बुन्देलखण्ड के किसी भी जनपद की पहचान महुआ से है। एक बहुत बड़ा भाग गौड़वाना और समूचे अंचल को बेर, गुलगुच, महुआ (गुलगुच महुआ का पका फल) महुआ और बेर इस अंचल के जनपदीय वृक्ष है । समस्त फलों, कंद से ज्यादा लोकप्रिय है महुआ इसी कारण से महुआ को मेवा बेर कलेवा (नाश्ता) और गुलगुच को सर्वोत्तम मिष्ठान्न का गौर मिला है। महुए भूनकर कूटकर उनमें गरी, चिरौंजी, आदि मेवा मिलाकर छोटी रोटी (कुचैया) की तरह बनाया गया खाद्य रहा है “लटा” । बुन्देली व्यंजन में सर्वोपरि महत्व दिया है महुए को । बुन्देलखण्ड की नायिका कहती है |
"मउआ मोरे भुँजे धरे हैं ।
लटा धरे हैं कूट
ग्योडे होके साजन कड़ गये ।
कौन बात की चूक ।।
ग्योड़े का अर्थ है गाँव के बाजू से निकल जाना ।
नायिका ने बड़ी मेहनत कर महुआ कूटे और मेवा मिला कर कुचैया बनाकर रखी उसके प्रिय मेहमान आने की कह गये किन्तु नहीं आये और गाँव के बाजू से निकल गये आखिर क्या चूक हो गई वह कहती है क्या गलती हुई जो वो नहीं आये । इन पंक्तियों के माध्यम से यह पता चलता है कि बुन्देलखण्ड में महुआ मिष्ठान के रूप में सर्वोपरि था। इसके उपयोग से शारीरिक श्रम करने वाला व्यक्ति ताकतवर होता था । मिष्ठान होने से शरीर को चमक मिलती थी। गुड़ और शक्कर गन्ने के माध्यम से प्राप्त होती है जिसकी आधिकता से सुगर (शक्कर) की बीमारी से ग्रस्त होना पड़ता है महुआ के प्रयोग से यह बीमारी नहीं जो पाती बशर्ते नियंत्रित आहार में लिया जावे संतुलन न बनने पर बहुत सी बीमारियां का सामना करना पड़ता है। आम आदमी की धारणा की खाने को "महुआ' मिले यानी कि सभी मेवा पा लिए ।
सामग्री - महुआ, चिरौंजी, नारियल गरी, अन्य मेवा मिला सकते हैं ।
विधि - "महुआ' भली भाँति साफ करें कूटने का उपकरण जिस खल बटा कहते हैं उसमें रखकर कूंटे, कुट जाने के बाद बाहर निकाल लेवें, चिरौंजी, नारियल गरी, अन्य मेवा जो रूचिकर हो मिला लेवें पूरा मिलाकर छोटी-छोटी रोटीनुमा (कुचैया) बनाकर मेहमानों एवं परिवार के सदस्यों को नाश्ता में खिलावें ।
पौष्टिकता - महुआ-कार्बोज, विटामिन, चिरौंजी-प्रोटीन, वसा, नारियल-वसा ।
कुल मिलाकर "लटा" पौष्टिक होता हैं इसके गृहण करने से मेहनतकश व्यक्ति चेतन्यता का अनुभव करता है रक्तचाप न घटता है न बढ़ता है संतुलन बना रहता है। तापमान नियंत्रित रहता है ।