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अक्षर: ठ

अक्षर 'ठ' से शुरू होने वाली कहावतें

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ठगाये सेई ठाकुर।

घोखा खाकर ही आदमी सयाना बनता है।

ठठेंरें ठठेरें बदलाई नई होत।

एक-सा काम या व्यवसाय करने वालों में आपस में लेन-देन का झगड़ा क्या ?

ठंडो नहाय, तातौ खाय। ताकें बंद कबहुँ ना जाय।।

नित्य ठंडे पानी से नहाने और गरम खाना खाने से कभी वैद्य की आवश्यकता नहीं पड़ती।

ठवाकुरो1 पड़वा जबरई चोंखत।

(1-ठोकरी भैंस का पड़ा। ऐसा पड़ा जो उम्र में एक वर्ष से अधिक का हो और जिसकी माँ ने दूध देना बन्द कर दिया हो अर्थात कम दूध देती हो।) भैंस का एक वर्ष का पड़ा स्वाभाविक रूप से मजबूत होता है और वह जबर्दस्ती माँ के थनों में मुँह डाल कर कुछ-न-कुछ दूध चोंख ही लेता है। अतः जब कोई आदमी बल-प्रयोग करके दूसरे से कुछ छीन ले और दूसरा कुछ कह न सके तब कहते हैं।

ठाकुर हते सो गये, ठग रै गये।

भले आदमी तो चले गये, केवल ठग रह गये।

ठाँड़ी खेती गाभिन गाय। तब जानों जब मों में जाय।।

खड़ी फसल के अनाज को घर में लाने और गाभिन गाय के दूध को प्राप्त करने के मार्ग में सैकड़ों बातें बाघक हो सकती हैं, अतः जब ये खाने-पीने को मिल जायें तभी समझो कि वे वास्तव में उत्पन्न हुईं।

ठाँड़ो बैल खूँदे सार।

बेकार बंधा हुआ बैल अपने बँधने के स्थान को ही खोदता है। निठल्ले आदमी को व्यर्थ के उपद्रव सूझते हैं।

ठाली नाइन मूँड़े पटा।

निठल्ला आदमी, यह बताने के लिए कि मैं बहुत व्यस्त और कामकाजी हूँ, व्यर्थ इधर-उधर का काम करता है।

ठाले1 सें बेगार भली।

(1-पा. बैठे सें।) आदमी को कुछ न कुछ करते रहना चाहिए।

ठाँव गुन काजर, ठाँव गुन कारख।

एक ही वस्तु स्थान के प्रभाव से अच्छी और बुरी बन जाती है। आँखों में आँजें जाने के लिए इकट्ठा किया गया वही धुआँ काजल कहलाता है, और वही दूसरी जगह लगने से कालिख समझा जाता है।