पं बाबूलाल द्विवेदी स्वतन्त्र्योत्तर काल के रचनाकार हैं। जिसमें नव-युग के नव-सृजन परिलक्षित होते हैं।
रचनावली-जोषी (ज्योतिषी) में ज्योतिष विधा को सम्रगता से रूपायित किया गया है।
कायस्थ-दीपिका में द्विवेदी जी ने कायस्थ संकुल का विवरण प्रस्तुत किया है।
विशुद्ध विवाह पद्धति में पं. बाबूलाल द्विवेदी ने वैवाहिक संस्कार की पद्धति को सही रूप में प्रस्तुत किया है।
बानपुर विविधा में लेखक ने क्रांतिपथ में बानपुर के योगदान से अवगत कराया है।
ऐसे बहु-प्रतिभा के साहित्य मनीषी द्विवेदी जी ने उपन्यास क्षेत्र में पुरातन को नवयुग के सृजन के रूप में एक ‘लघु उपन्यास’- “अमर प्रणय का प्रतीक खजुराहो” की रचना की है।