विद्यासागर जी के संस्कृत योगदान की प्रथम प्रकाशक डॉ आशालता मलैया रहीं। संस्कृत साहित्य तथा जैन दर्शन की प्रकांड पण्डिता डॉ आशालता मलैया का जन्म राजस्थान के अजमेर में 6 दिसम्बर, 1943 को हुआ। आपके पिता नेमिचन्द्र विनम्र पेशे से वकील तथा शिक्षक रहे। आपकी माता रत्नप्रभा जी गृहिणी थी।
आपकी प्राथमिक से हाईस्कूल तक की शिक्षा राजस्थान के किशनगढ़ में हुई। उसके बाद आपने स्नातक परीक्षा कलकत्ता से तथा स्नातकोत्तर परीक्षा वाराणसी से स्वाध्यायी परीक्षार्थी के रूप में उत्तीर्ण की। आपका विवाह सागर के कटरा बाजार के प्रतिष्ठित व्यवसायी विमल कुमार मलैया के साथ सम्पन्न हुआ। आपकी तीन बेटियाँ आभा, विभा और शुभा हैं। बड़ी बेटी आभा दोषी मुंबई में निवासरत है; वे एक फार्मेसी कॉलेज में प्रिंसिपल है। मंझली बेटी विभा तीन विषयों में संस्कृत, संगीत तथा दर्शनशास्त्र से एम.ए. तथा यूजीसी नेट हैं। छोटी बेटी शुभा एमकॉम पीएचडी है।
आपकी 3 अगस्त, 1968 को शासकीय कन्या महाविद्यालय सागर में संस्कृत व्याख्याता के पद पर नियुक्ति हुई। आपने महाविद्यालय में पूर्ण समर्पित भाव से संस्कृत के छात्र छात्राओं को अध्ययन कराया । सागर नगर में आपसे शिक्षा प्राप्त कर अनेक महिलाएं उच्च पदों पर कार्यरत रहीं; उनमें प्रो. कुसुम भूरिया, प्रो. सुमन जैन, पूर्व विधायक श्रीमती सुधा जैन के नाम उल्लेखनीय है। साहित्यिक व्यक्ति सहृदय होता है। यह उक्ति आपके जीवन में चरितार्थ होती थी। आपने अनेक गरीब छात्राओं की महाविद्यालय में फीस भरी और अध्ययन के लिए सहयोग किया।
आप 37 वर्ष सतत संस्कृत सेवा करते हुए सन 2005 में सेवानिवृत्त हुई। आपने अपनी सम्पूर्ण शासकीय सेवा एक ही महाविद्यालय में पूर्ण की।
आपका जीवन धर्म अध्यात्म और दर्शन से परिपूर्ण रहा। जैन संत शिरोमणि आचार्य विद्यासागर की आप कृपा पात्र रहीं। आपका आचार्य श्री से अध्यात्म के गूढ़ विषयों पर विमर्श हुआ। आपने आचार्य राधावल्लभ त्रिपाठी से परामर्श लेकर स्वतंत्र रूप से बिना निदेशक के "संस्कृत शतक परम्परा तथा आचार्य विद्यासागर के शतक " विषय पर शोध कार्य करके संस्कृत विभाग, डॉ हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय सागर से पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की । आचार्य विद्यासागर के व्यक्तित्व पर यह प्रथम शोध किया गया था। यह शोध प्रबंध जैन विद्यापीठ सागर से 2017 में प्रकाशित हुआ।
आपने बहुत समय तक 'ज्ञान मंजूषा' पत्रिका का सम्पादन किया। संस्कृत साहित्य, जैन धर्म तथा दर्शन पर केंद्रित अनेक शोध पत्रों का लेखन किया जो देश की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए। आपके विविध संगोष्ठियों में दिए तत्त्वबोध व्याख्यान विद्वानों में चर्चा का विषय रहते थे।
कई सामाजिक, धार्मिक और अकादमिक संस्थाओं ने आपको सम्मानित किया। 13 जुलाई 2024 को आपने पार्थिव देह का त्याग किया।