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बुंदेलखंड में सूर्य-पूजा

भगवान सूर्य सृष्टि के आदिकाल से ही प्रत्यक्ष देवता के रुप में पूजित हैं इसीलिये उन्हें ‘आदिदेव’ कहा गया है। वह प्रकाश, उल्लास, आरोग्य और तत्वज्ञान के स्रोत हैं। वैदिक साहित्य में उन्हें जीवनशक्तिप्रदायक तथा सर्वरोग विनाशक कहा गया है। ‘तमसो मा ज्योर्तिगमय’ का संदेश सूर्य से ही अनुप्राणित है। इनकी उपासना भारत में ही नहीं अपितु विश्व के अनेक देशों में विभिन्न नामों से की जाती है। विश्व में अनुमानतः ईसा से 6 हजार वर्ष पूर्व से लेकर 1400 ई. तक सूर्योपासना के प्रमाण मिलते हैं। विश्व का प्राचीन दर्शन सौर दर्शन ही है। ईरानियों के मित्र और ग्रीकों के हेलियस, मिस्रियों के ‘रा’ तातारियों के ‘फ्लोरस’, प्राचीन पेरु के फुलेस उत्तरी अमेरिका के रैड़ इंडियनों के एतना, अफ्रीका के तिले चीन के उ.ची 2 तथा जापान के इज्जागी’ सूर्य के नाम ही थे और वे सब इन नामों से सूर्य उपासना करते थे। यूनान का सम्राट सिकन्दर सूर्य उपासक था।’ प्राचीन भारत में पंच देवायतन अथवा पंचदेवोपासना प्रचलित थी। इन पंचदेवों में सूर्य के साथ विष्णु, शिव, गणेश तथा शक्ति की पूजा होती थी। इनमें एक प्रमुख देवता को केन्द्र में रखकर शेष को चार कोणों पर प्रतिष्ठित किया जाता था। इनके क्रम का निश्चित विधान है। इसी आधार पर पंचायतन मन्दिर शैली भी विकसित हुई। भारत में हिन्दू धर्म के साथ बौद्ध एवं जैन संप्रदायों में भी सूर्य-पूजा के प्रमाण मिलते हैं इस व्यापकता के कारण भारतीय सूर्योपासना इतनी प्रबल हुई कि उसका प्रचार इस देश के बाहर अफगानिस्तान, नेपाल, वर्मा, श्याम, कम्बोडिया, जावा-सुमात्रा आदि देशों में हुआ। इन देशों में सुरक्षित मूर्ति अवशेष आज भी इसका उद्घोष करते हैं। सूर्य के नाम पर सूर्यवर्मा आदि नाम विदेशों में प्रचलित हुये। संपूर्ण विश्व में रविवार सूर्य का दिन माना जाता है।

प्रतिमा विज्ञान के विकास के पूर्व ‘प्रतीक पूजा’ का विधान था। सूर्य की प्रतीक उपासना में चक्र अथवा कमल की उपासना की जाती थी। इन प्रतीकों पर आधारित सूर्य-उपासना के मंदिर भारत में ही नहीं विदेशों में भी मिलते हैं। दक्षिण अमेरिका के प्राचीन पेरु में एक ऐसे सूर्य मन्दिर होने का प्रमाण मिलता है। जहॉं  ‘सूर्यचक्र’ प्रतिष्ठित है। मूर्त रुप में सूर्य- प्रतिमा का प्रथम प्रमाण बोधगया की कला में है। भान्जा की बौद्ध गुफा में भी सूर्यप्रतिमा बोधगया की परंपरा में हैं। इनका काल ईसापूर्व प्रथमशती है। इस आधार पर यह अनुमान किया जा सकता है कि ईसा की प्रथमशती पूर्व तक सूर्य की प्रतीक उपासना का विधान था। कालान्तर में प्रतिमा उपासना प्रारम्भ हुई। निष्कर्षतः प्रतीक-उपासना के केन्द्रों की निर्माण तिथि ईसा से प्रथम शती पूर्व है। भले ही उनका विस्तार और पुनर्निर्माण बाद में हुआ है।

बुंदेलखंड में भी सूर्य उपासना तथा मंदिरों की यह दोनों कोटियां मिलती है। यह क्षेत्र मुख्यतः वनाच्छादित था यहॉं अनेक ऋषियों और मुनियों के आश्रम थे। वेद और पुराणों की रचना यहीं कालपी में महामुनि वेदव्यास ने की थी। वन क्षेत्रों में पूजित लोक देवताओं की भाँति सूर्य की प्रतीक उपासना चबूतरों पर चक्र या कमल प्रतिष्ठित करके की जाती होगी। कालान्तर में नागर सभ्यता के विकास के बाद वहॉं  मन्दिरों का निर्माण हुआ होगा।

प्रतीक पूजा की दृष्टि से बुंदेलखंड में दो मन्दिर उल्लेखनीय है- प्रथम उनाव (जिला दतिया) तथा द्वितीय गोरा (जिला टीकमगढ़) में। इन दोनों में सूर्य के प्रतीक चक्र देवरुप में प्रतिष्ठित हैं। इन दोनों के गर्भगृह भी चारों ओर से खुले हैं, जिससे हमारा उक्त अनुमान सही ठहरता है।