अक्षर: इ
अक्षर 'इ' से शुरू होने वाली कहावतें
arrow_back वापस जाएंइक तो नागिन उर पंख लगायें।
एक तो नागिन और ऊपर से पंख ! पहिले ही भयंकर थी, अब और भी विकट हो गयी।
इक लख पूत सवा लख नाती। ती रावन घर दिया न बाती।।
धन, यौवन और बड़े कुटुम्ब का गर्व नहीं करना चाहिए। ईश्वर का कोप होने पर सब पल भर में विलीन हो जाता है जैसे रावण का हुआ।
इकहरिए मिलौ न ताव1। परकड़ए मिलौ न भाव।।
(1.तुर्त-फुर्त काम करने का अवसर। काम की गर्मी।) ऐसा किसान जिसके पास केवल एक हल हो समय पर जुताई-बुवाई का काम नहीं कर पाता, उसी तरह दूसरे का ऋण लेकर काम करने वाला किसान भी गल्ले को उचित भाव पर नहीं बेच पाता, क्योंकि साहूकार का ऋण चुकाने के लिए मनमाने भाव पर दे देना पड़ता है।
इतै कौन कोऊ ताते पानी कौ सपराव है ?
यहाँ कौन कोई गरम पानी का नहलाया हुआ है। अर्थात् हम भी सुकुमार नहीं।
इतै धरीं इँदरसे1 की जरें !
(1.पीसे हुए चावल की बनी एक प्रकार की मिठाई।) प्रायः ऐसे ऊघमी बच्चों के लिए प्रयुक्त जो घर आकर माँ को तंग करते और इधर-उधर की चीजें खाने को माँगते हैं।
इत्ते की कमाई नई जित्ते कौ लाँगा चिंथ गओ।
इतने की तो कमाई नहीं, जितने का लहँगा फट गया।
इत्ते की तौ भगत नई जित्ते के मँजीरा फूट गये।
इतना तो देवी की पूजा से प्रसाद नहीं मिला जितने के मँजीरा फूट गये।
इन तिलन में तेल नइयाँ।
इन तिलों में तेल नहीं। अर्थात यहाँ कुछ पाने की आशा न रखो।
इनई आँखन बसकारो काटो ?
इन्हीं आँखों से वर्षा के चार महीने काटोगे ? सामने रखी हुई वस्तु भी न दिखायी दे तब प्रयुक्त।
इमली के पत्ता पै कुलाँट खाभो।
अर्थात मौज करो। चैन की बंसी बजाओ। अवसर चूके व्यक्ति के लिए प्रायः व्यंग्य में प्रयुक्त।
ईख लौं खेती, हाथी लौं बनज।
ईख की खेती से बढ़ कर खेती नहीं; हाथियों के व्यापार से बढ़ कर व्यापार नहीं।
ईंट खिसकी सो खिसकी।
दीवार की एक ईंट खिसक जाय तो फिर सँभालना मुश्किल होता है। उसी प्रकार एक बार बिगड़ा काम फिर नहीं सँभलता।