बुन्देली लोक संस्कृति में गुजियाँ तीज-त्यौहारों का प्रमुख पकवान है, होली, दीवाली, हरितालिका, जन्माष्टमी, संक्रांति, शिवरात्रि जैसे पावन पर्वों पर विशेष रूप
से तैयार किए जाते हैं । प्रसाद एवं नाश्ता में उपयोग किया जाता है ।
सामग्री - मेंदा का आटा, (रबा) सूजी, खोबा, इलायची दाना, नारियल गरी, चिरौंजी, किसमिस, घी, शक्कर ।
विधि - आवश्यकतानुसार मेंदा का आटा परात में रखें । तेल का मोन देकर थोड़ा-थोड़ा पानी डालते जायें और गूंथ लें कुछ समय के लिए गुथा हुआ रखा रहने दें । सूजी अर्थात रबा कढ़ाई में घी डाल कर धीमी आंच में सेके, गुलाबी हो जाने पर कढ़ाई को नीचे उतार लें। किसा हुआ खोबा गरम रबा में मिलायें । पिसी शक्कर स्वादानुसार डालकर मिश्रण बना दें तत्पश्चात् इलायची दाना, पिसा हुआ तथा नारियल गरी, किसमिस मिला दें। सम्पूर्ण मिश्रण को बुन्देली में "कसार" कहते हैं। मेंदा की छोटी लोई बनाकर पुड़ीनुमा बेल लें फिर उसी पटा के ऊपर बिछाकर कसार एक चम्मच भरकर ऊपर डाल दें दोनों छोड़ पलटाकर मोड़ दें भली भाँति दबा दीजिए पीतल या स्टील की गुठनी से गौंठ दें फिर कढ़ाई में घी डालकर गरम करें और धीमी आँच में सेंक लें गुजिया भरने का साँचा भी प्रचलित है उसी साँचे में बिली हुई पुड़ी आकार में रखें और उसी के ऊपर कसार रखकर साँचे के ऊपर पल्ले को दबा दें, पल्ला खोलने पर गुजिया का आकार तैयार हो जाता है घी में सेंककर प्रसाद या नाशते में रखिए गुजिया राजा महाराजाओं का व्यंजन होता था चंदेल राज्य में गुजिया पकवान में प्रमुख होती थी। घी, शक्कर, मेवा, खोबा के मिश्रण से स्वादिष्ट होती हैं, मेहमानों को परोसते समय गुजिया की खुश्बू चारों तरफ फैलती है तब पता चलता है गुजिया बनी है बिना भूख के गुजिया बड़ी चाव से आहार में ग्रहण की जाती हैं ।
वर्तमान में गुजिया बाजारों में मिष्ठान की दुकान पर भी बिकने लगी है। जिसमें खोबा का प्रयोग ज्यादा होता है । कुछ स्थानों की गुजिया प्रसिद्ध हैं जैसे छतरपुर, हटा, बाँदकपुर की गुजियाँ मिष्ठान दुकानों में विविध आकृति में देखी जा सकती हैं। अतः बुन्देलखण्ड का प्रमुख स्वादिष्ट, रूचिकर पकवान है विवाह अवसर पर टिपारा "चुलिया" जो टोकनीनुमा होता है उसके अंदर बनाकर रखी जाती है जिसे समधी-समधन के घर भेजा जाता है। जिसमें पकवान/लड्डू पपड़ियों के साथ गुजिया भी होती है । जिन्हें लड़के वाले लड़की के घर और लड़की वाले लड़के के घर पहुंचाते हैं। यह लोक पंरपरागत के अंतर्गत आता है जिसे हर वर्ग समाज में निर्वाह होता है। अत: बुन्देलखण्ड की लोक संस्कृति की पहचान बरकरार रहती है और एक दूसरे को जोड़ने का काम करते हैं। किसी भी क्षेत्र की संस्कृति में व्यंजन का महत्वपूर्ण स्थान होता है जो स्वास्थ्य एवं स्वादिष्टता की दृष्टि से अनुकूल होता है ।