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बुंदेलखंड विश्वकोश

ठाकुरदास

ठाकुरदास

जन्म  –  सं. १७२२ वि. लगभग

कविता काल  –  सं. १७४० वि. से प्रारम्भ

जीवन परिचय

कविवर ‘ठाकुर’ का जन्म बुंदेलखंड के गढ़कुंडार ग्राम में पं. हाथी राज के यहाँ हुआ था। आपका पूरा नाम ठाकुर दास था। कविता आपको विरासत में मिली। आपका वंश-कुल इस प्रकार है-

           पं. हाथीराज

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           पं. ठाकुरदास

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           पं. बेनी प्रसाद

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           पं. बाल बालमुकुन्द

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           पं. धरनीधर

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           पं. राजाराम तिवारी

आपने अपना परिचय इस काव्य रूप में दिया है-

           “सुन्दर सुहाई मन भाई पावन प्रसिद्ध,

           कीरत भई है सो संसार में।

           ऊँचे-ऊँचे परबत रोज परककम्पादेत,

           आस-पास झाड़ी गिद्धवासनी मझर में।

           राज है बुन्देलन कौ, कीरति नित फैल रही,

           देखौ होय कहि ‘ठाकुर’ रहत है कुड़ार में।”

इस प्रकार बुन्देलखण्ड निवासी अन्य तीसरे ठाकुर कवि की भांति ही इस ठाकुर कवि ने अपना परिचय काव्य में दिया है। अन्य कवियों की तरह ‘ठाकुरदास’ कवि भी राजा-श्रयी कवि रहे।

राजाश्रय –  ठाकुर कवि के काव्य-प्रतिभा से प्रसन्न हो तत्कालीन ओरछा नरेश ने उन्हें राज दरवार के कवि का आदर देकर प्रतिवर्ष साहित्य सहायता धन-राशि आठ आना प्रति गाँव के हिसाब से प्रदान किया था। जिसे ‘मचकूरात’ कहते थे।

राज-श्लाघा  –  दरवारी कवि होने का प्रमाण कवि की इस रचना में देखने को मिलता है।

           “आवत प्रवल दल जल पल बल मध्य,

           खल दल वल बीच मीच खलवंत पारैगौ।

           कहै रिपु नारियों के विचार सार-धार हिय,

           दै मुरारि नारि तुय मुरारि रार हारैगौ।

           ‘ठाकुर’ कहत आज्ञा पाय, भगवंत जू की,

           ऐहे हनुमंत कंत दंत तुय उखारैगौ।

           गैहै बकरी सौ फिरेहै चकरी सौ,

           भट काट ककरी सौ टोर लकरी सौ डारैगौ।”

इस प्रकार महाराज श्री भगवंत जू की श्लाघा बुन्देली काव्य की अलौकिक झटा विखेरत हुई कवि ठाकुरदास ने कर अन्य समकालीन कवियों की परिपाटी का निर्वाह किया।

काव्य भाव  –  कविवर ‘ठाकुरदास ने अपने काव्य में बुन्देली की श्रेष्ठ परम्परा का दृग दर्शन कराया है। भाषा सरल-सुबोध और प्रवाह युक्त है। जो इस छन्द में देखने को मिलती है। यह भाषा रूप भी समाकलीन बुन्देलखण्ड के कवियों से विलक्षण है।

           “दस वार बीस वार वरज दई जाय, जब

           ऐतै पै न मानै तो जरन देव वरन देव।

           कैसौ कहा कीजै कछु आपनौ करौ न होय,

           जीकै जैसे दिन ताहि तैसे ही भरन न देव,

           ‘ठाकुर’ कहत मन आपनौ निःसंक राखौ,

           प्रेम निःसंक हरि रंग में बहन देव।

           विधि के बनाये, जीव जेते जहाँ के तहाँ,

           खेलत फिरत तहाँ खिलन, खिलन फिरन देव।”

इस रचना में कवि ने मनुष्य की मानसिकता का अद्भुत चित्रण किया है और अंत में अपनी सम्मति देते हुये सामाजिक सुधार का कार्य किया है। आपके काव्य की विलक्षणता इस बात से भी प्रमाणित होती है कि आपके एक कवित्त के दो-दो अक्षरों को छोड़कर क्रम से पढ़ने पर कवित्त से अड़तालिस कवित्त निकलने की बात कही है। यथा-

           “द्वै द्वै अक्षर छांड़ि के क्रम से वाँचों मित्त।

           निकसै एक कवित्त ते अड़तालीस कवित्त ।”

जैसे कि- “यहै मम, मान, यहै गतनीक तजौधन-धाम त्रिया मुखचन्द” आदि इस प्रकार कविवर ठाकुर दास का काव्य रूप, अनुपम, विलक्षण एवं अन्य तीन ठाकुर कवियों से भिन्न और विलग है।

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