अक्षर: ओ
अक्षर 'ओ' से शुरू होने वाली कहावतें
arrow_back वापस जाएंआँगन1 बिना गाड़ी नई ढँड़कत।
(1.गाड़ी की धुरी में लगायी जाने वाली चिकनाई जिससे पहिया आसानी से फिरे।) आँगन के बिना गाड़ी नहीं चलती। अर्थात पैसा दिये लिये बिना काम नहीं चलता।
ओई बाँस के डला टोकना, ओई के चलनी सूप।
उसी बाँस के डलिया-टोकरी बनता है, और उसी के चलनी-सूप। दो सगे भाइयों अथवा भाई-बहिनों में परस्पर प्रेम जताने के लिए कहते हैं।
ओझा कमिया, बैद किसान। आँड़ू बैल अर खेत मसान।।
ओझागिरी करने वाला हलवाहा, वैद्य किसान, बिना बधिया किया बैल, और श्मशान का खेत, ये चारों विपत्ति के कारण होते हैं।
ओर न छोर बड़ार1 काय पै हो रई।
(1. भाँवर के दूसरे दिन की बड़ी पंगत।) विवाह का तो अभी कुछ ओर-छोर नहीं लगा, फिर पंगत की तैयारी किस बात पर हो रही है? पूरे प्रबंध के बिना किसी कार्य को शुरू कर देने पर प्रयुक्त।
ओस के चाटें प्यास नई बुझत।
जहाँ अधिक की आवश्यकता है वहाँ थोड़े से काम नहीं चलता।
औगुन तब खाँ सेंतिये, गुनें न पूँछे कोय।
अवगुण से तभी काम लो जब कोई गुण को न पूछे।
औसर कौ चूको किसान और डार की चूको बँदरा।
किसान यदि अवसर पर काम करने और बंदर एक डाल से दूसरी डाल पर उछलते समय चूक जाय तो फिर वह सँभलता नहीं। पा० असाड़ की..
औसर चूकी डोमनी1, गावे ताल बेताल।
(1.डोम की स्त्री) जब कोई उत्तेजित होकर ऊट-पटांग काम करने लगे या बकने लगे तब प्रयुक्त।