सागर में 12.01.1981 को आयुर्वेदज्ञ पं. गौरीशकर भारद्वाज तथा श्रीमती लीलावती के घर जन्मे डॉ. ऋषभ भारद्वाज संस्कृत विभाग डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय सागर से संस्कृत साहित्य में एम.ए., पीएच.डी तथा केंद्रीय संस्कृत विश्विद्यालय नई दिल्ली से साहित्याचार्य उपाधि प्राप्त हैं। इन्होंने पाण्डुलिपि के क्षेत्र में अलग ढंग का काम करके अपनी पहचान स्थापित की है।
प्रो. कुसुम भूरिया के मार्गदर्शन में 'अर्वाचीन संस्कृत साहित्य के विकास में पंडित प्रेमनारायण द्विवेदी का योगदान' विषय पर पीएच डी. उपाधि प्राप्त की । इन्होंने यह शोध कार्य पंडित प्रेमनारायण द्विवेदी के सम्पूर्ण अप्रकाशित साहित्य पर किया। उसके बाद ये पंडित प्रेमनारायण द्विवेदी के अप्रकाशित साहित्य को प्रकाशित करने में जुट गये। केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय नई दिल्ली से तत्कालीन कुलपति आचार्य राधावल्लभ त्रिपाठी के मार्गदर्शन में पंडित प्रेमनारायण द्विवेदी रचनावली का चार भागों में सम्पादन किया तथा द्विवेदी जी के शोध ग्रंथ वैष्णव पुराणों में आचार समीक्षा (1964 ई.) का सम्पादन कर 60 वर्ष पूर्व के महत्त्वपूर्ण एवं लोकोपयोगी ग्रंथ का प्रकाशन किया।
निरन्तर संस्कृत साहित्य की साधना के फलस्वरूप इनके मौलिक त सम्पादित 15 ग्रंथ तथा 25 शोध पत्र विविध पत्रिकाओं में प्रकाशित है। डॉ. भारद्वाज अपने शोध अध्ययन काल से ही ज्ञान की अक्षुण्ण इन्हें भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय ने अल्लामा इक़बाल लायब्रेरी संपदा हस्तलिखित ग्रंथ पांडुलिपियों के संरक्षण कार्य में प्रवृत्त हो गये। कश्मीर विश्वविद्यालय श्रीनगर में शारदा लिपि के ग्रंथों पर कार्य करने के लिए भेजा। वहां 15 माह निरन्तर शारदा लिपि के 6 हजार ग्रथों का डाक्यूमेंटेशन एवं डिजिटिलाइजेशन कराया। उसके साथ रणवीर लायब्रेरी जम्मू, दिल्ली, नागपुर तथा पुणे में कार्य किया। राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन नई दिल्ली द्वारा स्थापित पाण्डुलिपि संसाधन केंद्र सागर में सन 2007 से कार्यशील रहे हैं। ये पाण्डुलिपि केंद्र को निःस्वार्थ सेवाएं देते रहे हैं।
इनकी बाल्यकाल से शिक्षा के क्षेत्र में सेवा करने की अभिरुचि रही। अपने इसी पवित्र उद्देश्य को पूर्ण करने के लिए 2008 में द राईजिंग स्टार अकेडमी की स्थापना की और बहुत कम मूल्य में पिछड़े क्षेत्र में शिक्षा प्रारम्भ की। स्कूल में अनाथ, जरूरतमंद छात्रों को पूर्णतः निशुल्क शिक्षा देकर मिशाल कायम की।
इनकी सामाजिक सेवाएं देखकर मित्रों और शुभचिंतकों की सलाह पर इन्होंने 2011 में आर्ष परिषद की स्थापना की । परिषद के बेनर तले अभी तक शताधिक कार्यक्रम हो चुके हैं जिनमे राष्ट्र निर्माण में युवाओं की भूमिका पर कई व्याख्यान, राष्ट्रीय संगोष्ठी, धर्म सभाएं, पुण्यस्मरण कार्यक्रम तथा समाज की ज्वलंत समस्याओं पर केंद्रित कार्यक्रम उल्लेखनीय हैं।
श्यामलम् संस्था द्वारा इन्हें पं. गोविन्द प्रसाद शास्त्री संस्कृत सम्मान तथा कालिदास संस्कृत अकादमी, उज्जैन द्वारा 2015 में व्यास सम्मान प्रदान किया गया है। वर्तमान में ये पाण्डुलिपि, संस्कृत, शिक्षा तथा समाज सेवा में उल्लेखनीय कार्य कर रहे हैं।