आर्य, हर्ष काल में जंगली फल की श्रेणी में चयनित किया गया जंगली जातियों कौल-भील इसका इस्तेमाल भोजन में करते थे । राजा, महाराजा सैनिकों के साथ आखेट को निकलते थे रास्ते में कैथा के पेड़ दिखते थे कैंथा का आकार बड़ा होता है तत्व ठोस होता है ऊपर से कढ़ा पत्थर की तरह दृढ़ होता है शिकारी लोग पेड़ से कैंथा तोड़ते और क्षुधा भगाने के लिए खाने लगते थे । धीरे-धीरे कैंथा खाने में प्रचलित हुआ नमक के साथ हरी मिर्च के साथ फिर चटनी का रूप ले लिया । चन्द्रेल काम में भजिया, मंगौड़ी नाशते में तैयार की जाती थी तभी कैंथा की चटनी का प्रयोग किया गया और कैंथा का उपयोग बड़ी रूचि के साथ होने लगा । बुन्देलखण्ड में प्रत्येक खेत की मेढ़ के किनारे कैंथा का पेड़ होता है, प्रत्येक गाँव में कैंथा की उपज होती है । कैथा कैल्शियम युक्त होता है ।
कैथा की चटनी
personडॉ. प्रेमलता नीलम sourceस्रोत: बुंदेलखंड के व्यंजन की वैज्ञानिकता
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