सत्तू मन भत्तू झट घोलों झट खाओ ।
मूछन पे दे ताव, काम काज में लग जाओ ।
काव्यात्मक भाव सत्तू अर्थात सतुआ का स्वाद दुगना करते हैं । तत्काल पेट की क्षुदा मिटाने के साथ प्रोटीन से भरपूर हैं सतुआ । बुन्देलखण्डी व्यंजन में त्वरित गति से भोज्य में उपयोगी सिद्ध है सतुआ । सतुआ से भोज्य तत्व में प्रोटीन, कार्बोज, त्वरित गति से प्राप्त होते हैं। जनपद काल में वैदिक युग के भोज्य में पुंआ और भात उच्च वर्ग में प्रिय हो गया था । 'सत्तू' भी इसी समय में आया और शाकाहारी भोजन की श्रेणी में प्रचलित हुआ । मार्य शंगुकाल तथा नाम वाकाटक काल में भी गेहूं, जबा, चना के व्यंजन काफी मात्रा में प्रत्येक वर्ग में चलन में थे । तब से लेकर हर्षकाल, चंदेलकाल, तोमर काल, बुंदेलकाल पुनरूत्थान काल और आधुनिक काल में 'सत्तू' भोज्य पदार्थ का व्यंजन सर्वाधिक प्रत्येक समाज का सहल, सरल व्यंजन रहा है । समयकाल के अनुसार चैत, वैशाख, जेठ में ज्यादातर पाचनशील है । शारीरिक मानसिक श्रमशील व्यक्ति 'सत्तू' का उपयोग आज भी करता है ।
सामग्री - गेहूं, चना, जबा, गुड़ या शक्कर, जीरा
विधि - सर्वप्रथम, गेहूं, चना, जबा को साफ करें । अलग-अलग पानी में भिगो दें थोड़े फूलने दें तत्पश्चात् पानी से धोयें और सूखने देवें । चना सूख जाने के बाद दाल बनावें चना के छिलके उतर जाते हैं । दर जाने के बाद । तीनों का मिक्चर बनावें एक किलो गेहूं, आधा किलो चना दाल, आधा किलो जबा में सौ ग्राम जीरा भून कर मिलावें अब चक्की में आटा की तरह पिसवा देवें । पुराने समय पर घरों में जाँता रहता था दो पत्थर से मिलाकर चक्कीनुमा होता है । बुन्देलखण्ड के गाँवों में आज भी घरों में है। शहरों में चक्की स्पेशल सत्तू की ही होती है । सत्तू अर्थात सत् धातू से बना है जिसका अर्थ है पौष्टिक तत्व से युक्त है सतुआ यह सत्य है।
इसे गुड़ या शक्कर के साथ पानी में घोल कर खाया जाता है हिन्दी मास में बैशाख, जेठ माह में ही इसका आहार में प्रयोग होता है ।
पौष्टिक तत्व - गेहूँ-प्रोटीन, चना दाल-प्रोटीन, कार्बोज, शक्कर-शर्करा (कार्बोज), गुड़-आयरन ।