बुन्देलखण्ड में सिमईयाँ तीन प्रकार से बनाई जाती हैं -
1. मशीन द्वारा - लोहा या पीतल की मशीन द्वारा गेहूँ आटा गूँथ कर बनाना और धूप में सुखाना ।
2. लकड़ी के पटा पर - छोटी-छोटी लोई बनाकर, पटा पर लम्बी-लम्बी हाथ से दबाते हुए हथेली के दबाव से पटा पर धागेनुमा लटकाते हुए खिसकाते जाना, पटा ऊँचाई पर रखा जाता है उसे धागा की भांति निकालते हुए धूप में सुखाया जाता है
3. बियाँ - अंगुलियों के दबाव से बनाना इसे बिया कहते हैं । पुरानी परम्परानुसार बिया को ही सिमैयां कहते थे । आटा गूँथ कर पहली अंगुली और (अंगूठा) के दबाव से छोटी-छोटी दिया की बाती की नोक के आकार की बनाकर धूप सुखाना सिमईयाँखाद्य संरक्षण भोज्य के अंतर्गत आती है इन्हें भी किसी भी मौसम में भोजन में ग्रहण किया जाता है। खास तौर पर हरितालिका व्रत के पूर्व रात्रि 12 के पहिले महिलाएँ सिमैयां भोजन में ग्रहण करती हैं, पौष्टिक तत्वों से सिमैया परिपूर्ण होती हैं। दूध, शक्कर, घी का मिश्रण होता है यह सम्पूर्ण आहार की श्रेणी में आती है इसीलिए हरितालिका तीजा व्रत आरम्भ करने के पूर्व महिलायें भोजन में खाती हैं ।
सामग्री - गेहूं का आटा, शक्कर या गुढ़-दूध ।
विधि - कढ़ाई या गँज में पानी को खौला लेवें, सिमैया कढ़ाई में सेंककर खौलते पानी में डाल देवें 20 मिनिट बाद मोटी छन्नी पर छानकर दूध शक्कर में खायें ।
बिना भुंजी सिमैया भी तैयार की जाती है उसे छानते नहीं है पानी कम होते ही उतारकर रख लेते हैं । तत्पश्चात् दूध शक्कर मिक्स करके भोजन में परोसते हैं ।
पौष्टिक तत्व -
गेहूँ - प्रोटीन
शक्कर, गुढ़ - कार्बोहाइड्रेट
दूध - सम्पूर्ण आहार अर्थात सभी पौष्टिक तत्वों का समावेश गुजिया