दालें द्विदल धान्य की श्रेणी में आती है अन्य दालों की तरह चना दाल को भी पकाया जाता है । बुन्देलखण्ड में चना दाल विवाह के अवसर पर बनती है। सगाई के समय "समूदी" रोटी बनने पर चना दाल अनिवार्य होती है यूँ तो प्रत्येक दाल का अपना अलग स्वाद होता है उनमें चना दाल का स्वाद भी अद्वितीय होता है । किसी भी मौसम में उपयोगी होती है । चना दाल को फुलाकर फिर तेल में तलकर नमकीन चिवड़ा में मिलाकर खाने का स्वाद बढ़ाती है तब इसे 'देवली' कहते हैं कच्ची दाल को 'देओल' कहते हैं। इससे बहुत प्रकार के पकवान तैयार होते हैं मीठा भी नमकीन भी ।
सामग्री - चना दाल, हींग, जीरा, मिर्च, नमक, हल्दी, धनिया पाउडर, प्याज, लहसुन, लौंग, धनिया पत्ती हरा, तेल, टमाटर या आम की खटाई ।
विधि - चना की दाल को साफ कर आधा घंटे के लिए फूलने डाल देवें। फिर कुकर में उबलने रखें। कुकर में पन्द्रह मिनिट में पक जायेगी । डायरेक्ट रखने में समय लगेगा । पकने के बाद पतीली (गंज) को गरम आँच पर रखें तेल डालें गरम होने पर हींग, जीरा और लौंग पीसकर डाल देवें इसके बाद प्याज लहसुन को महीन काटकर डालें हल्का भुंज जाने के बाद मिर्च, हल्दी, धनिया पाउडर, नमक डालें । सम्पूर्ण मसाला भुंज जाने के बाद टमाटर के छोटे टुकड़े करके डाल देवें यदि टमाटर उपलब्ध नहीं है तो अन्य खटाई जैसे आम डालें ध्यान रखें खटाई कम स्वादानुसार ही डालें। दस मिनिट दाल को धीमी आँच पर उबलने देवें फिर उतार लेवें । लीजिए चना दाल तैयार ।
पौष्टिक तत्व - चना दाल- प्रोटीन, टमाटर-विटामिन 'सी', प्याज, लहसुन, हींग, जीरा, लौंग- खनिज लवण पाये जाते हैं ।
प्रोटीन की अधिकता होने के कारण गर्मी के दिनों में बैक्टीरिया पनपते हैं तब दाल खराब हो जाती है। इसलिए ध्यान रहे गर्मी के मौसम में किसी भी प्रकार की दाल पकाने के बाद भोजन में उपयोग करें यदि बच जाती है तो ठण्डे स्थान जैसे फ्रिज में रख देवें । प्रोटीन का गुण चिपचिपा होता है । पाचनशील, शक्तिदायक, रोगरोधक क्षमता को बढ़ाता है । किन्तु अधिकता हानिकारक होती है । चना से बने खाद्य पदार्थों का उपयोग आहार आयोजन में रखा जाना आवश्यक है । किन्तु अधिकता न हो इस बात का ध्यान गृहिणी को एवं चने के व्यंजन ग्रहण करने वाले को है | रखना होगा। वायु विकार से बचने के लिए अजवाइन का उपयोग करें जो स्वास्थ्यवर्धक है।