बुंदेलखंड की सांस्कृतिक धरोहर का डिजिटल संग्रह
बुंदेलखंड विश्वकोश

प्रो. भागीरथ प्रसाद त्रिपाठी (वागीश शास्त्री)

भागीरथ प्रसाद त्रिपाठी 'डॉ. वागीश शास्त्री' का जन्म ग्राम बिलैया, तहसील खुरई जिला सागर मध्यप्रदेश में आषाढ़ शुदि 13 वि. संवत 1991 तदनुसार 24 जुलाई 1934 ई. को आध्यात्मिक एवं पौराणिक परिवार में पण्डित जमना प्रशाद तिवारी एवं श्रीमती पार्वती तिवारी के घर हुआ। आपके जन्म के समय आपका नामकरण भक्तराम नाम से हुआ। भक्तराम जी, जो प्रोफ. भागीरथ प्रसाद त्रिपाठी 'वागीश शास्त्री' के नाम से विख्यात हैं और वे सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी से शोध निदेशक के पद से सेवानिवृत्त होकर वाराणसी में निवासरत रहे।

आपकी प्राथमिक शिक्षा खुरई नगर की प्राथमिक शाला में श्री मूलचन्द असाटी के शिक्षकत्व में पूर्ण हुई। आप ग्राम रेंगवां में रहकर खुरई पढ़ने हेतु जाया करते थे, यह ग्राम खुरई के समीप था। ग्राम बिलैया में तत्काल में कोई प्राथमिक विद्यालय नहीं था। प्राथमिक शिक्षा खुरई से पूर्ण करने के पश्चात् आप और आपके मंझले भाई (नेतराम उर्फ नित्यानंदजी ) को संस्कृत की शिक्षा हेतु सागर नगर के संस्कृत महाविद्यालय, धर्मश्री में प्रवेश दिलाया गया।यहां से दोनों भाइयों ने पण्डित गोविन्द प्रसाद शास्त्री के आचार्यत्व में संस्कृत प्रथमा तक शिक्षा ग्रहण की। प्रथमा के बाद उच्च शिक्षा हेतु वागीशजी वृन्दावन/ वाराणसी चले गए तब मंझले भैया अपने गृहग्राम वापस लौट गये ।इसी समय इनके बड़े भाई पण्डित नर्मदा प्रसाद जी अपनी संस्कृत शिक्षा पूर्ण कर वाराणसी से लौट आये थे और खुरई में बमूरा वाले शास्त्री जी(पं.गणेश प्रसादजी शास्त्री) से कर्मकाण्ड और पुराण वाचन की अग्रिम शिक्षा लेने लगे ।

वृन्दावन में वागीशजी के बचपन का नाम भक्तराम संशोधित होकर भागीरथ प्रसाद त्रिपाठी हुआ। ध्यातव्य है कि पूज्य पिताजी पं. जमना प्रसाद जी (दद्दा) के भी कुछ हस्तलिखित ग्रन्थों में उनके द्वारा त्रिपाठी आस्पद लिखा मिलता है, अतः वागीशजी ने भी तिवारी के बजाय त्रिपाठी आस्पद अपनाया। पण्डित जमना प्रसाद जी कर्मकाण्ड, तन्त्र, ज्योतिष, और सङ्गीत में प्रवीण थे, अस्तु अपनी सन्तति में वही सब देखना चाहते थे । उनमें विलक्षण नेतृत्व क्षमता थी, वे अपने गांव के साथ- साथ आसपास के अन्य 15-20 गाँवों के लोगों को भी अपना स्नेहभाजक बनाकर रखते थे । दूसरी ओर वे अध्ययन -अध्यापन से संलग्न रहने के कारण अद्भुत धर्मनिष्ठ व्यक्तित्व के भी धनी थे। घर में अतिथियों, पण्डितों, सङ्गीतज्ञों का निरन्तर आना होता था। उन्होंने अपने जीवन में कभी अकेले भोजन नहीं किया, उन्हें सदैव ही अतिथि की चाहत रहती थी। इस परिवेश के चलते वागीशजी ने अपनी संस्कृत की उच्च शिक्षा हेतु पर्याप्त उद्यम किया । वृन्दावन से व्याकरण में मध्यमा तक शिक्षा ग्रहण करने के पश्चात् आपने वाराणसी से शास्त्री, आचार्य, पी. एचडी., डी. लिट् की उपाधियाँ अर्जित कीं वाराणसी में अपनी गहन शिक्षा की उपलब्धि का श्रेय आप अपने गुरु पण्डित क्षेत्रेशचन्द्र चट्टोपाध्याय को देते हैं। टीकमणि संस्कृत महाविद्यालय से अपने अध्यापन कार्य का आरम्भ किया। इसके अनन्तर आप वाराणसेय संस्कृत विश्वविद्यालय (वर्तमान सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय) में प्राध्यापक और फिर शोध निदेशक के पद पर नियुक्त हुए। इसी पद से आप वर्ष 1996 में सेवानिवृत्त हुए । किन्तु संस्कृत के वास्तविक अध्यापक/ अध्येता कभी सेवानिवृत्त नहीं होते, अस्तु आपका शिक्षण/ शोध कार्य आजीवन निरत रहे। आप संस्कृत, अंग्रेजी, हिन्दी के अलावा 18 अन्य देशी एवं विदेशी भाषाओं के ज्ञाता रहे। आपने विभिन्न माध्यमों से सहस्त्रों विदेशी छात्रों को संस्कृत सिखायी है। इस हेतु आपने फ्रांस, जर्मनी, रूस आदि अनेक देशों की अकादमिक यात्रायें की हैं। शताधिक ग्रन्थों के लेखन तथा सम्पादन का श्रेय आपको प्राप्त है। सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय के प्रकाशन विभाग तथा वहां से प्रकाशित होने वाली प्रतिष्ठित पत्रिकाओं, ग्रन्थों के सम्पादन के दायित्व का आपने दो दशकों से अधिक तक निर्वहन किया है। आपको प्राप्त सम्मान एवं पुरस्कारों की सुदीर्घ श्रृंखला है। इनमें उल्लेखनीय हैँ- काशी पण्डितपरिषद का प्रतिष्ठित सम्मान -महामहोपाध्याय, उ.प्र. शासन द्वारा प्रदत्त यश भारती सम्मान, भारत के राष्ट्रपति द्वारा प्रदत्त राष्ट्रपति पुरस्कार तथा पद्मश्री।

बहुमुखी प्रतिभा के धनी, वागीशजी संस्कृत व्याकरण, वेद-वेदान्त, सांख्य, मीमांसा, साहित्य, भाषाविज्ञान, तन्त्र के अधिकारी आचार्य होने के साथ-साथ सङ्गीत में भी दक्ष रहे। आपने वृन्दावन में व्यतीत अपने छात्र जीवन में वेणु(बाँसुरी) वादन में दक्षता प्राप्त की, इसके अतिरिक्त आप हारमोनियम वादन तथा गायन पर भी अधिकार रखते हैं । आपने विश्वविद्यालय में लगभग सभी विषयों के शोधार्थियों का मार्गदर्शन किया है। आप खुरई तहसील में जन्मे लोगों के मध्य सम्भवतः प्रथम पोस्टडॉक्टरेट, प्रथम महामहोपाध्याय तथा प्रथम पद्मश्री हैं। संस्कृत व्याकरण में आपने इतना कार्य किया है कि वाराणसी का विद्वत्वर्ग आपको द्वितीय पाणिनि के सम्बोधन से सम्मानित करता है।

आप बचपन से ही अध्ययन और अध्यापन में विशेष रुचि रखते थे। ग्रीष्मकालीन अवकाश आप प्राय: अपने गृहग्राम बिलैया में बिताते थे। उस समय भी एक अटैची भरकर ग्रन्थ आपके साथ आते थे। ग्रामीण समवयस्कों से संक्षिप्त वार्ता कर आप पढ़ाई लिखाई में लग जाते थे । प्रातः 4-4:30 बजे तक जागकर मंझलेघर के कुँए पर योग, स्नान, संध्यावन्दन कर सूर्योदय तक आप घर लौट आते थे। उस समय उनके साथियों में गँझले भाई श्रीसुखदेवजी एवं पण्डित अनन्दी लालजी गौतम रहा करते । ग्रीष्मकाल में खलिहानों में घास एवं पुआल से छोटी कुटी बनाई जाती थी जिसमें बैठकर परिवार के वरिष्ठजन खलिहान के कार्यों का अवलोकन करते थे। यही कुटिया/ पर्णकुटी वागीशजी को भाती थी। ग्राम प्रवास के दौरान श्रीमती त्रिपाठी भी आपके साथ आतीं और वे इन्हें डॉक्साब सम्बोधित करतीं, तो गांव के लोग कहते अब हम अपने घर के डॉक्साब से ही अपना इलाज कराएंगे। उन्हें बड़ी कठिनाई से समझाया जा पाता कि ये इलाज वाले डॉक्साब नहीं हैं। ऐसी अनेक मधुर स्मृतियां वागीशजी के ग्राम प्रवास से जुड़ीं हैं।

प्रो. भागीरथ प्रसाद त्रिपाठी 'वागीश शास्त्री' एक प्रख्यात भाषाविद्, वैय्याकरण तथा पारम्परिक पाणिनि व्याकरण के श्रेष्ठ शिक्षक रहे। आपने अनेक वर्ष तक वैदिक एवं संस्कृत व्याकरण पढ़ाया है।

'पाणिनीय धातुपाठ समीक्षा' (1965) तथा 'धात्वर्थ विज्ञानम्' (1967) जैसे ग्रन्थों में आपने सूत्रपाठों की विस्तृत व्याख्या की है। 'कृषकाणां नागपाशः' (1958) जैसे रेडियो रुपक के माध्यम से ग्रामीण अञ्चल के जमीदारों द्वारा छोटे कृषकों/खेतीहर मजदूरों के उत्पीडन को सशक्त रूप से निरूपित किया है । वहीं 'कथा-संवर्तिका ' (1959) में आपने संस्कृत में मौलिक कथायें प्रस्तुत कीं। इसी क्रम नेह 'टालस्टाय-कथासप्तकम् '(1970) में आपने संस्कृत में सात नीति-कथायें प्रस्तुत की हैं।

हास-परिहास हेतु वागीशजी ने 'नर्म-सप्तशती (1984) नामक ग्रन्थ का सृजन किया है जो संस्कृत, हिन्दी एवं अंग्रेजी (तीन भाषाओं) में अनूदित है। सामयिक ग्रन्थों की सर्जना के क्रम में 'आतङ्कवाद शतकम्' (1992)भी अत्यन्त चर्चित ग्रन्थ है यह ग्रन्थ भी हिन्दी एवं अंग्रेज़ी में अनुवादित है। भुजङ्गप्रयात छन्द में निबद्ध इस शतक में पंजाब की तत्कालीन आतङ्कवाद की समस्या का यथार्थ चित्रण किया गया है।

भाषा वैज्ञानिक दृष्टि से 'शब्द- निर्वचन और शब्दार्थ ' (2004), 'तद्धितान्ताः केचन शब्दाः' (1967), 'बुन्देलखण्ड की प्राचीनता '(1965), 'जिप्सीभाषा ' (1986), Gypsi language and Grammar ' (2004)आदि ग्रन्थ उल्लेखनीय हैं। 'बुन्देलखण्ड की प्राचीनता' एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक ग्रन्थ भी है।

जनसामान्य को संस्कृत भाषा सिखलाने हेतु आपने सरल और वैज्ञानिक विधि विकसित की जिसे आपने अपने ग्रन्थ 'संस्कृतभाषा सीखने की सरल और वैज्ञानिक विधि ' (1992) के माध्यम से प्रस्तुत किया। इस क्रम में 'Conversational Sanskrit ' (2000) तथा ' Mnemonic Sanskrit ' (2000) भी आपके अद्वितीय ग्रन्थ हैं।

योग और तन्त्र पर भी आपने महत्वपूर्ण ग्रन्थ प्रस्तुत किए हैं। 'योगचूडामणिउपनिषद् (1994) संस्कृत- हिन्दी - अंग्रेजी व्याख्या सहित यह ग्रन्थ कुण्डलिनी विषय पर पर्याप्त प्रकाश डालता है। 'संवित्प्रकाश ' (1993) - काश्मीर शैव परम्परा के वामनदत्त(अभिनव गुप्त के गुरु) द्वारा विरचित तन्त्र के इस ग्रन्थ का लगभग 1000 वर्ष पश्चात् विधिवत् सम्पादन वागीशजी ने किया है। 'Shakti Shiva and Yoga (2000) - अंग्रेजी भाषा में रचित इस ग्रन्थ में वागीशजी ने शक्ति शिव ● और योग के गूढ़ तत्वों को समझाया है। 'पराचेतना की यात्रा' (2000) - यह ग्रन्थ 'वाग्योग - कुण्डलिनी साधना' की सैद्धांतिक पृष्ठभूमि के रूप में लिखा गया है। Vagyoga C Kundalini meditation (2001) तथा ' shri 'तन्त्र के अत्यन्त महत्वपूर्ण ग्रन्थ आपके द्वारा विरचित हैं। आपके शिष्य द्वारा यह पूछे जाने पर कि काश्मीर शैवदर्शन में पूर्व में ही अभिनवगुप्त द्वारा तंत्रालोक सृजित है तो आपने 'श्रीवाग्योगतन्त्रम्' की रचना क्यों की? वागीशजी का कथन है कि तन्त्र के आगम पराचेतना में प्राप्त होते हैं, मुझे जो प्राप्त हुआ उसे मैंने ग्रन्थ का रूप दिया। 11.05.2022 को इन्होंने नश्वर देह का त्याग कर दिया।

क्या इस लेख में कोई त्रुटि है?