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अक्षर: ढ

अक्षर 'ढ' से शुरू होने वाली कहावतें

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ढका में ढका लगत।

धक्के में और धक्का लगता है। हानि में और हानि होती है।

ढब सें खेती, ढब सें न्याव। डब सें होवे बूढ़े कौ व्याव।।

ढंग से खेती, ढंग से न्याय और ढंग से ही प्रौढ़ व्‍यक्ति का विवाह होता है। तात्पर्य यह कि इन सबमें चतुराई से काम लेना पड़ता है।

ढिंगाँ मातनो दूर पानी दूर मातनो ढिगाँ पानी।

वर्षा ऋतु में चंद्रमा के चारों ओर बना प्रभा-मंडल यदि आकार में छोटा हो तो समझना चाहिए कि पानी देर से बरसेगा और बड़ा हो तो शीघ्र बरसेगा।

ढिड़वारौ मचा राखौ।

व्यर्थ का झगड़ा मचा रखा है। ढिंड़वारा ढेढ़ों के मुहल्ले को कहते हैं। ढेढ़ चमारों की तरह की एक छोटी जाति है। बुन्देलखंड में यद्यपि ये बहुत कम हैं परन्तु यह शब्द यहाँ प्रचलित है और उसका अर्थ मूर्ख या गँवार लगाते हैं।

ढेड़ ढेड़ई सें मानत।

ढेढ़ ढेढ़ से ही मानता है। गँवार गँवार से ही मानता है।

ढोर से नर्रयात।

ढोर की तरह चिल्लाते हैं। किसी के बुरी तरह चिल्लाने पर।

ढोल के भीतर पोल।

बाहरी आडंबर तो बहुत पर भीतर से खोखले।