बुन्देलखण्ड का महत्वपूर्ण प्रसिद्ध व्यंजन है 'दरया' जिसे 'बरा' भी कहते हैं । वर्तमान में दही बड़ा का नाम दे दिया गया । लेकिन पकाने की विधि में अंतर है 'बरा' चन्देलकाल से आरंभ हुए हैं। विशेष अवसरों पर अनिवार्यतः बनाये जाते हैं। जैसे-सगाई, लगुन बरातियों को पंगत के अवसर पर जरूर परोसा जाता है । बुन्देलखण्ड में आज भी प्रचलन है, लड़का-लड़की की पक्यात् जब होती है तब उड़द की दाल के बरा जरूर बनते है पक्यात अर्थात् सगाई होने पर 'समूदी रोटी' अर्थात् कच्चा-पक्का भोजन तैयार कर मेहमानों को परोसा जाता है तब कहते हैं कि पक्यात का भोजन हो गया । कुछ व्यंजन बुन्देलखण्ड में रीति रिवाजों से विशेषतः जुड़े हैं जिनका प्रचलन परम्परागत बना हुआ है। बड़े बुजुर्ग इसे मान्य करते हैं । परम्परानुसार यह व्यंजन पौष्टिक एवं स्वास्थ्यवर्धक होते हैं पहिले के समय में पाँच-पाँच दिन बराते रूकती थी तब बरा प्रतिदिन बनाकर पंगत में परोसे जाते थे पातर-दोना में भोजन परोसा जाता था जो स्वच्छता की दृष्टि से श्रेष्ठ माना जाता है । भोजन संतोषप्रद होता था । भोजन करके बाराती लोक परम्परानुसार गाते-बजाते समय का आनंद उठाते थे कहने का तात्पर्य यह है कि भोजन आसानी से पच जाता था शाम की बियारी की पुनः तैयारी होती थी रसुइया दिन रात यही काम किया करते थे । रोटी के आकार के दरया (बरा) होते हैं इसलिए लोक भाषा में इसे 'फरा भर बरा" नाम दिया गया अर्थात् पातर भर दरया हुआ करते थे । वर्तमान में दरया जो मठा में डोबे जाते थे, उसे दही बड़ा का नाम देकर दही में डोब कर रूचि से खाये जाते हैं। दोनों का स्वाद भिन्न है । दरया खाने में जो तृप्ति होती है वह दही बड़ा खाने में नहीं दरया का अनुपम स्वाद होता है। प्रोटीन, कार्बोज, विटामिन से युक्त होता है बुन्देली व्यंजन में दरया अर्थात बरा । विवाहोत्सव में दरया का उपयोग होता है वर्षभर के त्यौहारों जैसे रक्षाबन्धन, दशहरा, दीपावली, भाईदोज, होली पर घर-घर में बनाये जाते हैं । एक खासियत और होती है पत्थर के सिल बट्टा से दाल पीसने पर दरया बनाने पर खाने वालों को बेहद स्वादिष्ट लगते हैं लेकिन आधुनिक परिवेश में मिक्सी के द्वारा दाल पीसने पर वह स्वाद, वह आकार प्राप्त नहीं होता । अतः भारतीय पद्धति से जो आनंद की प्राप्ति होती है वह आधुनिक पद्धति में नहीं । भोजन पकाने से लेकर भोजन परोसने और भोजन गृहण करने की पद्धति भारतीय संस्कृति की निज पद्धति है वर्तमान में पाश्चात्य संस्कृति में वह बात नहीं हैं । लोक हितार्थ, लोकरंजन है बुन्देलखण्ड की परम्परायें जिनसे सुख समृद्धि की प्राप्ति होती है ।
सामग्री - उड़द दाल छिलका या बिना छिलका लाल गीली मिर्च, हींग, नमक मठा, तेल, राई ।
विधि - उड़द दाल को साफकर फूलने डालें दाल आठ घण्टे फूलना जरूरी है । छिलका दाल को मसल कर धोयें ताकि छिलका निकल जावें पानी में बार-बार भिगोयें और छिलका विहीन करें। बिना छिलका दाल पाँच छः पानी में धोयें यह आसानी से धुल जाती है। पत्थर के सिल बट्टा से पीस लेवें । पीसने बाद फेंटे अर्थात पिसी दाल हाथ से नीचे ऊपर करें । अब पिसी दाल में हींग मिर्च मिला देवें । पटा (लकड़ी का) पर
एक साफ कपड़ा गीला करके बिछायें, रोटी के बराबरी की लोई बनाये और पटा पर रखकर अंगुलियों के सहारे फैलाते जायें जब पर्याप्त फैल जाये तब पहिली अंगुली से बाहरी हिस्से पर एक पोर के बराबर काटते जावें पुरा होने के बाद गोलाकार आ जायेगा और कंगूरानुमा आकार गोल बन जावेगा । कढ़ाही में तेल गरम करें और एक-एक दरया सेंकते जावें । पूरे दरया सिक जाने के बाद एक गंज में पानी गरम करें। उसमें नमक डालें। गरम नमक पानी में दरया डुबने दें ऊपर से ढक्कन ढाँक देवें । मठा में हींग राई का झौंका लगायें अर्थात बघार लगायें थोड़ी हल्दी डाल देवें थोड़ी पिसी मिर्च डाल देवें । तीखापन आने पर दरया का आनंद दूना हो जाता है। गरम पानी से निकालकर मठा में दरया डुबो दें। मठा में डूबे हुए दरया कटोरी, प्लेट या दोना में मठा सहित परोसें । इसी प्रकार से दही बड़ा तैयार किए जाते है । मठा के प्रयोग से दरया पचने में सहायक होते हैं उड़द दाल गरिष्ठ होती है । पाचन प्रणाली में प्रोटीन, कार्बोज का पाचन मठा के साथ आसानी से हो जाता है । जठर में पाये जाने वाले पाचक रस रेनिन पेप्सिन उड़द में पाये जाने वाले प्रोटीन कार्बोज को मठा के साथ त्वरित गति से पचने योगकर देता है। दरया के साथ किसी भी प्रकार की खटाई का सेवन नहीं होता । बुन्देली दरया (बरा) उक्त विधि से पकाये जाते हैं तब स्वादिष्ट होते हैं ।
पौष्टिक तत्व - उड़द दाल-कार्बोज, प्रोटीन, मठा-सम्पूर्ण तत्व-विटामिन 'सी', तेल-वसा, हल्दी-एन्टीवायटिक होती है स्वास्थ्य की दृष्टि से लाभकारी होती है ।