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भगवान दास श्रीवास्तव

जन्‍म – 23 अक्टूबर  1919 ई.

जन्‍म स्थान – टीकमगढ़ (म.प्र.)

जीवन परिचय –

वर्तमान पता – 28 बघेरा अपार्टमेंट, अरेरा काॅलोनी, भोपाल (म.प्र.)

रचना –  बेतवा की सुन्दरी , लाला हरदौल का विषपान

अन्य –  बुन्देलों का इतिहास (सह लेखन)  , हरिजन आश्रम , 1857 की क्रांति और राजा बखत बली

कहानी – झाँसी की रानी असमंजस (संग्रह)

उर्दू – बाँदा का विद्रोही नवाब अली बहादुर (द्वितीय) , 1857 की क्रांतिकारी तेजा बाई

भगवान दास श्रीवास्तव टीकमगढ़ की क्रांति भूमि में पैदा हुये। आपने बुन्देलखण्ड की क्रांति का साधिकार लेखन किया है। आप हिन्दी अंग्रेजी व उर्दू के प्रख्यात विद्वान रहे। आपके लिखे उपन्यास-  वेतवा की सुन्दरी , लाला हरदौल का विषपान आज भी साहित्य की धरोहर हैं।

  1. वेतवा की सुन्दरी – (प्रकाशन सन् 1989 ई.)

वेतवा के सुरम्य तट पर स्थित ओरछा बुन्देलों की राजधानी रही। जिसका गौरव व ‘रामराजा सरकार’ का वैभव देश-विदेशों तक फैला है। इसके राज्य की कीर्ति कालिंजर से लेकर कालपी तक फैली थी। इसी प्रकार वेत्रवती का गुणगान वेदों में भी हुआ है। इसी राज्य की सुन्दर नृत्यांगना ‘राय प्रवीण’ भी यहाँ की शोभा रही। जिसके विषय में अनेक विद्वानों ने लिखा है। डॉ. भगवान दास श्रीवास्तव ने ‘वेतवा की सुन्दरी’ नाम से राय प्रवीण पर यह उपन्यास लिखा है। जिसका संक्षिप्त चित्रण इस प्रकार है-

वेतवा की सुन्दरी का जीवन चरित्र ‘राय प्रवीण’ नृत्यांगना का ही है। यह एक ऐतिहासिक उपन्यास है। इसकी नायिका प्रवीणराय है। उपन्यास की कथावस्तु वास्तव में राजा इन्द्रजीत-रक्षित उनकी जागीर ‘कछौवा’ के लुहार की अप्रतिम सुन्दर पुत्री है। राजा उस पर मोहित हो ओरछा ले आये थे। यहाँ नृत्य-गायन व काव्य का ज्ञान ‘कवि केशव दास’ ने दिया। इस प्रकार वह ओरछा राज्य की शोभा बनी। उसके चरित्र के विषय में अनेकानेक बातें लोगों में फैली। अकबर का प्रसंग इसी तरह जुड़ा है। भगवान दास श्रीवास्तव का यह उपन्यास 1989 ई. में प्रकाशित हुआ। जिसमें इसका नाम ‘पुनिया’ लिखा है। इसका निवास ‘वरद्वारा’ माना गया है। इससे जुड़े अनेक कथ्य एवं तथ्य प्रचलित हैं।

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