इनका जन्म 19.08.1930 को वाराणसी में सुप्रसिद्ध बंगाली ब्राह्मण परिवार में हुआ। इनके परदादा महामहोपाध्याय पंडित वामाचरण भट्टाचार्य अपने समय के दिग्गज पंडित थे। इनके पिता पं. ताराचरण भट्टाचार्य वाराणसी में ही संस्कृत के अध्यापक थे। इनकी माता का नाम श्रीमती सुमति देवी था। प्रो. विश्वनाथ भट्टाचार्य के घर में गुरुकुल की परंपरा थी, किंतु आपके पिता पंडित ताराचरण भट्टाचार्य के मरणोपरान्त यह परंपरा समाप्त हो गई। इस परंपरा का प्रभाव उन पर स्पष्टतया परिलक्षित होता था। डॉ. विश्वनाथ भट्टाचार्य की हाईस्कूल तक की शिक्षा घर पर ही रहकर गुरुकुल पद्धति से सम्पन्न हुई। 1951 में काशी हिन्दू वि.वि. से बी.ए. की परीक्षा स्वर्ण पदक के साथ उत्तीर्ण की। 1953 में संस्कृत में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की। 1954 में सम्पूर्णानन्द वि.वि. से साहित्यशास्त्री की परीक्षा सर्वोच्च अंक लेकर उत्तीर्ण की। 1957 में काशी हिन्दू वि.वि. से नाट्य और नाट्यशास्त्र विषय पर पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की।
1952 में इनका विवाह सदाचारी विद्वत्कुल संस्कृतज्ञ परिवार में मीरादेवी के साथ सम्पन्न हुआ। इनके चार पुत्र हुए। 1958 से लेकर 1969 तक सागर वि. वि. में डॉ. भट्टाचार्य जी संस्कृत के व्याख्याता रहे। 1969 में वाराणसी काशी हिन्दू वि.वि. में नियुक्त हुए। वहां ये संस्कृत विभाग के अध्यक्ष भी रहे तथा 1990 में सेवानिवृत हुए। पुनः वि.वि. ने इनकी विशेष योग्यता को देखकर इन्हें 06 वर्षों तक पुनर्नियुक्ति दी । इनके निर्देशन में 60 शोधार्थियों ने पीएच.डी. उपाधि प्राप्त की है।
उन्होंने 11 साल तक डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय सागर में तथा 26 वर्षों तक काशी हिंदू विश्वविद्यालय वाराणसी में अपनी सेवाएं प्रदान कीं । सागर विश्वविद्यालय में उनका कार्यकाल इस विश्वविद्यालय के इतिहास का एक स्वर्णिम अध्याय था। अपनी ओजस्विता, कार्य के प्रति उत्साह तथा कार्य संपन्न करने की क्षमता से आपने अनेक कार्यक्रमों का सूत्रपात किया और उसका पल्लवन पोषण भी किया। वे राष्ट्रीय एकता समिति, सागर विश्वविद्यालय में कई वर्ष तक सचिव रहे। उस समय इस समिति के तत्वाधान में प्रतिवर्ष भारतीय भाषाओं का नाट्य समारोह, अनेक परिसंवाद तथा विचार गोष्ठी आदि का आयोजन विश्वविद्यालय में होता रहता था। विश्वविद्यालय में शिक्षक संघ के गठन तथा शिक्षकों के संघर्षों में उनकी भूमिका मुख्य रहा करती थी। संस्कृत विभाग में उनके संयोजन में प्रतिसप्ताह संस्कृत गोष्ठी तथा अन्य आयोजन होते रहते थे। किसी भी कार्यक्रम में उनकी उपस्थिति ही कार्यक्रम को जीवंत बनाने हेतु पर्याप्त होती थी।
सागर वि.वि. से इनके निर्देशन मे 06 शोधार्थियों ने पीएच.डी. उपाधि प्राप्त की है। हिन्दी, अंग्रेजी, संस्कृत तथा बांगला भाषा में इनकी कई पुस्तकें तथा शोधालेख प्रकाशित हैं। इन्होंने अपना पैतृक मकान बंगाली समाज को दान कर दिया है जिसमें सामाजिक कार्यक्रम होते हैं। 2015 में इन्हें राष्ट्रपति सम्मान, 1974 में साहित्य शिरोमणि सम्मान, उ.प्र. का राज्य साहित्य पुरस्कार, 2015 में श्री लाल बहादुर शास्त्री रा.सं. विद्यापीठ, दिल्ली से वाचस्पति सम्मान प्राप्त हुए हैं।
संस्कृत हिंदी बांग्ला और अंग्रेजी भाषाओं पर उनका समान अधिकार था। शिष्यों के लिए सर्वस्व समर्पित करने का उन जैसा भाव अब दुर्लभ है। अंत तक इनके निवास पर संस्कृत के जिज्ञासु ज्ञान प्राप्त करने आते रहे। ‘प्रो. विश्वनाथ भट्टाचार्यस्य विचारबिन्दवः' पुस्तक में उनके लेखों का संग्रह उनकी शिष्या डॉ वत्सला ने किया है।
ओजस्वी वाणी, आत्मीय व्यवहार तथा प्रभावपूर्ण व्यक्तित्व के धनी प्रो. भट्टाचार्य ने वाराणसी में 4.12.2019 को अंतिम सांस ली।