बुन्देलखण्ड का रूचिकर एवं प्रसिद्ध व्यंजन है । कढ़ी विवाहोत्सवों पंगतों में सगाई होने पर जिसे पक्यात कहते हैं दार, बरी, कढ़ी, बरा का प्रचलन पक्यात में हैं कढ़ी प्रत्येक वर्ग समाज का रोचक व्यंजन है। आरम्भ में "कढ़ी बरी" कहा गया फिर अकेले कढ़ी से काम चला वर्तमान में बेंगन कढ़ी, लौकी कढ़ी, भिण्डी कढ़ी, औरिया, सूखे आँवले अर्थात उरगठी की कढ़ी, पालक, चना दाल कढ़ी का प्रचलन आया । आर्य, हर्षकाल से कढ़ी बरी का प्रचलन रहा है । वह आज भी है ।
सामग्री - बेसन, राई, मेथी, हींग लाल या हरी मिर्च, हरा धनिया पत्ती (कढ़ी पत्ता) मीठी नीम पत्ता, नमक मठा या दही, तेल, हल्दी, धनिया पिसा उपरोक्त सभी सामग्री आवश्यकतानुसार । सदस्य संख्या के अनुसार बेसन, मठा या दही लेवें । कढ़ी, दही और मठा दोनों की बनती है पंसदानुसार ।
विधि - मठा की कढ़ी ज्यादा प्रचलित है स्वाद बदलने का दही का प्रयोग होता है । एक किलो मठा में 100 ग्राम बेसन घोलें । आग की धीमी आंच पर गँज रखें गरम होने पर थोड़ा तेल डालें । सर्वप्रथम हींग का बघार देवें, राई मैथी दाना छोड़े । मठा में बेसन के साथ हल्दी, मिर्च धनिया पाऊडर घोल लेवें, बघार लगाते ही घोल गंज में डालें करछली से घुमाते जावें । आवश्यकतानुसार नमक डालें । बघार के बाद कढ़ी पत्ता डाल देवें । 30 मिनिट तक धीमी आँच में उबलने दें । भजियानुमा बरी की सामग्री तैयार करें । बेसन में नमक, थोड़ी मिर्च मिलाकर फेंटे। कढ़ाई में तेल डाल कर छोटे आकार में गोल बरी सेंककर तुरंत कढ़ी में डालें । तुरंत डालने में कढ़ी में रच पग जाते है । बरी याने छोटे-छोटे आकार के भजिया भी कहते हैं। धीमी आँच में उट जाने के बाद नीचे रखें धनिया पत्ती साफ कर काटकर कढ़ी में डालें । लीजिये बुन्देली कढ़ी तैयार । कढ़ी की खुशबू घर के बाहर तक फैलती है तब पड़ोसियों को पता चलता है कि अमुकघर में कढ़ी बनी है । विवाहोत्सवों में विशेषकर मण्डप के दिन विवाह पश्चात् दशमीं पर और लड़कों के विवाह पर बारात जाने के बाद बाबा-बाई गौरइयों के खेल के पश्चात् कढ़ी चॉवल बरा पापड़ बनते हैं। यह व्यंजन स्वादिष्ट तो रहता है । पाचक होता है। तृप्ति देता है। इसी तरह उपरोक्त विधि के अनुसार भिण्डी, भटा, लौकी, औरिया पालक चना दाल की कढ़ी निम्नानुसार है -