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अक्षर: ड

अक्षर 'ड' से शुरू होने वाली कहावतें

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डरी डरी कामें आऊत।

बेकार वस्तु भी पड़ी-पड़ी काम आ जाती है।

डाँड़ी मारें साव कहावें, हर हाँकै सो चोर। / चुपर-चुपर के बाबा खावें, जिनके ओर न छोर।।

तराजू की डंडी मार कर अर्थात लोगों को धोखा देकर पैसा कमाने वाले तो साहूकार कहलाते हैं, साधू-सन्यासी, जिनके घरबार का ठिकाना नहीं, घी चुपड़ी खाते हैं, और हल हांकने वाला किसान, जो परिश्रम की रोटी खाता है, चोर समझा जाता है।

डायन खाय तो मों लाल, न खाय तौ मों लाल।

डायन को खाने को मिले तो रक्त से मुंह लाल रहता है, न खाने को मिलै तो गुस्से से लाल रहता है। कठोर प्रकृति के दुष्ट आदमी के लिए।

डार के टूटे।

ताजे, हाल के टूटे हुए फल आदि।

डिलारौ खेत सबकों परत।

ढीमें वाला खेत जोतने के लिए सबके पल्ले पड़ता है। एक पर पड़ने वाली विपत्ति कभी-न-कभी दूसरों पर भी पड़ती है।

डींग हाँकनई है तौ हलकी पतरी का हाँकें ?

डींग हांकनी ही है तो छोटी-मोटी क्या हाँके ?

डीलन चले तौ पाती काय पै ?

जब स्वयं ही जा रहे हैं तो पत्र की क्या आवश्यकता ? इसे कभी-कभी इस प्रकार भी कहते हैं- डीलन चले तो सँदेसो काय पै ?

डुकरो मरीं सो मरों, जम द्वारो देख गये।

एक बार किसी तरह एक आदमी से पिड छूटा, पर हमेशा के लिए उसके आने का रास्ता खुल गया।

डूँड़ा1 हर कौ, न बखर कौ, दायें2 कों टायँ टायँ।

(1-ऐसा बैल जिसके सींग टूट कर गिर गये हों। 2-कटी हुई फसल का दाना निकालने के लिए उसे जमीन में बिछा कर बैलों से कुचलवाने की क्रिया।) ढूँड़ा बैल न तो हल में जोतने के काम का होता है और न बखर में; दायें के लिए तो टायें-टायें करता ही है। निकम्मे और बूढ़े आदमी के लिए।

डूबा साद कें रै गये।

डुबकी साध कर रह गये। चुप्पी साध ली। ऐन मौके पर गायब हो गये।

डूबो बंस कबीर कौ उपजे पूत कमाल।

ऐसी अयोग्य संतान के संबंध में जिससे कुल को बट्टा लगे।

डेरे हिरन दायनें जायँ। लंका जीत राम घर आयँ।।

यात्रा में यदि हिरन बायीं ओर से दाहिनी ओर जाते मिलें तो कार्य सफल होता है।