इनका जन्म 10.08.1950 को मध्य प्रदेश के सिवनी जिले के धूमा नामक ग्राम में श्री छोटेलाल भूरिया तथा श्रीमती पूर्णिमा भूरिया के यहां हुआ। उस समय इनके पिता वन विभाग में रेंजर के पद पर कार्यरत थे । ये छह भाई और तीन बहिनें हैं । इनके सभी भाई उच्च शिक्षा प्राप्त कर अच्छी नौकरियों में रहे हैं । इनके परिवार की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि ये सभी प्रतिभाशाली और पढ़ने लिखने वाले रहे। इनकी हायर सेकेंडरी तक की परीक्षा देवरी से हुई। वहां ये सभी परीक्षाओं में प्रथम स्थान प्राप्त करती रहीं।
स्नातक की शिक्षा कन्या महाविद्यालय सागर से हुई। उस समय यह कॉलेज नगरपालिका द्वारा संचालित था और छात्राओं की संख्या बहुत कम थी। अल्प समय में ही ये विशिष्ट प्रतिभा के रूप में चर्चित हो गईं। इन्होंने बी.ए. में स्वर्ण पदक प्राप्त किया था। संस्कृत विभाग से एम.ए. की परीक्षा भी स्वर्ण पदक सहित उत्तीर्ण की। इन स्वर्ण पदकों के अतिरिक्त श्रीमती सावित्रीबाई पिंपलापुरे द्वारा भी स्वर्ण पदक प्राप्त हुआ। आचार्य रामजी उपाध्याय के निर्देशन में शोध कार्य पूर्ण कर पीएच. डी. की उपाधि प्राप्त की। आचार्य रामजी उपाध्याय इनके आदर्श गुरु रहे हैं । ये सागर विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग में अक्टूबर 1978 में नियमित रूप से व्याख्याता पद पर नियुक्त हुईं। 1984 में प्रवाचक तथा 1998 में प्रोफेसर के पद पर पदोन्नत हुई। 25.11.1990 को दिल्ली निवासी एक प्रतिष्ठित पंजाबी परिवार में श्री रवि दत्ता से इनका विवाह संपन्न हुआ। इनकी एकमात्र पुत्री नन्दिनी ने पुणे से एम.बी.ए. की शिक्षा प्राप्त की है। इसका विवाह सागर की होटल देवयोग के मालिक डॉ देवेन्द्र सैनी एवं प्रो कल्पना सैनी के पुत्र श्री अर्जुन सैनी से संपन्न हुआ।
प्रो भूरिया के निर्देशन में 22 शोधार्थियों ने पीएच.डी. तथा 17 ने एम. फिल. की उपाधि प्राप्त की। ये 2006 से 2008 तक कला संकाय की अधिष्ठाता भी रही हैं। ये विश्वविद्यालय की कार्य परिषद सदस्य और 10 वर्ष से अधिक संस्कृत विभाग की अध्यक्ष रही हैं। ये 31.08.2015 को सेवानिवृत्त हो गई।
डॉ. ऋषभ भारद्वाज ने इनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर केंद्रित पुस्तक कुसुमसौरभम् का प्रकाशन किया है। यह पुस्तक पठनीय है।
कालिदास अकादमी उज्जैन द्वारा इनकी श्रेष्ठ कृति 'संस्कृत में पर्यावरण' पर इन्हें राजा भोज सम्मान से 2015 में सम्मानित किया गया। 'कालिदास के रूपकों का नाट्य शास्त्रीय विवेचन' इनका महत्त्व पूर्ण ग्रंथ है। इनकी 15 पुस्तकें तथा 50 शोध पत्र प्रकाशित हैं ।
इन्होंने सागरिका एवं नाट्यम पत्रिकाओं का संपादन भी किया है। इन्हें संस्कृत विभाग की पहली महिला अध्यक्ष होने का गौरव प्राप्त है।
आप पांडुलिपि संसाधन केंद्र की समन्वयक भी रहीं । म. प्र. के बी. ए. संस्कृत पाठयक्रम में संचालित पुस्तकों त्रयी, चतुष्टयी और अर्थगौरवम् का भी संपादन किया। आपने कई राष्ट्रीय संगोष्ठियों का संयोजन किया तथा 40 से अधिक संगोष्ठियों में सहभागिता की। वर्तमान में ये सागर के वैशाली नगर में शांत, सुखद, संपन्न और अध्ययनशील जीवन व्यतीत कर रही हैं।