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आचार्य बच्चूलाल अवस्थी

आचार्य बच्चू लाल अवस्थी का जन्म 8 अगस्त, 1918 को लखीमपुर खीरी, उ. प्र. के कान्यकुब्ज ब्राह्मण परिवार में हुआ। अवस्थी जी 4 वर्ष की आयु में बिना किसी के शिक्षित किये ही अक्षर पहचानने एवं लिखने लगे। इस घटना से इनके पिताजी अचम्भित हो गये और इनका पाठशाला में प्रवेश करवा दिया। तब से लेकर मृत्युपर्यन्त न इनका अध्ययन रुका और न ही लेखनकार्य। आपने वाराणसी में शिक्षा प्राप्त करते हुये 1944 में व्याकरणाचार्य की उपाधि प्राप्त की। आपने सभी परीक्षाओं में प्रथम श्रेणी के साथ प्रथम स्थान प्राप्त किये। अत्यन्त मेधावी होने के कारण आपने अध्ययन में निरत रहकर संस्कृत तथा हिन्दी साहित्य में एम.ए. की उपाधियाँ प्राप्त कीं। आपने आगरा विश्वविद्यालय से 1963 में हिन्दी साहित्य में पी.एच डी. तथा 1975 में सागर विश्वविद्यालय से डी. लिट् की उपाधि प्राप्त की। आप 1949 से 1978 तक विभिन्न शिक्षण संस्थाओं में हिन्दी के अध्यापक रहे। इस कालखण्ड में ही वे सागर विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में 1967 से 1978 तक व्याख्याता के रूप में कार्यरत थे। आपने सेवानिवृत्ति के पश्चात् 5 वर्ष तक सागर विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग में और 4 वर्ष तक दर्शनशास्त्र विभाग में समय समय पर अध्यापन कार्य किया । विद्वानों ने इनकी अद्भुत प्रतिभा से प्रभावित होकर इन्हें 'ज्ञान' की उपाधि से किया। वस्तुतः इनका पूरा शरीर ही ज्ञानमय हो गया था। इनका विभूषित लेखनकार्य इतना बृहत्तर है कि संक्षेप में उसका उल्लेख करना सम्भव नहीं है। इन्होंने आठ खण्डों में 9 हजार पृष्ठों में हिन्दी व्युत्पत्तिकोश तैयार किया। आपने इसी कालखण्ड में तुलसीकोश नामक ग्रन्थ की भी रचना की। यह ग्रन्थ दो खण्डों में प्रकाशित हुआ।

दर्शनशास्त्र विभाग की शोधयोजनान्तर्गत आपने 'भारतीय दर्शन बृहत् कोश' अद्भुत ग्रंथ का निर्माण किया। काव्य-संकलन प्रतानिनी के लिये उन्हें सन् 1998 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इनकी रचनाएं कई विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में पढ़ाई जाती हैं। आपने संस्कृत में 'योषासप्ततिका' काव्य की रचना की। आपके निर्देशन में 20 शोधार्थियों ने पी.एच डी. और 2 ने डी. लिट् की उपाधियाँ प्राप्त कीं। आपके सुपुत्र डॉ ईशदत्त अवस्थी सागर विश्वविद्यालय के मनोविज्ञान विभाग में प्रोफेसर के पद पर कार्यरत रहे। इनकी पुत्री डॉ वन्दना त्रिपाठी उज्जैन में संस्कृत की प्राध्यापक रही हैं। आचार्य बच्चू लाल अवस्थी मूलतः संस्कृत के विद्वान थे। सागर से उज्जैन पहुंच कर आप कालिदास अकादमी में निदेशक के पद पर कार्यरत रहे। इन्हें अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। आपकी संस्कृत सेवा को दृष्टिगत करते हुये राष्ट्रपति डॉ. शंकर दयाल शर्मा ने इन्हें राष्ट्रपति सम्मान से सम्मानित किया। आपकी रचनाओं पर राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित हुई है। आपकी रचनाओं पर शोध कार्य पूर्ण कर शोधार्थियों ने पीएच.डी. तथा एम. फिल. उपाधियां प्राप्त की हैं। वर्ष 2004 में उज्जैन में उन्होंने अंतिम साँस ली।

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