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डॉ. आशा सर्वटे

सागर नगर के लक्ष्मीपुरा वार्ड में एक अति प्रतिष्ठित महाराष्ट्रीयन ब्राह्मण परिवार के श्रम कानून के ख्याति प्राप्त वकील श्री नारायण श्रीधर सर्वटे थे और समाज की एक आदर्श महिला श्रीमती मालती बाई सर्वटे के यहां पाँच पुत्र और पाँच पुत्रियां हुईं। उनमें से दो बहिनों सरला और आशा ने संस्कृत के क्षेत्र में विशिष्ट उपलब्धि प्राप्त की।

छोटी बहन डॉ. आशा सर्वटे का जन्म 26.10.1942 को हुआ। उनकी प्राइमरी से हाई स्कूल तक की शिक्षा महिला विद्यालय सागर में संपन्न हुई। तत्पश्चात स्नातक, बी.एड. उत्तीर्ण करने के बाद 10 वर्ष तक महिला विद्यालय में एक कुशल शिक्षिका के रूप में पदस्थ रहीं। तत्पश्चात वहां से त्यागपत्र देकर संस्कृत विभाग, सागर विश्वविद्यालय में नियमित छात्रा के रूप में संस्कृत की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। प्रावीण्य सूची में प्रथम स्थान प्राप्त किया। प्रो. रामजी उपाध्याय उनकी प्रतिभा से विशेष प्रभावित रहे और शोध कार्य हेतु इनका निर्देशन किया। 1990 में उनकी नियुक्ति संस्कृत विभाग, सागर विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में हुईं। तत्पश्चात 2000 में रीडर के पद पर प्रोन्नत हुईं और सन 2004 में सेवानिवृत्त हुई। उन्हें नाटकों के मंचन हेतु कई पुरस्कार मिले।

उनके निर्देशन में 10 शोधार्थियों ने पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उनके बारे में एक रोचक तथ्य यह है कि महिला विद्यालय में इन्होंने डॉ. रामरतन पाण्डेय की पत्नी निशा पांडे को और विश्वविद्यालय में उनकी दोनों बेटियों मेधा और प्रमेधा को पढ़ाया। उनकी अध्यापन शैली इतनी बढ़िया थी कि विद्यार्थी को पुनः पुस्तक खोलने की आवश्यकता तक नहीं होती थी। सागर विश्वविद्यालय के रसायन शास्त्र के सेवानिवृत्त प्रो. के. एस. पित्रे उनकी छोटी बहिन के पति हैं। वे अत्यंत सुसंस्कृत, सुव्यवस्थित और शांत प्रकृति की महिला थीं। सादा जीवन, उच्च विचार उनके जीवन का प्रमुख ध्येय रहा। 2008 में जबलपुर में उनका निधन हो गया।

07.05.1935 को जन्मी इनकी बड़ी बहन सरला सर्वटे सागर विश्वविद्यालय के शुरुआती वर्षों की छात्रा रहीं। उस समय स्त्री शिक्षा न्यूनतम थी। उन्होंने संस्कृत एम. ए. की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की और पी एस सी से व्याख्याता संस्कृत पद पर चयनित हुईं। रोबर्नटसन कॉलेज जबलपुर में ओशो उनके सहकर्मी रहे। उनके छात्र डॉ. के के चतुर्वेदी और डॉ. पुष्पा दीक्षित राष्ट्रीय स्तर के ख्याति प्राप्त विद्वान हुए हैं । उन्होंने छात्र जीवन में भाला फेंक प्रतियोगिता में पुरस्कार जीता। नाटकों का निर्देशन किया। अपने सरल स्वभाव के कारण लोग इन्हें 'शांत रस की मूर्ति' कहते थे । 2023 में इनका निधन हो गया।

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