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डॉ. दयाचंद जैन

इनका जन्म 11.08.1915 को मध्य प्रदेश के सागर जिले के शाहपुर के पास मगरौन नामक ग्राम में हुआ। ये पांच भाई थे और पांचों भाई पंडित बने। इनके पिता श्री भगवान दास भायजी संगीत रत्न थे। शाहपुर से प्राथमिक शिक्षा प्राप्त कर ये गणेश दिगंबर जैन संस्कृत महाविद्यालय मोराजी में आ गए। यहीं से इन्होंने 1940 में सिद्धांत शास्त्री और 1958 में साहित्य आचार्य की परीक्षाएं विशेष योग्यता के साथ उत्तीर्ण कीं। ये क्षुल्लक श्री गणेश वर्णी जी के प्रत्यक्ष शिष्य रहे। इन्होंने जीवन पर्यंत अपनी सेवाएं गणेश दिगंबर जैन संस्कृत महाविद्यालय को अर्पित कीं। 75 वर्ष की आयु में 1990 में इन्होंने सागर विश्वविद्यालय से प्रोफेसर भागचंद जैन के निर्देशन में जैन पूजा काव्य पर अपना शोध प्रबंध पूर्ण कर पीएच. डी. की उपाधि प्राप्त की। इस शोध प्रबंध में समस्त धर्मों तथा सभी शास्त्रों में वर्णित जप, तप, उपवास, पूजा आदि का अत्यंत विस्तृत विवेचन किया गया है। यह ग्रंथ प्रकाशित है और उनकी पुत्री के पास उपलब्ध है।

उनकी पांच पुत्रियां हुईं। पंडित जी विनयशील, सरल, सहज और निःस्पृह व्यक्तित्व वाले थे। साधु संतों के प्रति सदा उनका भक्ति भाव बना रहा। उनके लगभग 50 लेख प्रकाशित हुए और उन्होंने 20 निबंध भी लिखे। उनकी अन्य कृतियों में गंगावर्णन, सरस्वती वंदनाष्टकम्, वंदे जिनवरम् लोकप्रिय तथा प्रसिद्ध रहीं। उनका पूरा जीवन संस्कृत महाविद्यालय सागर में अध्ययन तथा अध्यापन में बीता। सेवानिवृत्ति के पश्चात् भी आपने इस संस्था को अपनी निःशुल्क सेवाएं प्रदान कीं। दिनांक 12.06.2006 को वर्णी भवन में ही उनका देहावसान हो गया। उनकी मृत्यु के बाद उनकी सेवाओं को और साधना को देखते हुए सेठ श्री डालचंद जी जैन ने उनकी सबसे छोटी बेटी ब्रह्मचारिणी किरण दीदी को मोराजी परिसर में ही निःशुल्क आवास प्रदान किया।

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