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बिहारी लाल

बिहारी लाल

जन्म  –  सं. १६६० वि. मृत्यु सं. १७२० वि.

स्थान  – वसुआ गोविन्दपुर, ग्वालियर।

जीवन परिचय

बिहारी श्रृंगार रस काव्य के महान कवि थे। इनकी ‘बिहारी-सतसई’ काव्यकला की बेजोड़ कृति है। इनके दोहों में रस व्यंजना का परिपक्व समावेश मिलता है जो लोगों के हृदय में भीतर तक चोट करते है। बिहारी के इसी पांडित्य से हिन्दी साहित्य उन्हें अमूल निधि मानता है। किन्तु बिहारी का बहुत कुछ साहित्य बुन्देली में भी लिखा है। सुना जाता है कि बिहारी के पिता केशव राय ग्वालियर से ओरछा में आ गये थे। बिहारी की भेंट यहॉं कवीन्द्र केशव से हुई। उन्होंने शिष्यवत उनसे काव्य-ज्ञान प्राप्त किया। बाद में बिहारी मथुरा अपनी ससुराल चले गये थे। जो इस दोहे से स्पष्ट होता है-

           “जन्म ग्वालियर जानिए, खंड बुंदेले बाल।

           तरुणाई आई युवा, मथुरा वसि ससुराल ।।”

बुंदेलखंड भूमि ऐसे कवि की भूमि बनने के गौरव से सुशोभित हुई जिसने हिन्दी बुन्देली ब्रज में अपनी काव्य प्रतिभा का प्रदर्शन कराया। भाषा ब्रज-बुन्देली के साथ उर्दू-फारसी शब्दों से समृद्ध, सरल, सरस और भावप्रवण है। दोहों का प्रयोग इनकी कविता में हुआ है। अलंकारों से अलंकृत है और नीति विषयक उक्तियों का सफल सामंजस्य है। इनकी भाषा में नाउ-धरई-चोचे-दहाइ, धरहाइ, धैरा जैसे बुन्देली शब्दों का समायोजन देखने को मिलता है।

(बांकेबोल बुन्देली से सभार)

“तउ ग्योंडो घर को भयो पैड़ो कोस हजार” शुद्ध बुन्देलीबानी है। इसी तरह इस दोहे में बुन्देली भाषा का सुन्दर प्रयोग कर बिहारी ने अपनी कर्मभूमि बुंदेलखंड और यहॉं की भाषा का मान बढ़ाया है –

           “जदपि नहीं नाहीं बदन लगी यहे जक जात।

           तदपि मोह हांसी भरी हांसीयै ठहरातं।”

इस दोहे में श्लेष और हांसियै बुन्देली भाषा के है जिनका प्रतिपादन गंगाराम शास्त्री जी ने किया है। बिहारी ने अपनी कविता में अन्यान्य सफल प्रयोग किये है उनमे से एक गणित-फलित ज्योतिष का संयोजन दृष्टव्य है –

           “कहत सबै बेदी दएँ, आंक दस गुनो होत।

           तिय लिलार बेंदी दएँ, अगनित बढ़त उदोद।।

           श्रृंगार के पुराधा बिहारी ने बुंदेलखंड में रस की नीव डाली।

           पत्रा ही तिथि पाइये वा घर के चहुँ पास।

           नित प्रति पूनौ ही रहै आनन औप उजास ।।”

           “छाले परबै के डरन सकै न हाथ छुवाइ।

           झिझकत हियै गुलाब कै झवा झिझावति पाइ।।”

           “औघाई सीसी सुलखि, बिरह ज्वाल बिललात।

           बिच ही सूखि गुलाब गयौ, छीटो छुयौ न गात।”

बिहारी ने श्रृंगार के साथ भक्तिभाव के काव्य की रचना की है जो उनकी काव्य प्रतिभा को द्विगणित कर देती है –

भक्ति  –   “मोहू दीजै मोष, जो अनेक पतितन दयौ”

जन-नायक    –    “कबकौ टेरत दीन है, होत न स्याम सहाय।

                      तुमहूँ लागी जगत गुरु, जन नायक जगबाय।

                      मोहू दीजै मोष, जो अनेक पतितन दियो ।

                      जो बांधे ही तोष, तौ बांधो अपने गुननि।”

इस प्रकार बिहारी ने बुन्देली भाषा के शब्दों का प्रयोग कर अपने जन्म स्थान की महिमा बढ़ाई है। इसके साथ बुन्देली भाषा को साहित्यिक रूप प्रदान किया है। यही आगे के कवियों के काव्य में दर्शनीय है। श्रृंगार और वीर रस की कविताओं का प्राधान्य इस समय की विशेषता बन गई थी। ‘श्रृंगार’ की सुरक्षा वीर रस के कवियों ने सम्भाल रखी थी। इससे देश व क्षेत्र में समाज को सही दिशा-निर्देश मिल रहे थे।

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