जब व्यक्ति को उसकी शारीरिक आवश्यकता के अनुकूल उपयुक्त मात्रा में सभी भोज्य तत्व नहीं मिलते हैं या आवश्यकता से अधिक मिलते हैं, जिसके कारण शरीर की वृद्धि और विकास तथा उसकी क्रियाशीलता पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है तो यह 'कुपोषण' कहलाता है ।
कभी-कभी ऐसा भी होता है कि गुण और मात्रा की दृष्टि से सभी भोज्य तत्व शारीरिक आवश्यकता के अनुसार लिए जाते हैं परन्तु वास्तव में कुछ ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न हो जाती हैं, जो पर्याप्त एवं उपयुक्त भोज्य पदार्थों से युक्त आहार का उपभोग करने पर भी उसकी पौष्टिकता के लाभ से उपभोक्ता को वंचित रखती है । अतः यह कहना उचित होगा कि आवश्यकता से अधिक भोज्य पदार्थ, अपर्याप्त भोजन तथा कुछ सामाजिक व आर्थिक कारणों से कुपोषण की स्थिति उत्पन्न हो जाती है ।
परिभाषा - व्यक्ति के आहार में पोषक तत्वों की अपर्याप्त मात्रा होने पर जो शारीरिक एवं मानसिक विकृतियाँ देखी जाती हैं, उसे कुपोषण कहते हैं ।
अथवा
"आवश्यक पोषक पदार्थों की आपेक्षिक कमी अथवा अधिकता के फलस्वरूप उत्पन्न होने वाली पैथालॉजिकल अवस्था को ही कुपोषण कहते हैं ।"