तोमर काल से भोज्य पदार्थ में प्रचलित है। पौष्टिक तत्व युक्त है "बफोरी” । यह व्यंजन बाफ द्वारा पकाया जाता है इसलिए इसे बफोरी कहते हैं बाफ के द्वारा पकाया गया व्यंजन पौष्टिक तत्वों से युक्त होता है । वर्तमान में बफोरी का उपयोग गाँव, शहर में सब्जी बनाने में और सूखी नाश्ता के रूप में उपयोग किया जाता है । चना दाल के अतिरिक्त मूंग दाल से भी बफोरी तैयार की जाती है । सुगर मरीज इसका सेवन कर सकते हैं लाभकारी हैं।
सामग्री - चना दाल, हरी या लाल मिर्च, हींग, जीरा, नमक, धनिया पत्ती । बफोरी की सब्जी बनाने के लिए सब्जी का मसाला, प्याज, लहसुन, अदरक, गरम मसाला, तेल ।
विधि - चना की दाल साफ कर रात्रि में फूलने डाल देवें । सुबह चना दाल को पानी से धोकर सिल बट्टे से पीस लेवें । पिस जाने के बाद मिर्च, नमक, हींग, जीरा मिला देवें । बड़े गंज (पतीली) में पानी डालें पौन गंज पानी हो । गंज के ऊपर साफ कपड़ा बाँध देवें । फिर गँज आग पर चढ़ा देवें, कपड़ा ऐसा बाँधे की आग में जलने न पाये । पानी में जैसे ही खौल आ जावे तब पिसी हुई दाल जिस तरह से बरी बनाते छोटे-छोटे रूप में कपड़े के ऊपर रखते जावें । कपड़े का एरिया जब पूरा भर जावे तब एक ढक्कन ऊपर से ढक देवें पन्द्रह मिनिट बाद ढक्कन खोलें और प्लेन झरिया अर्थात जिसे कोंचा कहते है बफोरियों को उलट-पलट देवें । दस मिनिट के लिए पुनः ढक्कन ढँक देवें । दस मिनिट बाद ढक्कन खोल कर बफोरी निकाल लेवें । लीजिए सभी परिवार को प्रात:कालीन नाशता में बफोरी किसी भी चटनी के साथ खिलावें । आलू बरी सब्जी की तरह बफोरी की भी सब्जी पकायें जो स्वादिष्ट लगती हैं। प्याज, लहसुन, अदरक, मिर्च, धनियाँ हल्दी पाउडर के साथ तेल में मसाला पूर्णतः भूज देवें टमाटर डालें । फिर बफोरी डाल देवें पानी इतना डालें जितनी सब्जी रसीली बनना हो । धीमी आँच में उटने रख दीजिएगा। फिर हरा धनिया पत्ती डाल देवें । दोपहर या रात्रि कालीन बियारी अर्थात आधुनिक समय का डिनर में उपयोग करें। यह शुद्ध बुन्देली सब्जी है ।
पौष्टिकता - चना दाल-प्रोटीन, कार्बोज खनिज लवण हींग, जीरा मिर्च-खनिज लवण, धनिया पत्ती- कैल्शियम ।
भोजन पकाने की तीन विधियाँ होती हैं - 1. उबालना 2. भूनना या तलना 3. बफाना अर्थात् भाप के द्वारा भोजन पकाने से खाद्य सामग्री में उपस्थित पौष्टिक तत्व नष्ट नहीं होते अतः भोजन पकाने की विधि में बफाना सर्वोत्तम विधि मानी गई है । वर्तमान में प्रेशर कुकर द्वारा पकाया गया दाल, चावल या सब्जी में पोषक तत्व विद्यमान होते हैं। पुराने जमाने में कुकर तो नहीं था किन्तु गृहणियाँ मिट्टी के बर्तन में धीमी आँच पर ढक्कन ढँक कर दाल-चावल पकाती थी । चॉवल से माड़ नहीं निकालती थी उस विधि को बिना पसाये चावल कहते थे । कढ़ी, दाल मिट्टी के बर्तन में जब बनती तब स्वादिष्ट और पौष्टिक होती थी । मिट्टी के बने बर्तन को जिसमें दाल सब्जी, चॉवल, कढ़ी, महेरी, खीर, दूध, दही रखा जाता था उसे हड़िया कहते थे । आज कम प्रयोग होता है, मिट्टी बर्तनों का यदाकदा गाँव में इसका उपयोग होता हो ।