस्त्र की व्यवस्था रही। आत्मरक्षा और क्षुधा पूर्ति की आवश्यकता के साथ ही शस्त्र का उपयोग भी बढ़ा, पत्थरों के शस्त्र अस्त्रों से धातु के भस्म तक एक लम्बी ऐतिहासिक परम्परा है। आज जबकि दुनिया में न जाने वैज्ञानिक शस्त्र विकसित हो गये परन्तु भारतीय सांस्कृतिक परम्परा ने वीरता और स्वयं के शस्त्र कौशल पर से कभी भरोसा नहीं छोड़ा, जैसे झाँसी की रानी, छत्रपति शिवाजी, महाराणा प्रताप, पृथ्वीराज चौहान, महाराजा भूषण, छत्रसाल आदि अनेक उदाहरण हैं।एक विशेष अर्थ में शस्त्र कला की उपयोगिता मानवीय सुरक्षा वृत्ति की सांस्कृतिक परम्परा है। यह हमारी बुन्देली संस्कृति का अंग है। यह सांस्कृतिक परम्परा अपनी आश्‍चर्यकारी प्रदर्शन क्षमता और उपयोगिता से हमेशा जीवित रहेगी। इसके प्रति वर्तमान युवाओं में आकर्षण बढ़ रहा है। दशहरा, दीवाली, रामदल व धार्मिक उत्सव में उनका उत्साह देखा जा सकता है, आज जरूरत है कि कराटे कला के साथ इस शस्त्र कला को कठिन यथार्थ से जोड़कर उसे उपयोगी बनाया जाये। इसका अभ्यास और सफलता एक सच्ची साधना को सफल बनाना है।बुन्देलखंड में अनेक अखाड़े सक्रिय हैं, जिन्होंने भारत सरकार द्वारा आयोजित लोक-कलाओं व उत्सवों में भाग लेकर सम्मान पाया है। अपने क रतबों से जनता को चमत्कारित कर दिया है। आज संघर्षशील प्रयासों की जरूरत है। यदि हमारे युवा चाहें तो इसकी जरूरत समझ के इनके प्रशिक्षण केन्द्रों को बढ़ावा दे सकते हैं।सांस्कृतिक सन्दर्भों में जिस तरह रक्षा के लिए जूडो कराटे कला के केन्द्र सक्रिय हैं उसी प्रकार शस्त्र कला, मार्शल आर्ट के केन्द्रों को सक्रिय करके उसे सार्थकता प्रदान करें। स्त्रियाँ भी इस कला को योग्यता से सीख सकती हैं।अब समय बदल गया है और महिला कलाकारों को इस कला से अवगत होना जरूरी है। हमारी सरकार इस कला को तभी प्रोत्साहित करेगी जब हमारे युवा पीढ़ी के नौजवान उपयोगिता को समझें। सरकार को इस मार्शल आर्ट के प्रशिक्षण केन्द्रों को खोलना समय की बढ़ी जरूरत है। शस्त्रयुद्ध (मार्शल आर्ट्स) से लाभलाठी– लाठी चलाते समय व्यक्ति को चारों तरफ सतर्कता बरतनी होती है, इसमें उसकी आँखों का स्वयं ही अभ्यास हो जाता है। आँखों के अलावा उसके हाथ जिनमें लाठी होती है कई कोणों से घूमते हुए लाठी का प्रदर्शन करते हैं हाथों से पंजे, कलाई, भुजाओं का अलग-अलग तरह का अभ्यास हो जाता है। हाथ के अलावा पैरों का भी चलना उसे प्रदर्शन के अनुसार ही उठना-बैठना, झुकना आदि होता है। इस तरह से एक लाठी चलाने वाले कलाकार को पूरे शरीर के अभ्यास की आवश्यकता होती है उसमें फुर्तीलापन भी आवश्यक है।तलवार/ढाल– ढाल-तलवार में भी समस्त शरीर का अभ्यास हो जाता है। दोनों आँखें, हाथ, पैर, कमर, कन्धे, उठना, बैठना, उछलना, कूदना ये समस्त क्रियायें उसके शास्त्रों के क्रियान्वयन में अनुरूप होती जाती हैं।त्रिशूल– त्रिशूल चलाने वाले के कौशल में शारीरिक अभिनय होता है इसके साथ युद्ध का अनुसरण भी करना होता है, अपनी रक्षा शत्रु से करना है अपने को बचाये भी रखना है तो स्फूर्ति आवश्यक है। इस शस्त्र को चलाने वाला ये सब गुण रखता ही है।पटा– पटा तलवार से भी फुर्तीला होता है उसमें शारीरिक सन्तुलन की आवश्यकता होती है।कुल मिलाकर अस्त्र-शस्त्र सीखने वाला शारीरिक अभिनय में पारंगत हो जाता है। पूरे शरीर का अभ्यास हो जाता है जिनमें आँखों की भूमिका उतनी ही आवश्यक होती है जितनी समस्त शरीर की। सारा शरीर गतिशील एवं फुर्तीला बनता है मांसपेशियाँ पुष्‍ट होती हैं। हमारा शरीर स्वस्थ होगा तो मन भी स्वस्थ होगा और अखाड़े के प्रशिक्षार्थी में ये गुण स्वमेव ही आ जाते हैं। बुन्देलखंड की संस्कृति और अखाड़ा (शस्त्रकला)मानव ने जन्म लिया इसके बाद मानव-समाज का विकास हुआ तभी से मल्ल युद्ध एवं शस्त्र युद्ध का जन्म हुआ और अखाड़ा संस्कृति का भी विकास हुआ है। मानव ने सबसे पहले पत्थर के शस्त्र का प्रयोग किया था। प्राचीन काल में गुरुकुलों एवं राजा-महाराजाओं के यहाँ शस्त्र प्रशिक्षण अनिवार्य था। शस्त्र देवी शक्ति की देन है उदाहरण- रामायण महाभारत आाज भी भारतवर्ष में अखाड़ों की परम्परा चली आ रही है।भारतीय संस्कृति और कला की पहचान विश्‍व में अपना अलग-अलग स्थान रखती है। मूर्तिकला, चित्रकला, नृत्यकला, नाटककला और लोककलाओं में भी वास्तु शिल्प, मिट्टी शिल्प, काष्‍ठ शिल्प, नृत्यों में लेाक नृत्य, राई, नाच, नाचा, स्वाँग, गरवा, लावनी आदि-आदि अनेक लोक नृत्य हैं। भारत के विभिन्‍न अंचलों में अनेक तरह की कलाएँ प्रचलित हैं। विशेष धार्मिक, सांस्कृतिक, सामाजिक अनुष्‍ठानों से जुड़ी भारतीय कला बेजोड़ हैं।भारतीय कलाओं में अखाड़ा का अपना वैशिष्‍ट्‍य है, भारत के भिन्‍न-भिन्‍न अंचलों में यह कला अपनी परम्परागत शैलियों में आज भी प्रचलित है। इसकी प्रतिष्‍ठा धार्मिक अनुष्‍ठानों से लेकर सांस्कृतिक और सामाजिक स्तर तक सराहनीय रही है। सांस्कृ तिक रूपों में रामलीला के कुछ प्रसंगों में अखाड़ा की उपादेयता विशेष रही है।हमारे देश में मालवा, निमाड़, छत्तीसगढ़, बघेलखंड महाकौशल, बुन्देलखंड सभी क्षेत्रों में धार्मिक सन्दर्भों में शस्त्रकला या अखाड़े अपनी निजी अस्मिता बनाये हुए हैं। इसी क्रम में बुन्देलखंड में कुछ अधिक आवेश से अखाड़े, स्कूल अपना महत्त्व रखते हैं। नृत्य संगीत की अनेक परम्परायें जैसे सेरा, ढिमरयाई, कांडरा नृत्य, वरेदी नृत्य, जवारा नृत्य, बधाई नृत्य बमबुलिया, रैयया भक्ता प्रचलित हैं इन सभी के साथ अखाड़ा या शस्त्रकला अपनी विशिष्‍टता लिये हैं।आज के विषमता भरे समय में भी हमारे शस्त्रकला उसी योग्यता से कला में संलग्‍न है इस शस्त्रकला की प्रवीणता को कायम रखने वाले अखाड़े बुन्देलखंड की अस्मिता और शस्त्र के साक्षात् प्रमाण के रूप में मौजूद हैं।इन अखाड़ों में शस्त्र युद्ध का प्रदर्शनकारी रूप हमें मिलता है। अखाड़ों के माध्यम से हमारे ग्रामांचलों में शस्त्रकला के प्रति परम्परागत आस्था और धार्मिक विश्‍वास जीवन्त बने हुए हैं। इन अखाड़ों में युद्ध की प्राचीनकला का प्रारूप हमें मिलता है, जिसमें ढाल, तलवार, लाठी, भाला, त्रिशूल एवं कटार युद्ध इसके साथ ही महत्त्वपूर्ण हैं। लेजम नृत्य, पटा बनेटी, देश-चकरी, मलखम्भ, अधर पल्टियाँ नाल उठाना, डम्मल चलाना, मुगद्र आदि। इन सभी शस्त्रों का कुशलता से चलन अखाड़ों की विशेषता है। धार्मिक आस्थाओं को इन अखाड़ों ने बहुत महत्त्व दिया वस्तुत: भारतीय संस्कृति में अखाड़े सामाजिक और धार्मिक सन्दर्भों में अपने दल सहित शोभा यात्रा की अपनी विशेषता रखते हैं। इसमें लेजम नृत्य को शोभा यात्रा में विशेष श्रेण्ी दी गयी है, लेझम नृत्य सबसे ज्यादा महत्त्व उसके अनुशासनात्मक लय-ताल का होता है पंक्तिबद्ध होकर लोग ढोल ताल पर लेझम बजाकर करतब दिखाते हैं। लेझम नृत्य 4-5 घंटा लगातार चलता है, लेझम बजाने और उसकी लय तान का विशद् अभ्यास जरूरी होता है। शक्ति पूजा से सम्बद्ध शस्त्र पूजादेवी भगवती की उपासना पद्धति से शस्त्र पूजा जुड़ी हुई है, वस्तुत: शक्ति के प्रतीक माने जाते हैं, शक्ति पूजा का एक रूप शस्त्र-कला का देवी के सामने नमन व आंशिक प्रदर्शन के रूप में किया जाता है। शस्त्र पूजा करते हुएभारतीय सन्दर्भों में शक्ति का संकेत सभी देवी-देवताओं के प्रतीक चिह्नों से मिलता है, सभी देवी-देवताओं में शस्त्र प्रतीकों को लेकर शक्ति की एक आश्‍चर्यजनक समानता देखी गयी इसीलिए इन शस्त्र प्रतीकों का रचनात्मक वैशिष्‍ट्‍य है– इन प्रतीकों से हमारे जीवन के लोक विश्‍वास, मिथक, रूपक और संस्कारों की पहचान निर्मित होती है। चाहे शंकर का त्रिशूल हो या इन्द्र का वज्र या विष्णु का सुदर्शन चक्र हो या दुर्गा का शूल हो या तलवार सभी शक्ति की मिथकीय आस्था के प्रतीक हैं। देवियों की सृजन-शक्ति और संहार शक्ति का सामंजस्य हमारी शस्त्रकला में एक साथ मिलता है। इसी शस्त्र पूजा अप्रत्यक्ष रूप से देवी की ही उपासना का एक रूप ही है। शस्त्र कौशल शक्ति और कला की एक ऐसी दुनिया है जो भगवती के चरणों में अपने को समर्पित करके अपनी साधना में सफल होती हैं।मानवीय सुरक्षा और शत्रुओं के संहार के लिए, आदिम काल से शस्त्र की व्यवस्था रही आत्मरक्षा और सुधार पूर्ति की आवश्यकता के साथ ही शस्त्र विकसित हो गये, परन्तु भारतीय सांस्कृतिक परम्परा ने वीरता और स्वयं के शस्त्र कौशल पर कभी भरोसा नहीं छोड़ा जैसे झाँसी की रानी, छत्रपति शिवाजी, महाराणा प्रताप, पृथ्वीराज चौहान, बुन्देलखंड के महाराज छत्रसाल आदि अनेक उदाहरण हैं।भारत ग्रामों का देश है। यहाँ आज भी अपनी रक्षा के लिए अस्त्रों-शस्त्रों का ही सहारा लिया जाता है, इसीलिए आज भी बुन्देलखंड के अंचलों में लाठी चलाने वाले तलवार के करतब वाले, लेझम की लय-ताल वाले कितने आचार्य हैं जो अपने अंग से शस्त्रकला को विकास के तहत कर रहे हैं, आज भी योग्य लाठी चालक और भाला चालक सैनिक वस्त्रों का उपयोग करते हैं। पुलिस की लाठी चार्ज आज का ज्वलन्त उदाहरण है, क्योंकि यह सुलभ मितव्ययी साधन है, इसीलिए यह हमेशा एक विशेष अर्थ में शस्त्रकला की उपयोगिता मानवीय सुरक्षा वृत्ति की सांस्कृतिक परम्परा है यह हमारी बुन्देली संस्कृति का अंग है। यह सांस्कृतिक परम्परा अपनी आश्‍चर्यकारी प्रदर्शन क्षमता और उपयोगिता से हमेशा जीवित रहेगी, इसके प्रति वर्तमान युवाओं में आकर्षण बढ़ रहा है, दशहरा, दीवाली, रामदल व धार्मिक उत्सव में उनका उत्साह देखा जा सकता है, आज जरूरत है कि कराटे-कला के साथ इस शस्त्र कला को भी बढ़ावा मिले, भारतीय संस्कृति की विविध श्रेणियों ने शस्त्रकला को कठिन यथार्थ से जोड़कर उसे उपयोगी बनाया है, इसका अभ्यास और सफलता एक सच्ची साधना को सम्भव बनाना है।बुन्देलखंड में अनेक अखाड़े सक्रिय हैं, जिन्होंने भारतीय सरकार द्वारा आयोजित लोककलाओं व उत्सवों में भाग लेकर सम्मान पाया है अपने करतबों से जनता को चमत्कृत कर दिया है, आज संघर्षशील प्रयासों की जरूरत है यदि हमारे युवा चाहे तो इसकी जरूरत समझके इनके प्रशिक्षण केन्द्रों को बढ़ावा दे सकते।सांस्कृतिक सन्दर्भों में जिस तरह रक्षा के लिए जूडो कराटे कला के केन्द्रों को सक्रिय करके उसे सार्थकता प्रदान क रे। छात्रायें भी इस कला को योग्यता से सीख सकती हैं। अब समय बदल गया है और महिला कलाकारों को इस कला से अवगत होना जरूरी है, हमारी सरकार इस कला को तभी प्रोत्साहित करेगी जब हमारे युवा पीढ़ी के नौजवान उपयोगिता को समझें। सरकार को इस मार्शल आर्ट्स के प्रशिक्षण केन्द्रों को खोलना समय की बड़ी जरूरत है। शौर्य कला शारीरिक प्रदर्शन या अखाड़ा शस्त्र युद्ध(मार्शल आर्ट)इसकी शुरुआत जब से मनुष्य है, तभी से मानी जाती है सबसे पहला शस्त्र नुकीला पत्थर था। शस्त्र की उत्पत्ति दैवी शक्ति से मानी जाती है।शारीरिक प्रदर्शन के दो प्रकार होते हैं–शस्त्र युद्ध– लाठी, तलवार, ढाल, भाला, कटार, फरसा, त्रिशूल एवं अन्य प्राचीनतम शस्त्र।करतब खेल– मल्लखम्ब, जिमनास्टिक, करतब, जूडो कराटे अखाड़ा प्रदर्शनशस्त्र युद्धलाठी– यह बाँस की तनी होती है। यह प्राकृतिक या दैवी हथियार है। बाँस के पेड़ काटकर इसको तैयार किया जाता है। यह 2 फुट से 5 फुट लम्बे टुकड़ों के रूप में होती है। काटने के बाद इसको हल्की आँच से सेका जाता है। (जब तक उसका रंग हरे से कत्थई न हो जावे) ज्यादा मजबूत बनाने के लिए इसे तेल पिलाते हैं, लाठी चलाते समय निगाह सामने वाले पर पूरी तरह से जमी होनी चाहिए जिससे की उसके हाथों के मूवमेंट को देखकर हमें प्रहार का पता चल सके। इस कला में दिमाग की चंचलता और होशियारी की आवश्यकता होती है। इसके पैंतरे होते हैं जिससे लाठी द्वारा प्रहार किया या बचाया जाता है।तलवार– यह लोहे की बनी अर्द्ध चन्द्राकार होती है इसकी लम्बाई सवा 2 फुट से ढाई फुट तक होती है। तलवार का निचला सिरा धारदार होता है और दुधारग्ी तलवार में दोनों ओर धार होती है। इसके पकड़ने वाले भाग को मुठिया कहते हैं, तलवार को जंग से बचाने के लिए म्यान में रखते हैं और म्यान तलवार के आकार की होती है। यह लकड़ी की बनायी जाती है एक म्यान में एक ही तलवार रखी जाती है। यह माँ देवी का मुख्य शस्त्र है।ढाल– यह लोहे की बनी गोलाकार होती है। गोलाई में अन्दर की तरफ बीच में एक मुठिया पकड़ने के लिए लगायी जाती है। इससे किसी भी प्रकार का, प्रहार रोका जा सकता है। इसके कई प्रकार होते हैं, प्रमुख दो प्रकार हैं– गोलाकार और चौकोर।गोलाकार 10 इंच से 2 फुट तक की परिधि की होती हैं। ढाल के ऊपरी हिस्से पर चार गुट्टे होते हैं ताकि वार फिसलकर हाथ पर न लगे वहीं रुक जाये। कभी-कभी यह गुट्टे पाँच भी होते हैं।भाला– तीर का बड़ा रूप है, भाला 5 फुट से 7 फुट लम्बा होता है, यह लकड़ी का बना होता है जिस पर आगे की ओर लोहे का बना 6 इंच से डेढ़ फु ट तक पैना होता है, जो नुकीला होता है इसके दोनों ओर धार होती है आजकल इसकी मजबूती के लिए इसमें लोहे का पाइप भी लगा देते हैं। पकड़ते समय बायाँ हाथ आगे और दायाँ हाथ पीछे होता है, फना आगे की ओर होता है। इसका प्रहार बायें हाथ की कोहनी के ऊपर से होता है भाले को बीचोंबीच से पकड़ते हैं। यह महाराजा महाराणा प्रताप का मुख्य शास्त्र था।कटार– तलवार का छोटा रूप होती है, लोहे की बनी होती है, मूठ लकड़ी का होता है, यह छ: इंच से एक फुट की होती है। कटार से प्रहार करने के दो तरीके होते हैं–(1) कटार को मूठ से ऐसे पकड़ते हैं कि उसका नुकीला सिरा ऊपर होता है। इस तरह से वार बायें हाथ से दायें हाथ को और दायें से बायें ओर कर सकते हैं तथा पेट में सीधा प्रहार कर सक ते हैं।(2) कटार से दूसरा वार करने का तरीका है हाथों से ऐसे पकड़ें कि उसका निचला हिस्सा नुकीला हो इस तरह से कंठ और सीने पर वार कर सक ते हैं।फरसा– 1 फुट से 3 फुट तक का लकड़ी का मेट या लोहे का पाइप होता है और उस पर लोहे का बना फरसे का फना छ: इंच से 1 फुट तक का होता है। यह अर्द्ध चन्द्राकार होता है। यह कुल्हाड़ी का बड़ा रूप होता है। यह भगवान परशुराम जी का मुख्य शस्त्र है।त्रिशूल– लोहे का बना होता है, इसमें बीच का फना भाले की तरह होता है और उसके दोनों तरफ अर्द्ध चन्द्राकार नुकीले फन होते हैं। इसकी लम्बाई 2 फुट से 7 फुट तक ही होती है। इसकी मार फन और निचले हिस्से दोनों से की जा सकती है। निचला सिरा नुकीला होता है, यह शंकर भगवान का मुख्य शस्त्र है। लाठी चलानालाठी पकड़ने का तरीका– लाठी को पतले सिरे की ओर से दायें हाथ की कोहनी से नाप कर जहाँ पंजा आता है वहाँ हाथ रखते हैं और बायाँ हाथ उसके आगे रखते हैं।खड़े होने का तरीका (पैंतरा)– बायाँ पैर आगे (पंजा सीधा सामने की ओर) दायाँ पैर पीछे (पंजा आड़ा) करके, शरीर के सामने की ओर तिरछा रखते हैं, इस समय लाठी शरीर से चिपकी रहती है।प्रहार– पैंतरा लेने के बाद लाठी को शरीर से सटाते हुए सीधे हाथ से सिर के ऊपर ले जाकर लाठी को पीछे लटका देते हैं और सीधा सामने की ओर प्रहार करते हैं, इसी समय एक कदम आगे बढ़ाते हैं। बचाव करते समय एक कदम पीछे हटाते हैं। यही क्रम चलता है।दो मुखी उल्टी व सीधी– लाठी सीने से लगी होती है। लाठी पहले दोनों ओर ऊपर से नीचे की ओर चलती है फिर उलटी में दोनों ओर नीचे से ऊपर की ओर चलती है। यह कलाई खोलने का अभ्यास है।चौमुखी– उलटी व सीधी दो मुखी को मिलाकर जब एक साथ लाठी घुमाते हैं तब वह चौमुखी कहलाती है।सरवार– पैंतरे में खड़े होकर प्रहार करते हैं और बचाव में सामने वाला व्यक्ति बायाँ पैर 1 फीट बायीं ओर खिसकाते हुए शरीर को उसी ओर ले जाकर अपना बचाव करता है और दोनों हाथ ऊपर की ओर होते हैं। लाठी दायीं ओर झुकी रहती है ताकि प्रहार का बार उस पर से फिसल जाये यही क्रम दायीं ओर होता है।चीर लपेट– पैंतरा लेकर खड़े होते हैं, इसके प्रहार की पोजीशन में सिर के पीछे तक लाने के बाद थोड़ा तिरछा ले जाते हुए कान पर वार करते हैं। इस वार को करते समय एक कदम आगे बढ़ाते हैं। बचाव करने वाला व्यक्ति एक कदम पीछे हटकर उसी प्रहार को रोकता है उसका हाथ विपरीत तरफ से आता है।गाँठ वार– पैंतरा लेकर खड़े होते हैं। यह पूर्ण रूप से चीर लपेट की तरह होता है सिर्फ इसमें वार पैर की गठान पर किया जाता है। बचाव भी विपरीत दिशा से उसी प्रकार किया जाता है। बन्दिशबन्दिश का मतलब होता है आदमी जब युद्ध करता है लाठी से सामने वाले योद्धा को ऐसे फँसा देता है जैसे रस्सी से बाँध दिया हो।बन्दिश लगाते हुए प्रदर्शनअखाड़ा शस्त्र युद्ध कला हमारे शारीरिक बचाव एवं दुश्मन को अपने शस्त्र से युद्ध करके सामने वाले को किस तरह पराजित किया जा सकता है। चाहे तलवार हो, भाला, त्रिशूल, फरसा, कटार एवं लाठी व अन्य शस्त्र इस युद्ध कला में एक से अनेक व्यक्तियों से युद्ध किया जाता है। लाठी से एक आदमी से अनेक आदमियों का युद्ध करके आदमियों को बाँधा जाता है। जिसे हम बन्दिश कहते हैं। एक आदमी की बन्दिश हो चार आदमी हों उन्हें लाठी से बाँधा जा सकता है। अनेक प्रकार की बन्दिशें होती हैं। इस युद्ध कला में प्रहार एवं पैंतरों का खेल होता है।बन्दिश 1. आदमी की– इस बन्दिश में दो योद्धा एक-दूसरे पर प्रहारों द्वारा युद्ध करते हैं। इस युद्ध में सिर पे, कमर में, हाथों पर, शरीर के अनेक अंगों पर प्रहार किये जाते हैं। इस युद्ध में अपना-अपना बचाव करके बन्दिश लगाकर सामने वाले को पराजित करते हैं। यह बन्दिश कई प्रकार से की जाती है।बन्दिश 2. यह बन्दिश तीन व्यक्तियों द्वारा की जाती है। एक आदमी दो आदमियों से युद्ध करता है। एक आदमी दो आदमियों से घिरा रहता है। दो आदमी एक पर अनेक प्रकार से प्रहार करते हैं, बीच में घिरा व्यक्ति अपना बचाव करके दोनों को लाठी से बाँधता है यह बन्दिश भी कई प्रकार की जाती है।बन्दिश 3. इस बन्दिश में एक आदमी तीन आदमियों से युद्ध करके तीनों को लाठी द्वारा बाँधता है। यह बन्दिश भी अनेक प्रकार से की जाती है।बन्दिश 4. इस बन्दिश में एक आदमी चार आदमियों से युद्ध करता है। इस बन्दिश में चार आदमियों की लाठी प्रहार द्वारा हाथों से लाठियाँ गिरा दी जाती हैं। इस बन्दिश में भी अन्य बन्दिशों की तरह अनेक प्रकार से दुश्मन को परास्त किया जाता है।छतरी– इस बन्दिश में एक आदमी अनेक आदमियों से घिरा रहता है। चारों तरफ से घेरा जाता है। वह अपना बचाव बीच में लाठी चलाकर, जिसे हम चौमुखी कहते हैं वह चलाता है। चारों तरफ से उसे प्रहारों द्वारा उस पर प्रहार करते हैं, वह अवसर पाकर घेरे से प्रहार करता हुआ बाहर निकलता है और उन पर अलग प्रहार करता है। सब लोग उस पर सिर पे प्रहार करते हैं। वह अपने सिर के ऊपर लाठी से सब लाठियों को रोकता है सब लोग पुन: सिर पे प्रहार करते हैं, वह पलटकर अपने सिर को बचाता हुआ सब की लाठियाँ अपनी लाठी पर रोक कर नीचे बैठते हैं। अपने पैरों कैंची में सारी लाठियों को पाँव से पकड़कर एवं दोनों हाथों से लाठियों को पकड़ लेता है सब लोग अपनी ओर खींचते हैं। उस समय वह लाठियों को अपनी ओर पकड़े रहता है। जिससे लाठियाँ नहीं छूटती हैं जब लाठियाँ खींचते हैं उस समय वह लाठियों के साथ ऊपर उठता है जैसे छतरी खुल जाती है वह आकार बन जाता है। और पीछे गिर जाता है। इस पोजीशन में सब लाठियाँ ढीली पड़ जाती हैं जिसका फायदा वह उठाता है और उनकी लाठियाँ छुड़ा लेता है उन पर प्रहार करता है इसे हम छतरी कहते हैं। छतरी का प्रदर्शनरस्सी द्वारा बन्दिश– इस बन्दिश में एक अनेक आदमियों से युद्ध करता है बचाव करता है चारों तरफ घिरा रहता है। वह चौमुखी चलाकर अपना बचाव करता है चारों तरफ चौमुखी चलाते हुए अवसर पाकर घेरे से बाहर निकलता है लेकिन जैसे ही वह बाहर आता है दो आदमी उसे रस्सी से कमर में अंटी लगाकर बाँध लेते हैं बाकी प्रहारों से उस पर प्रहार करते रहते हैं वह प्रहारों का बचाव अपने सिर के ऊपर को रोकता है वह भागने की कोशिश करता है, पुन: सभी लोग उस पर प्रहार करते हैं वह पलटी लगाता है अंटी से बाहर हो जाता है तभी दूसरी तरफ से वो लोग सभी लोगों को कमर से रस्सी बाँध दिया जाता है। और वह बच जाता है।भाला लाठी युद्ध– इस बन्दिश में एक व्यक्ति भला दूसरा व्यक्ति लाठी लेता है इन दोनों में युद्ध होता है। एक-दूसरे पर युद्ध करते हैं। पैंतरों द्वारा बचाव करते हुए भाला वाला व्यक्ति बचाव करते हुए लाठी वाले व्यक्ति पर हाथों (कलाइयों के पास) भाला के पिछले हिस्से से प्रहार करता है जिससे उसकी लाठी गिर जाती है। वह खाली हाथ हो जाता है तभी भाला वाला व्यक्ति उसे भाला मारता है।त्रिशूल भाला फरसा का युद्ध– इस युद्ध में दो व्यक्ति अपने-अपने शस्त्र लेकर एक-दूसरे पर प्रहार करते हैं। यह युद्ध लाठी भाला जैसा ही होता है।ढाल तलवार– युद्ध में एक व्यक्ति से अनेक व्यक्तियों का युद्ध होता है इसे दो व्यक्तियों से लेकर कई व्यक्तियों का अलग-अलग ढंग से युद्ध होता है। ढाल तलवार युद्ध में प्राय: नौ प्रहारों का उपयोग किया जाता है जिसमें गर्दन, पेट में तलवार घोंपना, हाथों को काटना, कमर पर प्रहार करना, योद्धाओं के हाथ में एक हाथ में ढाल दूसरे हाथ, तलवार रही है। अधिकतर बायें हाथ में ढाल दायें हाथ में तलवार होती है यह युद्ध आमने-सामने होता है। इस युद्ध में गर्दन हाथ-पैर एवं कमर पर प्रहार करते हैं। यह युद्ध अनेक प्रकार से होता है।ढेरा प्राचीन काल में युद्ध में शस्त्र जैसा उपयोग किया जाता था। युद्ध में बहुत योद्धा चारों ओर से घेर लेते थे तो इसे घुमाकर बचाव किया करते थे, इसे चकरी भी कहते हैं। इसके चलाने से तीन चलाने वाले योद्धा तीर नहीं भेद पाते थे इस ढेरा की रस्सी में तीर फँस जाता था। देश (चकरी) की उत्पत्ति महाभारत के समय में हुई इसकी उत्पत्ति भगवान श्रीकृष्ण के द्वारा की गयी। महाभारत युद्ध में श्रीकृष्ण जी ने शस्त्र चलाने की शपथ ली थी, किन्तु युद्ध के समय उन्होंने रथ के पहिये को शस्त्र बनाया। पहिया शस्त्र में नहीं आता था ढेरा गोल चक्राकार में पहिये जैसे होता है। ढेरा घुमाया जाता है वह उस समय पहिये जैसा हो जाता है। उसी समय से ढेरा का चलन हुआ और यह शस्त्र बन गया। पहले ढेरा लोहे का बना होता था, इसके चक्राकार में लोहे का फना लगे रहते हैं जिसके घुमाने से दुश्मन पीछे को भागता है। वर्तमान ढेरा में चक्र की लम्बाई 1 फुट होती है एवं लम्बाई 3 फुट तक बनायी जाती है, डोरी के निचले हिस्से में लकड़ी की गेंदें लगायी जाती हैं इसमें 16 गेंंदें लगायी जाती हैं जिसे हम झूल कहते हैं। इसको चारों तरफ घुमाया जा सकता है। यह कला अनादिकाल से चली आ रही है। वर्तमान में इस ढेरा का उपयोग अखाड़ों में खेल के रूप में किया जाता है। ढेरा का प्रदर्शनधार्मिक त्यौहारों (उत्सवों) में अखाड़ों की अहम भूमिकाभारतवर्ष में हर समुदाय के धार्मिक त्यौहार एवं उत्सव होते हैं। हर भारतीय अपने त्यौहार बहुत धूमधाम से मनाते हैं जैसे दुर्गा पूजन, दशहरा, दीवाली, होली एवं ईद, गुड फ्राइडे, बड़ा दिन, गुरुनानक जयन्ती, बैशाखी इत्यादि त्यौहार इन त्यौहारों में चल समारोह शोभा यात्रा निकाली जाती है। इन शोभा यात्राओं में अखाड़ा संस्कृति की अहम भूमिका रहती है। इन त्यौहारों की विशेषता पर मध्य प्रदेश के बुन्देलखंड में जो वीरों की भूमि कहलाती है इस भूमि पर अनेक वीरों ने जन्म लिये हैं। अपनी वीरता के जौहर दिखाते वीरगति को प्राप्त हुए जैसे महारानी लक्ष्मीबाई, महाराजा छत्रसाल, मधुकर शाह, आल्हा ऊदल इत्यादि।बुन्देलखंड में अनेक त्यौहार बड़ी धूम से मनाये जाते हैं जैसे– होली, गणेश उत्सव, नवरात्रि पर दुर्गा पूजा इन त्यौहारों में अखाड़ों की भूमिका मुख्य होती है। बुन्देलख्ंाड में नवरात्रि पर्व साल में दो बार मनाया जाता है– पहले हिन्दू संस्कृति के अनुसार चैत्र की नवदुर्गा (अप्रैल में) हिन्दू कैलेंडर का पहला माह होता है दूसरो क्‍वार महीना में नवदुर्गा पर मनाया जाता है।चैत्र कामहीना नवदुर्गा पर मनाया जाता है। इन दिनों नौ दिन देवी की पूजा होता है। अष्‍टमी के दिन कुल देवी की पूजा होती है नौमी के दिन रामनवमी मनायी जाती है। जिसे हम राम जन्म उत्सव के रूप में मनाते हैं, इसमें भगवान राम की शोभा यात्रा निकाली जाती है इसमें अखाड़े अपने करतब दिखाते हैं। बिना अखाड़े के शोभा यात्रा अधूरी लगती है अधूरी मानी जाती है। इसके पश्‍चात् क्‍वार के महीने में नवदुर्गा पर सप्तमी, अष्‍टमी, नौवीं एवं दशहरा पर्व मनाया जाता है। क्‍वार की नवदुर्गा पर्व हर मुहल्ला चौराहों पर माँ दुर्गा की मूर्ति विराजमान होती है। दशहरा तक धार्मिक कार्यक्रम होते हैं। इन कार्यक्रमों की तैयारी के लिए अखाड़े वाले एक माह पहले से अपनी तैयारियाँ शुरू कर देते हैं। बुन्देलखंड अंचल एक ऐसा अंचल है जहाँ आज भी सप्तमी के दिन रामदल निकालने की परम्परा है।इस राम दल में सभी अखाड़े वाले अपने-अपने अखाड़ों में वेश-भूषा के साथ संगीत में ढोल, तासा बजाकर साथ में शस्त्र लेकर जिसमें लाठी, ढाल, तलवार, भाला, त्रिशूल, फरसा एवं ध्वज के साथ शहर के चौराहों पर लेजम की धुन पर अपना-अपना प्रदर्शन करके अपने अखाड़े की कला का प्रदर्शन करते हैं। इस रामदल को रामायण में भगवान की राम सीता को लेने हेतु रावण से युद्ध करते हैं। उस समय सेना गठित की गयी (रामदल के रूप में की गयी थी) इस राम दल में वानर सेना एवं अन्य योद्धा अपने शस्त्र लेकर श्री राम के साथ दल बनाकर रावण से युद्ध करने गये थे। दशहरा के दिन रावण पर विजय पायी। दशहरा के दिन रावण वध मनाया जाता है। उसी समय से रामदल की परम्परा आज भी अखाड़े वाले इस त्यौहार के मनाते हैं यह परम्परा आज भी बुन्देलखंड में प्रचलित है। इसी प्रकार गणेश पर्व पर गणेश विसर्जन के समय लेजम की लय-ताल पर अखाड़ा अपनी-अपनी कला-प्रदर्शन करते हैं। जुलूस में अखाड़ाऐसे ही मुस्लिम समुदाय हजरत मुहम्मद शाह के जन्म पर (ईद) के दिन जुलूस निकालते हैं मुस्लिम समुदाय अपने अखाड़ों का प्रदर्शन करते हैं।सिख समुदाय गुरु नानक जयन्ती पर शोभायात्रा निकालते हैं। उस समय अपने अखाड़ों-पंजाब में जिसे गतका कहते हैं अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं। इसी तरह मध्य प्रदेश के अलग-अलग अंचलों में अपने त्यौहारों पर अखाड़ा संस्कृति का प्रदर्शन करते हैं इसलिए हमारे अखाड़ा संस्कृति की धार्मिक उत्सवों में अहम भूमिका रहती है।– आज के विषमता भरे समय में भी हमारे हस्तकला उसी योग्यता से कला में संलग्‍न हैं। इस हस्तकला की प्रकीर्णता को कायम रखने वाले अखाड़े शस्त्र के साक्षात् प्रमाण के रूप में मौजूद हैं। अखाड़ों के माध्यम से हमारे ग्रामीण अंचलों में शस्त्रकला विद्या के प्रति परम्परागत आस्था और धार्मिक विश्‍वास जीवन्त बने हुए हैं। धार्मिक आस्था

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भाषा समिति

बुन्देल धरा अत्‍यन्‍त प्राचीन है। आदिमानव इस पुण्‍य धरा पर रहा होगा और मानव-जीवन के साथ भाषा, संस्कृति का विकास भी इसी बुन्देलखंड से अवश्य हुआ होगा। तब न तो इस भू-भाग का नाम बुन्देलखंड था और न ही भाषा का कोई नाम था। परन्तु था सब कुछ यही; यही जमीन और प्राकृतिक परिदृश्य-पर्वत, नदियाँ, वन-उपवन… आदि सब। इस प्राकृतिक वातावरण में आदि मानव ने जब बोलना-बतियाना शुरू किया होगा तो उस भाषा को संस्कृत भाषा कहा गया। जिसे आज के भाषा वैज्ञानिक प्राकृत भाषाएँ अथवा अपभ्रंश नाम देते हैं। इन ऊबड़-खाबड़ भाषाओं को कालान्तर में संस्कारित किया गया।सबसे पहले ऐसी सु-संस्कृत भाषा ने संस्कृत नाम पाया। शेष जो सु-संस्कृत नहीं हो सकीं वे प्राकृत या अपभ्रंश के रूप में संस्कृत के समानान्तर लोक में प्रचलित रहीं, जिन्हें कालान्तर में ‘लोक भाषा’ कहा गया। इन्हीं लोक भाषाओं की एक इकाई बुन्देली है वह न तो संस्कृत की बेटी है न ही हिन्दी की और न सौरसेनी… आदि से आयी…। सभी प्राकृत रूप में एक साथ जन्मीं, वे सभी परस्पर बहिनें ही थीं उन बहिनों में एक ने संस्कार प्राप्त कर संस्कृत का रूप धारण कर लिया। फिर आज जो समृद्ध साहित्य धारिणी संस्कृत हमारे समक्ष है, वह पाणिनि की ही देन है। पाणिनि पूर्व की संस्कृत बुन्देली के अधिक निकट थी। इसीलिए वर्तमान संस्कृत की प्रकृति हिन्दी की अपेक्षा अनेक भाषाओं विशेषतः बुन्देली के अधिक निकट हैं। मानव संस्कृति के साथ सबसे पहले जन्मी इसलिए सबसे ज्येष्ठ भी है वह।लोक भाषाएँ जिनमें बुन्देली अति प्राचीन है संस्कृत की बहिनें हैं, संस्कृत सु-संस्कार प्राप्त करके बड़े घर में पहुँच गयी और शेष बहिनें अनपढ़-अनपढ़ रहकर विन्ध्याचल के लोक साहित्य में सिमटकर रह गयीं। संस्कृत में अभिजात्य साहित्य रचा जा रहा था और लोक साहित्य अपनी मौखिक परम्परा में फूल-फल रहा था। लोक साहित्य में भी बुन्देल धरा पर लोक गाथाएँ गायीं गयीं ‘जिनमें ‘आल्हा’ की गाथा (1230) भारत की अन्य लोक भाषाओं में अधिक प्रचलन है। जबकि उस समय संस्कृत साहित्य तो राज दरबारों में स्थापित था। कालान्तर में विद्वान मनीषियों की दृष्टि इन लोक भाषाओं और उनके मौखिक परम्परा में विकसित लोक साहित्य पर पड़ी और इनमें भी अभिजात्य साहित्य लिखने क्रान्तिकारी कदम आगे बढ़ाया। पहला कदम तो ग्वालियर के महाराजा डूंगरेन्द्र सिंह तोमर (शासन 1425-1459 ई.) के राजकवि विष्णुदास ने ही आगे बढ़ाया था। इन लोक भाषाओं में रचे गये अभिजात्य साहित्य की भाषा को ‘भाखा’ ‘या’ ग्वालेरी’ नाम दिया गया। विष्णुदास ने 1435 ई. में ‘महाभारत’ नामक महाकाव्य रचा।यह पहली घटना थी जब संस्कृत की परम्परा से हटकर भाखा (ग्वालेरी) में अभिजात्य साहित्य प्रणीत हुआ। आज विद्वानों ने इस ‘महाभारत’ को हिन्दी का पहला महाकाव्य एक स्वर में स्वीकारा। जबकि उस समय हिन्दी भाषा तो क्या हिन्दी नाम का भी जन्म नहीं हुआ था। विष्णुदास के पूर्व लोक में व्याप्त लोक साहित्य के आधार पर ही वेद से संस्कृत में ‘महाभारत’ और वाल्मीकि ने ‘रामायण’ की रचना की थी। इन दोनों महाकाव्यों के पूर्व ये लोक साहित्य की मौखिक परम्परा में गायी जा रही थीं। बुन्देलखंड में ‘पंडवा’ छत्तीसगढ़ में पंडवानी राजस्थान में ‘पाँचकड़ा’… आदि लोक गाथाओं का अनादिकाल से लोक में प्रचलन इसका प्रमाण समक्ष है तात्पर्य यह कि लोक भाषाओं और उनके लोक साहित्य ने संस्कृत में लिखे गये अभिजात्य एवं उसके रचनाकारों तक को प्रेरणा व ऊर्जा प्रदान की है। हिन्दी तो बहुत बाद में यानी कि अब से डेढ़ सौ वर्ष अस्तित्व में आयी और अपनी कलाबाजी करके एक-एक करके इन लोक भाषाओं में चलती चली गयी। ‘विष्णुदास कृत ‘भाखा’ (बुन्देली का पूर्व नाम) के महाकाव्य ‘महाभारत’ (1435 ई.) को प्रथम महाकाव्य कहा जाना इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है।बुन्देली की प्रकृति में ‘श’ के स्थान पर दन्त्य ‘स’ और ‘व’ के स्थान पर ‘ब’ ध्वनि का प्रयोग है- सीस, बीर आदि। इतना ही नहीं वर्तमान बुन्देली में प्रयुक्त एवं प्रचलित शब्द श्री ज्यों के त्यों हैं–सुपेती, गेंडू (तकिया जिसे बुन्देली में गेंडुआ भी कहते हैं) उसी से (सिरहाने) पिछा (पश्चिम दिशा) पियासी, बान, पर्यो आदि शब्द ठेठ बुन्देली के हैं हिन्दी के नहीं। फिर यह कैसी माया ? कि उसको हिन्दी का पहला महाकाव्य कहा जा रहा है? भले उस काल में इस भाषा के लिए बुन्देली शब्द का प्रयोग नहीं होता था। तब तो ब्रजभाषा, अवधी, भोजपुरी, मैथिली…. आदि शब्द भी चलन में नहीं थे। न सूर ने स्वयं अपनी रचना को ब्रजभाषा कहा, न तुलसी ने अपनी रचना को अवधी स्वयं कहा। यह शब्द तो बाद में समीक्षकों द्वारा ही आये। केशव ने तो स्पष्ट शब्दों में अपनी रचनाओं की भाषा को ‘भाखा’ ही कह दिया था-‘भाखा बोल न जानहिं, जिनके कुल के दास;भाखा कवि भौ मन्द मति, तिहि कुल केसौदास।’समीक्षक तो आज भी केशव की भाषा में ब्रजभाषा की अपेक्षा बुन्देली ही अधिक मान रहे हैं। तुलसी की भाषा को समीक्षकों ने अवधी तो कहा परन्तु उसमें भी बुन्देली के शब्दों की भरमार यथावत् उन्होंने देखी ही है। ऐसे उदाहरणों के आधार पर मैं पूर्ण विश्वास के साथ छाती ठोंककर कह सकता हूँ कि’ भाखा’ या ग्वालेरी में सर्व प्रथम जो अभिजात्य साहित्य पन्द्रहवीं सती के आरम्भ से लिखा गया वह बुन्देली ही है। तब निश्चय ही लोक साहित्य की चिर परम्परा से निकल कर अभिजात्य साहित्य की सर्जना में भी अन्य लोक भाषाओं में बुन्देली ही अग्रणी है।बोल-चाल की ऊबड़-खाबड़ बोली से वह सबसे पहले विकसित हुई। लोक साहित्य भी सबसे पहले उसी में प्रकृत रूप में अपनी मौखिक परम्परा में आया। जिसने पहली सु-संस्कृत भाषा संस्कृत के रचनाकारों को भी प्रेरणा प्रदान करते हुए प्रभावित किया। संस्कृत के बाद अभिजात्य साहित्य भी सबसे पहले ‘भाखा’ नाम से बुन्देली में ही आया। जैसा कहा जा चुका है कि विष्णुदास उसके पहले कवि हैं उनकी उस भाखा नामक साहित्यिक भाषा में वर्तमान बुन्देली स्पष्ट रूप में हम देख रहे हैं। अतः बुन्देली संस्कृत की बहन तो हो सकती है , बेटी कदापि नहीं। जिसने अपनी बहन संस्कृत के समानान्तर लोक साहित्य का भंडार भरा है, और उस लोक साहित्य ने आगे चलकर न केवल अभिजात्य साहित्य को प्रेरित किया वरन् संस्कृत के बाद सर्वप्रथम अभिजात्य साहित्य की गंगोत्री भी बुन्देली ही बनी। उसी बुन्देली का दूसरा कुछ सुधरा हुआ स्वरूप हम ब्रजभाषा के साहित्य में भी यथावत् पाते हैं। अन्ततः विश्व की प्राचीनतम भाषा बुन्देली ही है, जिसकी प्राचीन संस्कृति हमारी विरासत है। पं. गुणसागर सत्‍यार्थीकुण्‍डेश्‍वर, म.प्र.

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लोक साहित्‍य समिति

समृद्ध राष्ट्र की प्राचीन परम्परायें, संस्कृति, धर्म, दर्शन का वास्तविक स्वरूप लोक-साहित्य में देखा जा सकता है। लोक साहित्‍य एवं जनमानस की सरलतम अभिव्यक्ति है। संस्कृति, साहित्य एवं कला के मूल रूप तक पहुँचने का एक मात्र साधन लोक-साहित्य ही है।लोक-साहित्य तथा लोक-संस्कृति में गहनतम सम्बन्ध है। लोक-साहित्य के द्वारा लोक-संस्कृति के मूल तक पहुँचा जा सकता है। यद्यपि लोक-संस्कृति के रंग सदैव एक से नहीं रहे। प्रत्येक देश की संस्कृति का सच्चा स्वरूप वहाँ के लोक- साहित्य में ही देखा जा सकता है।यह क्षेत्र गोंडवाना कहलाता है लेकिन यहाँ की संस्कृति, लोक-जीवन और भाषा बुन्देलखंडी रूप लिये है। उन पर न तो गौड़ों का प्रभाव है और न निकट के निमाड़ी क्षेत्र का असर इतिहास केवल इतना बताता है कि 1599 में ओरछा के बुन्देला राजा जुझार सिंह से चौरागढ़ नरेश प्रेमनारायण के पुत्र हिरदेशाह ने पिता की हार का बदला लेकर बुन्देला से चौरागढ़/ चौगाना वापिस ले लिया। इतने अल्पकालीन बुन्देला शासन में यहाँ के लोक-जीवन पर इतना व्यापक प्रभाव पड़ना असम्भव है। बुजुर्गों से पूछने पर ज्ञात होता है कि पुराने समय में गाडरवारा के सागर से व्यापारिक सम्बन्ध अतिशय घनिष्ठ थे और उसी ओर से अनेक जातियाँ इस क्षेत्र में आकर बसी हैं। इसीलिए जाति विविधता के बावजूद यहाँ का लोक-जीवन और साहित्य बुन्देलखंडी हैं। डॉ. उमाकान्त ‘कपिध्वज’ ने लिखा है- मध्यप्रदेश की लोक-भाषाओं में बुन्देलखंडी का अपना पृथक व महत्त्वपूर्ण स्थान है। भाव, भाषा, उपमा एवं अलंकार- सभी दृष्टियों से इसका इतिहास अत्यन्त ही समृद्ध रहा है। इस समस्त भू-भाग की संस्कृति सर्वत्र एक समान है।मनुष्य अतीत काल से ही अपनी भावनाओं को विभिन्न माध्यमों से व्यक्त करता आया है। इस क्षेत्र के लोग आनन्द के साथ भी काम करते हैं। यहाँ के लोकगीत हमारे जीवन में पूर्ण रसास्वादन कराते हैं। हमारे जीवन को उल्लास एवं सौन्दर्य प्रदान करते हैं, जिन्दगी का हर पक्ष चाहे वह जन्म हो, कृषि हो या अन्य खुशी के अवसर – सभी में गीत और नृत्य की प्रस्तुति महत्‍वपूर्ण है।बुन्देलखंड के इस क्षेत्र में अनेक लोकनृत्य तथा लोकगीत हैं जिनसे ग्रामीण अंचलों में निवास करने वाला जनमानस अछूता नहीं है। विभिन्न लोकनृत्य अपनी अलग-अलग पहचान बनाये हुए हैं, प्रमुख लोकनृत्य है- बरेदी लोकनृत्य, सेरे नृत्य, बधाई लोक नृत्य, राई नृत्य, शेर नृत्य, जवारा नृत्य, नौरता लोक नृत्य तथा मोनी नृत्य आदि हैं।इस क्षेत्र में लोक-जीवन गीतमय है। लोकगीत लोक-साहित्य का समृद्ध और सशक्त अंग है। श्री उमाशंकर शुक्ल लिखते हैं- ‘बुन्देलखंड के लोकगीत जाग्रत जनता के प्रतीक हैं। इन पर गाँवों, खेतों-खलिहानों की छाप है। इसमें जन्मभूमि की गौरवशाली और यशस्वी आत्मा की पुकार निहित है। इनमें एक विशाल संस्कृति का गर्वीला इतिहास अभिव्यक्त हुआ है। इनमें गति भी, तीव्रता भी और मर्म को छू सकने की शक्ति भी है। कला और जन-जीवन का सम्बन्ध धरती के गीतों की विशेष पहिचान है। जिस कला की जड़ें मातृभूमि की मिट्टी में टिकी होती हैं उस कला का रंग और होता है उसमें जनता की सामूहिक प्रतिभा और रचना का आभास मिलता है। कला की पूर्णता के लिए यह आवश्यक है कि हम लोग कला से परिचित ही न हों बल्कि उससे प्रेरणा भी लें। वर्षा के पहले झूले के पश्चात् धरती से उठने वाला सौंधा सौरभ लोकगीतों की सबसे बड़ी विशेषता है। यही सौरभ जन्मभूमि की कल्पना में सबसे अधिक सहायक है।’लोकगीतों में मानवीय समाज के क्रिया-कलाप, भाव-सौन्दर्य, कला-सौन्दर्य आदि बातों का समावेश होता है। इसलिए बुन्देली लोकगीतों के वर्गीकरण से समाज में प्रचलित रीति-रिवाजों का विस्तृत ज्ञान प्राप्त होता है।डॉ. बलभद्र तिवारी ने बुन्देली लोकगीतों का विभाजन उनके वैशिष्ट्य के आधार पर किया है-ऋतु गीत तथा आख्यान गीत, आल्हा, कार्तिक के गीत, ढोला नाउ, वर्मा- साँवरी, कुँवारों, पंडवा, सौरंगा, सदावक्ष।उत्सव और त्यौहार : फागें, स्वाँग, राई, दिवारी, तीजा, आरती, तुलसी का ब्याह।रीति-रिवाज सम्बन्धी गीत: बनरा, बनरी, बिदा के गीत, बधाई, भाँवर, तेल- सौहरे (जन्मोत्सव मनाते समय गाया जाने वाला गीत)।श्रम गीत (कार्यों के आधार पर): दिनरी, वीरोठी, अनबोलना, बिलवारी।मिश्रावृत्ति के गीत – बसदेवा के गीत (हास्य रसपूर्ण)।लोकनृत्य के साथ गाये जाने वाले गीत : राई, ढिमरयाई, सैरो, दिवारी।यात्रा के समय के गीत : भोला के गीत (बंबलियाँ)।धार्मिक गीत प्रभाती, भगतें, जस, गौहें, बीरौठी।बुन्देली बोली का सरलीकरण और कोमलीकरण की प्रवृत्ति के कारण ही यहाँ के लोकगीतों में मधुरता, रसमयता और कोमलता प्राप्त होती है। भाषा को मधुर बनाने में यहाँ के ग्रामीण समाज का विशेष योगदान रहा है। लोकगीत तो यहाँ की ऐसी सम्पत्ति है, जिसमें भाषा का अपूर्ण और अक्षय भंडार भरा पड़ा है।इस क्षेत्र के लोकगीतों में यहाँ की स्थानीय, सामाजिक स्थितियाँ, रीति-रिवाज, बोलते प्रतीत होते हैं। स्वाभाविकता तो इन गीतों का प्राण तत्त्व है। साथ ही स्थानीयता का रंग अपनी गहराई के साथ उभरता प्रतीत होता है। यहाँ जन्म से लेकर। मृत्यु तक और सवेरे से लेकर शाम तक विविध प्रकार के लोकगीत यहाँ के नर-नारी गाते हैं। इनमें जीवन के विविध रूपों की झाँकी प्राकृतिक पर्यावरण के साथ चित्रित होती है। खंड-6 : बुंदेली लोकसाहित्‍य का महत्‍व Read More खंड-5 बुंदेली लोकसाहित्‍य की विषयवस्‍तु, लोकमूल्‍य एवं लोकाचरण Read More खंड-4 बुंदेली लोक साहित्‍य की विधाएँ Read More खंड-3 बुंदेली लोक साहित्‍य का विकास एवं वर्गीकरण Read More खंड-2 लोकवार्ता के तत्व तथा लोक-मानस Read More खंड-1 लोक : परिचय एवं विस्‍तार Read More

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भूगोल समिति

बुन्देलखंड भारत का ऐसा भौगोलिक खंड है, जो बुन्देलखंड उच्च भूमि के नाम से जाना जाता है। वर्तमान में यह दो भागों में बँटा क्षेत्र है। बुन्देलखंड का कुछ भाग मध्य प्रदेश एवं कुछ भाग प्रदेश के अंतर्गत है। मध्य प्रदेश में इसका अधिक भाग है यह चेदि साम्राज्य के अधीन रहा है। चन्देल राजपूत एवं चेदि से मिलकर यह बुन्देलखंड कहलाया।बुन्देलखंड के अंतर्गत झाँसी, बाँदा, चित्रकूट, दतिया, टीकमगढ़, ललितपुर, सागर, दमोह, उरई, पन्ना, हमीरपुर, महोबा, राठ, नरसिंहपुर एवं छतरपुर जिले सम्मिलित हैं।बनावट – बुन्देलखंड विंध्यन पहाड़ी श्रृंखला से दक्षिण एवं उत्तर में गंगा सिंधु मैदान से आवृत्त है। यह भौतिक क्षेत्र उत्तर में हल्के ढाल वाली उच्च भूमि क्षेत्र है। दक्षिण में पहाड़ी श्रृंखलाओं, पहाड़ी क्षेत्र एवं जंगलों से घिरा है।बुन्देलखंड की उच्च भूमि एवं दक्षिण पूर्व के कुछ भाग जिनमें उत्तरी पश्चिमी मालवा का पठार एवं दक्षिण पूर्व में नर्मदा बेसिन के कुछ भागों को छोड़कर इसका विस्तार 24° से 26°30 ‘ उत्तरी अक्षांश एवं 78°10′ से 81°30’ पूर्व देशांतर में है।बुन्देलखण्ड उच्चभूमि तथा विन्ध्यन श्रेणी के मध्य में विन्ध्य कगार भूमि स्थित है। यह कई पठारों का समूह है जो सम्भवतः कैब्रियन युग में निक्षेपित हुए हैं। तब से अनेक बार यह क्षेत्र उत्थित और अपरदित हुआ है वर्तमान में पूर्व-पश्चिम विस्तृत अपरदित कगार यहाँ की मुख्य स्थलाकृति है। वस्तुतः सपाट शिखरों तथा विखण्डित पठारी भू-दृश्य वाला यह प्रदेश विशाल मैदान तथा प्रायद्वीप पठार के मध्य एक संक्रांत क्षेत्र है। यहाँ की स्थलाकृति संरचना से पूर्णतः संबंधित है। यहाँ के मुख्य पठार कैमूर, रीवा तथा भॉडेर है जिनमें बालुका पत्थर की प्रधानता है। इस प्रदेश की दक्षिणी पर विन्ध्यन शैल समूह दीवार के समान प्रपाती ढाल बनाते हैं। जिसकी औसत उचाई लगभग 450 मीटर है। इस प्रदेश की उत्तरी सीमा भी एक प्रपाती कगार है जो पन्ना, सतना तथा रीवा के उत्तरी भाग में पूर्व से पश्चिमी तक विस्तृत है। यहाँ की मुख्य नदी केन है।विन्ध्यन श्रेणी का विस्तार नर्मदा घाटी के उत्तर में, घाटी के सहारे सहारे, पश्चिम में गुजरात की सीमा से आरम्भ होकर पूर्व में कैमूर श्रेणी (मिर्जापुर) तक लगभग 1,050 कि.मी. की लम्बाई में है। अपनी पश्चिमी सीमा पर, लगभग 100 कि.मी. की लम्बाई से यह श्रेणी चाप की भाँति नर्मदा घाटी की ओर उन्नति आकृति में है तथा 300 मीटर की समोच्च रेखा का अनुसरण करती है। दक्षिण बुन्देलखंड मेंमिट्टी – बुन्देलखंड क्षेत्र में गहरी काली, हल्की काली एवं मध्यम प्रकार की काली एवं लाल मिट्टी का क्षेत्र फैला है जबकि उत्तर में टीकमगढ़, ललितपुर, हमीरपुर, बाँदा क्षेत्रों में कॉप की दोमट मिट्टियाँ भी पाई जाती हैं। नरसिंहपुर जिले में काली एवं नर्मदा प्रवाह क्षेत्र की दोमट मिट्टी का क्षेत्र है।अपवाह तंत्र – बुन्देलखंड क्षेत्र में उत्तर में यमुना नदी के प्रवाह क्षेत्र में आनेवाली प्रमुख नदियों में चंबल, बेतवा जो ललितपुर, झाँसी, जालौन हमीरपुर जनपदों में प्रवाहित होती है। दक्षिणी क्षेत्र में नर्मदा अपवाह तंत्र में आनेवाली छोटी नदियाँ एवं केन नदी प्रवाह क्षेत्र में आने वाली सोनार, व्यारमा नदियों का प्रवाहित क्षेत्र है। इस क्षेत्र में अनेक ऐतिहासिक जलाशय भी हैं जिनमें सागर, छतरपुर एवं टीकमगढ़ का क्षेत्र सम्मिलित है।जलवायु- भारत की मानसून जलवायु से प्रभावित यह क्षेत्र मध्यम प्रकार की जलवायु वाला क्षेत्र है अतिशीत एवं अतिग्रीष्म जलवायु इस क्षेत्र की नहीं है। यहाँ तीन ऋतुएँ ग्रीष्म, वर्षा, शीतऋतु है। ग्रीष्मकाल में औसत तापमान अप्रैल से जून तक लगभग 40°C एवं शीतऋतु में 15°C औसत रहता है। शीतकाल में उत्तरी बुन्देलखंड अधिक ठंडा होता है यहाँ ललितपुर झाँसी एवं जालौन जिलों का तापमान 50°C होता है। जबकि दक्षिणी बुन्देलखंड में जनवरी में यह 7 से 12°C तक की विभिन्नता लिए हुए है।वनस्पति- बुन्देलखंड की उच्च भूमि में विन्ध्यन पहाड़ी श्रृंखला वनों से आच्छादित है यहाँ मिश्रित प्रकार के वन पाए जाते हैं बुन्देलखंड में महुआ, जामुन, बेर, बेल, बबूल, खेर के मिश्रित वन हैं। जैव विविधता की दृष्टि से बुन्देलखंड महत्वपूर्ण क्षेत्र है। यहाँ के कुछ वन राष्ट्रीय वन संरक्षण एवं नेशनल पार्क की श्रेणी के हैं। जिनमें पन्ना का टाइगर रिजर्व नौरादेही वन अभ्यारण, रमना फॉरेस्ट, रमना फॉरेस्ट प्रमुख वानस्पतिक क्षेत्र हैं। भूमिका-भूगोल के माध्यम से किसी भी क्षेत्र के विस्तार, स्थिति, क्षेत्रफल, उच्चावच, जलवायु, नदी, पर्वत, वन, पर्यावरण, पर्यटन, जनसंख्या वितरण, परिवहन, उद्योग, व्यवसाय, कृषि, खनिजों का वितरण आदि विविध पक्षों का अध्ययन किया जाता है ।उद्देष्य-किसी भी प्रदेष के क्रमिक विकास एवं विष्व मानचित्र में उसकी उपस्थिति तथा उसके आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक तथा राजैनीतिक पक्षों को बताना ही भूगोल का वास्तविक उद्देष्य होता हैं  अतएव बुंदेलखण्ड विष्वकोष की भूगोल समिति, बुंदेलखण्ड को विष्वमान चित्र में लाने एवं यहाँ के भौगोलिक वैभव में बुंदेलखण्ड को प्रकाष में लाने का कार्य संपन्न करेगी। बुंदेलखण्ड के विष्वकोष में बुंदेखण्ड की भौगोलिक जानकारी प्रदान करने के लिए भूगोल समिति का निर्माण किया गया है। जिसका उद्देष्य बुंदेलखण्ड की भौगोलिक जानकारी को प्रकाष में लाना है ।कार्य की रूपरेखा-भूगोल समिति द्वारा बुंदेली विष्वकोष के लिए तथ्यात्मक एवं सारगर्भित जानकारी को एकत्रित करने के उद्देष्य से ही भूगोल समिति को निम्न 11 उप समितियों में विभक्त किया गया है-1. भौतिक स्वरूप, भूवैज्ञानिक संरचना, सामग्री संग्रह समिति।2. जलसंसाधन एवं अपवाह प्रणाली सामग्री संग्रह समिति।3. जलवायु आंकड़े संग्रह समिति।4. मिट्टियों के आंकड़े संग्रह समिति।5. वन एवं वनस्पति के आंकड़े संग्रह समिति।6. खनिज संसाधनों के आंकड़े संग्रह समिति।7. कृषि संबंधी आंकड़े संग्रह समिति।8. उद्योग संबंधी आंकड़े संग्रह समिति।9. परिवहन के साधनों के आंकड़े संग्रह समिति।10. व्यापार एवं व्यवसाय के आंकड़े संग्रह समिति।11. जनसंख्या संबंधी आंकड़े संग्रह समिति।उपर्युक्त समितियाँ अपनी विषय विषेज्ञता के आधार पर संपूर्ण बुंदेलखण्ड में विद्यमान भौगोलिक जानकारी को एकत्रित करेगी। एकत्रित स्त्रोतों के माध्यम से भौगोलिक सलाहकार समिति, भौगोलिक आंकड़े संकलन समिति एवं भौगोलिक जानकारी/आंकड़े प्रकाषन समिति के परामर्षानुसार बुंदेलखण्ड के वैभवषाली भूगोल को प्रकाश में लाया जायेगा।डॉ. सुनील बाबू विश्वकर्माप्रभारीभूगोल समितिबुन्देलखण्ड विश्वकोश

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पशु-पक्षी समिति

बुन्देलखंड मध्यभारत का एक भौगोलिक क्षेत्र है। जो उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश राज्यों के बीच विभाजित है। यह क्षेत्र 23°8-26°3 लेटीट्यूट तथा 78°1-8131 लोगीट्यूट है। यहाँ की वार्षिक वर्षा 938.6-125.0 मि.मी. होती है। बुन्देलखंड के प्रमुख शहरों झाँसी, बाँदा, चित्रकूट, दतिया, टीकमगढ़, ललितपुर, सागर, दमोह, उरई, पन्ना, हमीरपुर, महोबा, नरसिंहपुर और छतरपुर है।उत्तर भारत के बुन्देलखंड क्षेत्र दो राज्यों, यानी मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश में शामिल होता है। इसका बड़ा हिस्सा मध्यप्रदेश में पड़ता है। जिसमें 5 जिले अर्थात् दमोह, सागर, छतरपुर, टीकमगढ़ और पन्ना तथा उत्तरप्रदेश में 7 जिले झाँसी, बांदा, चित्रकूट, ललितपुर, उरई, हमीरपुर, महोबा आते हैं। बुन्देलखंड मुख्य रूप से बायोडायरसिटी को लेकर विभिन्नता से भरपूर क्षेत्र है। जिलेराष्ट्रीय उद्यान/अभ्यारण्यवर्षपशु/पक्षीसागरनौरादेही1975नील बैल, हिरण, मोर, हंस, ब्लैक तेंदुआ, स्वानदमोह––बन्दर, जंगली सुअर, जंगली बुश बटेरछतरपुर––सियार, चिकारा स्लोथ मिनिवेट, सारसटीकमगढ़ओरछा–वियर चितीदार हिरण, किंगफिशर, उल्लूपन्नापन्ना राष्ट्रीय उद्यान1981सांभर, मृग, भेड़िया, कठफोड़वा, कलहंसनरसिंहपुर––कुत्ता, लोमड़िया कॉलर स्कोपदतिया––मगरमच्छ पिफाउलललितपुरमहावीर स्वामी वन्यजीव अभ्यारण1977तेंदुआ, नीले बैल, हिरण, कठफोड़वा, कलहंस, नील गाय, सांभर, कॉलर स्कोपरथ––जंगली सुअर बाघ, पिफाउलहमीरपुर––आलस भालू, सांभर मोर, हंस, ब्लैक स्वानउरई––कृष्णमृग, मीर, प्रेरणा जंगली बुश बटेर,झाँसी–1858मुर्गी, जंगली, मुर्गी, मिनिवेट, सारसमहोवाविजय सागर–चित्रित तीतर, बिल्ली किंगफिशर, उल्लूबांदाअभ्यारण1977और चिंकारा कण्ठचित्रकूटरानीपुर अभ्यारण–  यहाँ पर निम्‍न स्तरी उद्यान व अभ्यारण पाए जाते हैं। जहाँ पर पशु, पक्षी भरपूर संख्या में पाए जाते हैं।पन्ना राष्ट्रीय उद्यानपन्ना राष्ट्रीय उद्यान खजुराहो से लगभग 27 किलोमीटर की दूरी पर मध्यप्रदेश के केन्द्रीय भारतीय राज्य में स्थित है। पार्क बाघों के साथ ही हिरण और मृग सहित अपने जंगली बिल्लियों के लिए दुनिया भर में जाना जाता है। नौरादेही वन्यजीव अभ्यारणमध्यप्रदेश भारत में एक आरक्षित है। यह भारत में चीता पुनः स्थापन के लिए एक सम्भावित साइट है। 1197 वर्ग किलोमीटर के एक क्षेत्र के साथ वन्य जीव अभ्यारण जबलपुर, दमोह और जबलपुर के सागर शहरों के पास स्थित है। यहाँ पाए जाने वाले मुख्य जानवरों बाघ, तेंदुए, लोमड़ी, जंगली कुत्ते, नीले बैल, मगरमच्छ, चिंकारा, सांभर, चीतल, स्लॉथ बीयर है। ओरछा वन्यजीव अभ्यारणवर्ष 1994 में स्थापित किया गया था। यह लगभग 46 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला है। यहाँ पर चित्तीदार हिरण, नीले बैल, मोर, जंगली सूअर, बन्दर, सियार, नीलगाय, आदि पाए जाते हैं। वास्तव में ओरछा वन्यजीव अभ्यारण अक्सर मुख्य विदेशी और भारतीय पर्यटकों ने एक पक्षी अभ्यारण के रूप में जाना जाता है पीफाअल तरह सभी दुनिया भर से कई घर में पक्षियों और विभिन्न प्रवासियों भी शामिल है जो ओरछा अभ्यारण में पाया जा सकता है जो लगभग 200 पक्षी प्रजातियाँ हैं, मोर, हंस, ब्लैक स्वान, जंगल बुश वेटर, मिनिवेट, सारस, किंगफिशर, उल्लू, कठफोड़वा, कुछ कलहंस, कॉलर स्कॉप उल्लू आदि पक्षी पाए जाते हैं। महावीर स्वामी वन्यजीव अभ्यारणमहावीर स्वामी अभ्यारण, उत्तर प्रदेश में कई वन्यजीव अभ्यारणों में से एक है। यह झाँसी से 125 किलोमीटर दूर है। अभ्यारण 5.4 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है। और 1977 में स्थापित हुआ था। पक्षियों की एक किस्म के अलावा तेंदुआ, नीलगाय, जंगली सूअर, सांभर, काला हिरन, नीले बैल, भालू, सियार, लंगूर और बन्दरों में शामिल हैं। यहाँ की यात्रा करने के लिए सबसे अच्छा समय नवम्बर से अप्रैल तक है। रानी पुर वन्यजीव अभ्यारणयह अभ्यारण 1977 में स्थापित किया गया था, उत्तर प्रदेश में बांदा जिले के आकर्षणों में से एक है यह 230 से अधिक वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है और यह विविध वन्य जीवन के लिए विख्यात है। S.No.SpeciesScientific Name1.Asian Paradise FlycatcherTerpsiphone paradisi2.Alexandrine ParakeetPsittacula eupatria3.Ashy-crowned SparrowlarkEremopterix grisea4.Asian Brown FlycatcherMuscicapa dauurica5.Asian KoelEudynamys scolopaccea6.Barn SwallowHirundo rustica7.Baya WeaverPloceus philippinus8.Black IbisPseudibis papillosa9.Black StorkCiconia nigra10.Black-rumped FlamebackDinopium benghalense11.Brahminy StarlingSturnus pagodarum12.Brown Fish OwlBubo zeylonensis13.Cattle EgretBubulcus ibis14.Changeable Hawk EagleNisaetus cirrhatus15.Chestnut-shouldered PetroniaPetronia xanthocollis16.Citrine WagtailMotacilla citreola17.Common CootFulica atra Linnaeus18.Common GreenshankTringa nebularia19.Common KestrelFalco tinnunculus20.Common KingfisherAlcedo atthis21.Common MoorhenGallinula chloropus22.Common MynaAcridotheres tristis23.Common StonechatSaxicola torquata24.Common TailorbirdOrthotomus sutorius25.Common TealAnas crecca26.Common WoodshrikeTephrodornis pondicerianus27.Cotton Pygmy GooseNettapus coromandelianus28.Crested Serpent EagleSpilornis cheela29.Egyptian VultureNeophron percnopterus30.Eurasian Collared DoveStreptopelia decaocto31.GadwallAnas strepera32.Golden OrioleOriolus oriolus33.Greater FlamebackChrysocolaptes lucidus34.Green Bee-eaterMerops orientalis35.Grey FrancolinFrancolinus pondicerianus36.Grey HornbillTockus nasutus37.Grey WagtailMotacilla cinerea38.House CrowCorvus splendens39.House SparrowPasser domesticus40.Indian CormorantPhalacrocorax fuscicollis41.Indian NightjarCaprimulgus asiaticus42.Indian PeafowlPavo cristatus43.Jungle Bush QuailPerdicula asiatica44.King VultureSarcoramphus papa45.Large EgretCasmerodius albus46.Large-billed CrowCorvus macrorhynchos47.Long-billed VultureGyps indicus48.Oriental White-eyeZosterops palpebrosus49.Paddyfield PipitAnthus rufulus50.Painted StorkMycteria leucocephala51.Pied KingfisherCeryle rudis52.Plum-headed ParakeetPsittacula cyanocephala53.Purple SunbirdNectarinia asiatica54.Rock PigeonColumba livia55.Rose-ringed ParakeetPsittacula krameri56.Sarus CraneGrus antigone57.ShikraAccipiter badius58.Spotted DoveStreptopelia chinensis59.Yellow WagtailMotacilla flava60.Yellow-wattled LapwingVanellus malabaricus

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आयुर्वेद समिति

पुस्तक - आयुर्वेद एवं पारम्परिक देशी चिकित्सा पद्धति   आयुर्वेद एवं पारम्परिक देशी चिकित्सा पद्धतिबुन्देली संस्कृति में आयुर्वेद की प्राचीनता एवं परम्परा : उद्भव विकासआयुर्वेद के अंग एवं उपांगस्वास्थ चर्याबुन्देलखण्ड में कल्प चिकित्सा का महत्वबुन्देलखण्ड में औषधीय वन क्षेत्रों का परिचयआहारबुंदेली आहार और उनके व्यंजनों का प्रचलनबुन्देलखण्ड में फल, मेवों रत्नों एवं वाद्यों द्वारा इलाजबुन्देलखण्ड में संगीत वाद्य यंत्रों एवं कहावतों द्वारा चिकित्सा की प्रथाएंबुन्देलखण्ड में विभिन्न कहावतों व मुहावरों से की जाने वाली आहारीय चिकित्साज्योतिष व बुन्देलखण्डबुन्देलखण्ड के लोकसाहित्य कलाओं, आयुर्वेद में चिकित्सकीय पौधों का पौराणिक महत्वबुन्देलखण्ड में योग व प्राकृतिक चिकित्सा का व्यवस्थित ज्ञान सुरक्षित मातृत्व हेतुयज्ञ (हवन)सागर में होम्योपैथी का इतिहासबुन्देलखण्ड में आयुर्वेद उपचार से संबंधित घर-घर में समाहित विभिन्न जानकारियांऔषधि वृक्षों के नाम और परिचय एवं चिकित्सा में उनके उपयोगविभिन्न रोग एवं निदानबुन्देली जीवन में कहावतों एवं मुहावरों में रोगों से बचाव के प्रतिरोधात्मक उपायबुन्देलखण्ड में नाना प्रकार के खेलों व खिलौनों का महत्वबुंदेली जीवन की पुरातन एवं वर्तमान परंपरायेंबुन्देलखण्ड के नामित वैद्य, हकीम, प्राकृतिक चिकित्सक होम्योपैथी चिकित्सक ज्योत्साचार्य, योगाचार्य, तंत्र मंत्राचार्य, नाड़ी वैद्यबुन्देलखण्ड में चिकित्सा पद्धतियाँ एवं आहार, व्यंजन, वाद्य यंत्र व परम्पराओं का संकलन

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पुरातत्त्व एवं शिलालेख समिति

भूमिका-‘पुरातत्त्व’ के माध्यम से प्राचीन काल के अवशेषों एवं सामग्रियों के सर्वेक्षण एवं उत्खनन के माध्यम से एकत्रित किया जाता है तथा एकत्रित अवशेषों एवं सामग्रियों का पुरातत्त्ववेत्ताओं द्वारा विश्लेषण कर प्राचीन मानव समाज के क्रमिक विकास को प्रकाश में लाने का प्रयास किया जाता है। पुरातत्त्ववेत्ताओं एवं इतिहासकारों के द्वारा प्राचीन मानवों की दैनिक जीवन की अनेक वस्तुओं जैसे सिक्कों, मनकों , खिलौना,  कृषि उपकरणों, प्राचीन स्मारकों एवं प्रतिमाओं, शिलालेखों तथा शैलचित्रों की कलात्मकता एवं उनके विविध पक्षों का अध्ययन किया जाता है।उद्देश्य-चूँकि मानव समुदाय के क्रमिक विकास एवं उनके सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, सांस्कृतिक तथा राजनीतिक पक्षों को प्रकाश में लाना ही पुरातत्त्व का मुख्य उद्देश्य होता है अतएव बुन्देली विश्वकोश की पुरातत्त्व एवं शिलालेख समिति, बुन्देलखण्ड के प्राचीन भू-भाग में हुये मानव समुदाय के क्रमिक विकास एवं उनके सांस्कृतिक वैभव को प्रकाश में लाने का कार्य सम्पन्न करेगी। बुन्देलखण्ड के भौगोलिक क्षेत्रफल में प्राचीन मानव के क्रमिक विकास एवं उनकी सांस्कृतिक वैभव को ज्ञात करने के लिए ही बुन्देली विश्वकोश की पुरातत्त्व एवं शिलालेख समिति का निर्माण किया गया है। जिसका उद्देश्य बुन्देलखण्ड के स्वर्णिम इतिहास को प्रकाश में लाना है।कार्य की रूपरेखा-पुरातत्त्व एवं शिलालेख समिति द्वारा बुन्देली विश्वकोश के लिए तथ्यात्मक एवं सारगर्भित जानकारी को एकत्रित करने के उद्देश्य से ही इस समिति को निम्न 15 उप समितियों में विभक्त किया गया है-1. प्रागैतिहासिक एवं आद्यैतिहासिक पुरातात्त्विक स्रोत सामग्री संग्रह समिति                                                2.ऐतिहासिक पुरातात्त्विक स्रोत सामग्री संग्रह समिति3. शिलालेखों एवं अभिलेखों की जानकारी संग्रह समिति4. शैलचित्रों सम्बन्धी जानकारी संग्रह समिति5. सिक्कों एवं मुहारों  सम्बन्धी जानकारी संग्रह समिति6. मंदिरों एवं मठों सम्बन्धी जानकारी संग्रह समिति7. मूर्ति शिल्प सम्बन्धी जानकारी संग्रह समिति8. किलों, गढ़ियों एवं महलों सम्बन्धी जानकारी संग्रह समिति9. संग्रहालयों की जानकारी संग्रह समिति10. महत्वपूर्ण पुरास्थलों की जानकारी संग्रह समिति11. पुरातात्त्विक उत्खननों एवं सर्वेक्षणों की जानकारी संग्रह समिति12. पुरातत्त्व संरक्षकों की जानकारी संग्रह समिति13. पुरातत्त्व के क्षेत्र में कार्य करने वाले महत्वपूर्ण पुरातत्त्वविदों की जानकारी संग्रह समिति                                14.पुरातत्व पर केन्द्रित शोध प्रबन्धों, लघु शोध प्रबन्धों, ग्रन्थों एवं शोध आलेखों की जानकारी संग्रह समिति15. महत्वपूर्ण विरासतें की जानकारी संग्रह समितिउपर्युक्त समितियाँ अपनी विषय विशेषज्ञता के आधार पर सम्पूर्ण बुन्देलखण्ड में विद्यमान पुरातात्त्विक स्रोतो को एकत्रित करेंगी। एकत्रित स्रोतों के माध्यम से पुरातत्त्व सलाहकार समिति, पुरातत्त्व संकलन समिति एवं पुरातत्त्व प्रकाशन समिति के परामर्शानुसार बुन्देलखड की वैभवशाली पुरासम्पदा को प्रकाश में लाया जायेगा।प्रो. नागेश दुबेप्रभारीपुरातत्त्व एवं शिलालेख समिति बुन्देलखण्ड विश्वकोश

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रंगमंच समिति

रंगमंच समिति

बुन्देलखंड की लोक नाट्य परंपरा बुन्देली लोकभाषा के जन्म से पूर्व की है। बुन्देली का उद्भव आठवीं-नवीं शती में हुआ था, परन्तु उसके पूर्व बुन्देलखंड में दूसरी बोलियों का प्रचलन था। उस समय पुलिन्द, निषाद, शबर आदि आदिम जातियाँ ही थीं। उनमें लोकोत्सवों, लोकनृत्यों, लोकनाट्य-रूपों का प्रचलन था।इस युग में खास बात यह थी कि लोकनाट्य का जो भी रूप प्रचलित था, वह धर्म की जकड़न से मुक्त होने के कारण परवर्ती लोकनाट्यों की अपेक्षा अधिक स्वच्छन्द था। वे आदिम जातियाँ किसी जाति या दल की निजी सम्पत्ति न होने की वजह से सामूहिक या सामाजिक चेतना से अधिक जुड़े थे।गुप्त-काल से लेकर हर्षवर्धन (606-47 ई.) तक संस्कृति और कला का उत्कर्ष रहा और संस्कृत नाटकों का मंचन इस क्षेत्र में भी होता रहा। स्वाभाविक है कि लोकनाट्य इस दौड़ में पीछे हो गया। बुन्देलखंड के सामन्तों का बोलबाला था, जिससे प्रजा का शोषण अधिक तेजी से हुआ। ऐसी परिस्थिति में लोककलाओं के विकास की ओर लोगों का ध्यान कम गया।उसके बाद नौवीं शती तक का समय बुन्देलखंड के इतिहास में अन्धकार-युग कहा जाना चाहिए, क्योंकि यहाँ प्रतिहारों, राष्ट्रकूटों और पालों के आक्रमण  होते रहे और किसी का भी शासन सुस्थिर नहीं रहा। 9वीं शती के उत्तरार्द्ध में चन्देलों ने अपने पैर मजबूती से जमा लिए और इसी वजह से बुन्देली लोकभाषा का उद्भव और विकास सम्भव हो सका। शोध एवं आलेख – गौरीशंकर रंजन बुन्देली लोक नाट्य का उद्भव-काल  (1000-1400 ई.) Read More मध्ययुग का उत्कर्ष-काल (1401-1840 ई.) Read More लोक चेतना का पुनरूत्थान (1841-1910 ई.) Read More आधुनिक काल (1911-1986 ई.) Read More नाट्य रूप  और उसकी परम्परा Read More “दी रायल ड्रामाटिक सोसायटी चरखारी”  से  “दी जय हिन्द थियेट्रिकल कंपनी तक” Read More पारसी रंगमंच के परिप्रेक्ष्य में बुन्देलखण्ड का चरखारी थियेटर एवं लोक रंग Read More

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प्रवासी समिति

बुंदेलखंड़ विष्वकोष योजना के अंतर्गत ‘बुंदेलखंड़ में प्रवासी महाराष्ट्रीयनों की भूमिका ’भारत की हृदय-स्थली ‘बुंदेलखंड ‘ अपनी परंपरा और संस्कृति में विषेष है।मैत्री संबंधों का निर्वहन बुंदेलखंड की पहचान है।  मराठों का बुंदेलखंड में प्रवेष ऐसे ही मैत्री संबंधों का अनूठा उदाहरण है। बुंदेलखंड की धरती पर एकछत्र राज्य करने वाले महाराजा छत्रसाल के जीवन में , 82 वर्षीय अवस्था में सन् 1724 में एक समय ऐसा भी आया  कि उन्हें अपने साम्राज्य की रक्षा के लिए दो हजार किलोमीटर दूर के अपने मित्र -गुरू बाजीराव पेषवा को बुलाना पड़ा था। तब बुंदेला छत्रसाल ने कवि भूषण से लिखवाकर संदेष भिजवाया था कि ‘‘ जो गत भई गजराज की , सो गत जानियो आज /बाजी जात बुंदेल की , बाजी राखियो लाज ।’’  फिर  बाजीराव की सेना ने जबलपुर , सागर , दमोह , झांसी , ललितपुर आदि विविध मार्गों से बुंदेलखड में प्रवेष कर ,एक माह में युद्ध जीत कर छत्रसाल के राज्य की रक्षा की थी । युद्ध विजय की यह घटना ऐतिहासिक तो थी ही , मराठों के बुंदेलखंड में प्रवेष की वह अपूर्व घटना भी थी ,जिसमें बुंदेलखंड की भूमि में मराठी भाषा और संस्कृति का नवरोपण हुआ था। बाजीराव के साथ आई सेना में महाराष्ट्र से आए हुए योद्धा , ब्राह्मण ,रसोइए , सेवक आदि अनेक थे जो मराठी भाषा – संस्कृति के संवाहक थे।युद्ध विजय के बाद छत्रसाल और बाजीराव के संबंध अधिक घनिष्ठ हुए । छत्रसाल ने बाजीराव की वीरता से प्रभावित हो कर उन्हें अपना तीसरा पुत्र माना था और अपने साम्राज्य का 1/3 भाग तथा वार्षिक दो करोड़ की खेती के उत्पादन का हकदार बनाया था। इसी भू-भाग पर बाजीराव ने राज्य व्यवस्था के लिए दमोह , सागर , जबलपुर , झांसी में छावनियां बनाकर कर वसूली के लिए अनेक अधिकारी नियुक्त किए सन् 1750 के आसपास कर व्यवस्था को अधिक दुरूस्त बनाने के लिए बाजीराव ने गोविंद पंत खेर को पूरे लाव-लष्कर के साथ महाराष्ट्र से बुंदेलखंड रवाना किया था। गोविंद पंत खेर ने कर वसूली व्यवस्थापन के लिए बुंदेलखंड के चारों ओर छोटे-छोटे सूबे तैयार कर वहां महाराष्ट्रीयन तालुकेदार , किलेदार , मालगुजार ,सूबेदार नियुक्त किए जैसे- दमोह में करमरकर , सागर में सूबेदार , गुरसराय में खेर जालौन में हर्षे आदि को ससम्मान नियुक्त किया। इसी अवधि में बुंदेलखंड में ब्राह्मणों के लगभग हजार बारह सौ परिवार बसे। कालांतर में उन्हीं की पीढ़ियां यहां की स्थायी निवासी बन गईं।उद्देष्य –बुंदेलखंड की रक्षा के निमित्त यहां आए हुए महाराष्ट्रीयन , आज बड़ी संख्या में बुंदेलखंड के वासी हो चुके हैं। उन्होंने यहां की भाषा संस्कृति और परंपराओं को अपने ढंग से बहुतांष में आत्मसात कर लिया है। साथ ही उन्होंने अपनी मराठी भाषा -संस्कृति अस्मिता को भी जीवित रखा है।षिक्षित और खुली सोच की प्रवृत्ति के चलते इन मराठियों ने बुंदेलखंडी संस्कृति और बुंदेली भाषा से अच्छा-खासा समन्वय स्थापित किष है। बुंदेलखंड के साहित्य ,कला ,चिकित्सा ,विज्ञान आदि क्षेत्रों में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाकर इन्होंने बुंदेलखंड का नाम राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर आलोकित किया है। बुंदेलखंड की संस्कृति-परंपरा में प्रवासी महाराष्ट्रीयन , दूध में षर्करा की भांति घुलमिल गए हैं। इन्होंने यहां की सांस्कृतिक परंपरा को समृद्ध करने में बराबरी की भूमिका निभाई है। इसी संदर्भ में बुंदेलखंड विष्वकोष के अंतर्गत प्रवासी

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पत्रकारिता समिति

पत्रकारिता का फलक सभी विधाओं को समेटे है। जितने तरह के विषय हैं उतने ही तरह की पत्रकारिता भी होती है। यह अलग बात है कि किसी विषय को अधिक महत्व और स्थान मिल जाता है। बाकी को नहीं। इसकी वजह है कि आम जन में वो विषय अधिक लोकप्रिय हो जाते हैं। उनके बारे में जानने की उत्सुकता अपेक्षाकृत ज्यादा रहती है। पत्रकारिता की उप समीतियों में निम्न बिंदु शामिल किए जा सकते हैं।सांस्कृतिक पत्रकारिताखेल पत्रकारितासाहित्यक पत्रकारिताराजनीतिक पत्रकारिताशैक्षणिक पत्रकारितास्वास्थ्य पत्रकारिताअपराध पत्रकारिताधार्मिक पत्रकारिताविज्ञान पत्रकारितापर्यावरण पत्रकारिता पत्रकारिता विधा के आधार परअखबारी पत्रकारिताटेलीविजन पत्रकारितारेडियो पत्रकारिताडिजिटल पत्रकारिता समय के आधार परआजादी के कालखंड की पत्रकारिताआधुनिक पत्रकारिता भाषायी आधार पर१-हिंदी पत्रकारिता२-अंग्रेजी पत्रकारिता३-बुंदेली पत्रकारिता                   डॉ आशीष द्विवेदी निदेशक इंक मीडिया पत्रकारिता संस्थान सिविल लाइंस सागर

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शिक्षा समिति

शिक्षा का अपार विस्तार है । शिक्षा ही मानव जीवन की आधार शिला है । बिना शिक्षा के बिन गुरू ज्ञान के इस धरती पर प्रत्येक मानव प्राणी अधूरा है ।बुन्देलखण्ड विश्वकोष यह नवीनतम मुख्य उद्देश्य है कि समितियों के माध्यम से शिक्षा के क्षेत्र में अधिक से अधिक प्रचार प्रसार हो,प्राचीन काल से होता आ रहा, वर्तमान परिक्षेप में और व्यापक हो ।नई शिक्षा नीति लागू हो गई है जिसमें प्राथमिक, माध्यमिक हाई हायर स्कूलों में अध्यापन आरंभ है । शासकीय, अशासकीय  विद्यालयों एवं महाविद्यालयों में गुरूजन के ज्ञान की गंगा निरंतर प्रवाहित हो रही और अधिक ज्ञान-विज्ञान का संज्ञान हो, बुंदेलखंड में, ताकि शिक्षा नीति जन-जन तक पहुंचे शिक्षा समिति उप समिति का यही मुख्य उद्देश्य है । जो निम्नानुसार है1- बुंदेलखंड में प्राचीनकालीन शिक्षा व्यवस्था समितिगुरुकुल / आश्रम व्यवस्था समितिसंस्कार शिक्षा समिति,संगीत कला शिक्षा समिति2- मध्यकालीन शिक्षा व्यवस्था     बुंदेलखंड में मुगलकालीन शिक्षाउर्दू शिक्षा समिति,संस्कृत शिक्षा समिति,गुरु जनों द्वारा प्रदत्त समाजपोषी व्यवस्था हेतु शिक्षासमिति3- आधुनिक कालीन शिक्षा ।नई शिक्षा नीति समितिसंस्कृत शिक्षा समिति,साहित्य, संगीत, कला समितिप्रौढ़ शिक्षा समितिनारी शिक्षा समिति,खेलकूद समिति,ज्ञान- विज्ञान शिक्षासमिति,शासकीय विद्यालय,महाविद्यालय समितिअशासकीय प्राथमिक, माध्यमिक, उच्च शिक्षा समितिबुन्देलखण्ड विश्वकोश योजना हेतु शिक्षा समिति के द्वारा बुन्देलखंड की प्राचीन से लेकर आजतक की शिक्षा व्यवस्था पर कार्य किया जायेगा । नयी पीढी को ज्ञानवर्धक शिक्षा प्राप्त कराई जावे, यही बुंदेलखंड शिक्षा समिति  का उद्देश्य है । उपसमितियों के प्रभारियों की सूची तैयार की जा रही है ।बुन्देलखण्ड शिक्षा समिति प्रभारीडॉ प्रेमलता नीलमप्राचार्य, शास हायर, सेकेंडरीबी 29 काव्य कुंज,एलोरा कालोनीदमोहमोबाइल: 7354004190मेल: [email protected]

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