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अक्षर: थ

अक्षर 'थ' से शुरू होने वाली कहावतें

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थर न थराई, हरामजादी कुआई।

किसी काम में एहसान की जगह व्यर्थ अपयश हाथ लगना।

थुरमोलू और दुधार, लमथनू और नैनवार।

गाय सस्ती हो और दुधार भी हो, लंबे थनों की हो, और अधिक घी वाली हो।

थूँकन सतुआ सानत।

थोड़े खर्च में बड़ा काम करना चाहते हैं।

थैलियाँ सिमा राखो।

थैलियाँ सिला कर रखो। अनुचित माँग करने पर व्‍यंग्‍य में।

थोथा चना बाजे घना।

निकम्मा आदमी बकवाद बहुत करता है।

थोरी कई कबीरदास, भौत कई संतन।

कबीर ने थोड़े में ही सब कुछ कह दिया। दूसरों ने उसे और बढ़ाया।

थोरी करै सो अपुन कों, भौत करै सो गैर कों।

खेती थोड़ी ही अच्छी होती है। बहुत करने से उसका सँभालना कठिन होता है।

थोरे में मजा है।

कोई भी वस्तु थोड़ी खाने में अच्छी लगती है। किसी से थोड़ी बात करने में ही सार है।

थोरो थोरो सब खाने आऊत।

थोड़ा-थोड़ा सभी चीजों का स्वाद लेना चाहिए।

थोरो पड़े सो हर सें गये। भौत पड़े सो घर से गये।।

किसान का लड़का पढ़ा अच्छा नहीं। थोड़ा पढ़े तो स्कूल की हवा लग जाने से खेती के काम का नहीं रहता, और बहुत पढ़ जाय तो नौकर होकर घर से बाहर चला जाता है। वर्तमान शिक्षा प्रणाली पर व्‍यंग्‍य।