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प्राणनाथ

प्राणनाथ

जन्म  –  १६८५ वि.

कविताकाल  –  सं. १७१० वि तक

जीवन परिचय

ग्रन्थ        –    कीर्तन, कयारमत नामा, पदावली, प्रगटवाली, ब्रह्मवाणी, राज विनोद, बीस गरोहों का बाप।

प्राणनाथ संत कवियों की श्रेणी के बुंदेलखंड के कवि है। इनका असली नाम मेहराज था। आपके गुरु ने इन्हें प्राणनाथ की उपाधि से अलंकृत किया था तभी से आप प्राणनाथ के नाम से जाने जाते है। प्राणनाथ बुन्देल केसरी महाराज छत्रसाल से सम्मानित रहे। प्राणनाथ के काव्य में अपने काल की छाया स्पष्ट परिलक्षित होती है।

           “चन्द्रबिन सांस है रजनी, सरोज बिन सखर,

           तेज बिन तुरग, मतंङ्गः बिन मद को।

           बिनु सुत सदन नितम्बिनी सुपति बिनु

           धन बिनु धरम नृपति बिन पद को।

           बिनु हरि भजन जगत सोहै जग कौन,

           नोन बिनु भोजन विटप बिना छद को।

           प्राणनाथ सरस समान सौहै कवि बिनु,

           विद्या बिन बात न नगर बिना नद को।”

जिस प्रकार बिना रात्रि के चन्द्रमा की उपस्थिति और मल विहीन सरोवर, घोड़ा का वेग विहीन होना अस्तित्व नहीं है। उसी प्रकार बिना बच्चों का घर, बिना पति की स्त्री धर्मविहीन राजा और धर्मबिना कौन शोभायमान हो सकता है। उसी प्रकार नमक रस विहीन भोजन और रसप्लावित कविता ही अच्छी मानी जाती है। इनकी वाणी ने समाज को नई दिशा दी थी। इसीलिये प्राणनाथ को संतों की भांति आदर और सम्मान मिला। धर्म पर हो रहे आक्रमण की रक्षा उन्होंने धर्म-प्राण समाज को आश्वस्त किया और उन्हें सजग बनाये रखा।

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