हमेशा देखने में यह आता है कि ताजे, फल तथा सब्जियाँ पकाने की एक निश्चित अवधि के बाद सड़ने व सूखने लगती है, उनके रंग, रूप, स्वाद तथा आकार में परिवर्तन होने लगता है । फिर वह खाने योग्य नहीं रह जाता है । खाद्य पदार्थों के दूषित होने के मुख्य कारण निम्न है ।
1. एन्जाइम - समस्त जीवधारियों में रासायनिक तल उपस्थित रहते हैं यही एन्जाइम हैं । एन्जाइम जहां एक ओर फलों, सब्जियों को पकाने में सहायक होते हैं वही इस क्रिया को न रोका जाये तो पदार्थ सड़ने-गलने लगते हैं । क्योंकि यह एक जटिल रासायनिक क्रिया है जो सदा क्रियाशील रहती है। एन्जाइम की क्रिया को समाप्त करके इससे होने वाली खराबियों से बचा जा सकता है । इसका सबसे अच्छा तरीका एन्जाइम की प्रकृति के अनुसार 107° F से 212° F तक गर्म करके एन्जाइम की क्रिया को समाप्त किया जा सकता है ।
2. सूक्ष्मजीवन - बैक्टीरिया खमीर फफूँदी - ये सभी जीवित वस्तुएँ, जिन्हें केवल सूक्ष्मदर्शी यंत्र से देखा जाता है उन्हें सूक्ष्मजीव कहते है। बैक्टीरिया, खमीर, फफूँदी से अति सूक्ष्म होते हैं जो सरलता से दिखाई नहीं देते इनकी उत्पत्ति पानी, मिट्टी, वायु आदि में होती है । खाद्य सामग्री को आसानी से खराब करते हैं इन जीवाणुओं से आर्थिक लाभ हैं तो हानियाँ भी होती हैं ।
बैक्टीरिया से बचाव - वैज्ञानिक युक्त खाद्य पदार्थों को यदि पर 107° F पर 30 मिनिट तक गर्म किया जाए तो अधिकतर बैक्टीरिया नष्ट हो जाते हैं किन्तु कुछ विशेष प्रकार के होते हैं जो तेज तापमान सह लेते हैं फिर "स्पोर” में बदल जाते हैं । इसलिए खाद्य पदार्थों को "स्पोर" से बचाने के लिए 230° F 30 मिनिट तक गर्म करना चाहिए और खट्टे फलों को बैक्टीरिया मुक्त करने के लिए 212° F गर्म करना चाहिए ।
खमीर से बचाव - खाद्य पदार्थ को लम्बे समय तक प्रयोग में लाने के लिए 130°F पर गर्म करके खमीरीकरण से मुक्त किया जा सकता है। इससे किसी विषैले पदार्थ की उत्पत्ति नहीं होती है ।
फफूँद से बचाव - फफूँद वनस्पति वर्ग का सूक्ष्म जीव है इससे बचने के लिए तेज तापमान 165°F पर इसे नष्ट किया जा सकता है । यदि बचाव का साधन नहीं अपनाया गया तो खाद्य पदार्थ में विषैलापन आ जाने से तन, धन की हानि हो जाती है ।
संरक्षण विधियाँ - बुन्देली व्यंजन का सही रखरखाव भी आवश्यक है तभी व्यंजन का सेवन करने का पर्याप्त आनंद है। संरक्षण विधियाँ निम्न हैं। जिनके अनुसार खाद्य पदार्थ को सुरक्षित रखकर भरपूर लाभ उठाया जा सकता है।
घरेलु विधियाँ - गृहणियाँ घरेलु स्तर पर घर में फल-सब्जियों को सुरक्षित रखने के घरेलु विधियों को अपना कर परिवार को लाभान्वित कर सकती हैं। बुन्देली गृहिणी भी अन्य क्षेत्रीय गृहिणी की तरह चतुर ज्ञानवान हैं प्रशीतन विधि में भोज्य पदार्थ की आर्द्रता एवं उष्णता ही भोजन को सड़ाती है यदि आद्रता को हटा दिया जाये तो भोजन सुरक्षित रहता है।
निर्जलीकरण - खाद्य पदार्थ को सुखाकर रखना प्राचीनकालीन विधि है । निर्जलीकरण का अर्थ है फल या सब्जी को जल रहित करना । फल या सब्जियों को सुखाया जाता है जिसमें अधिक समय तक खाने में उपयोग होता रहता है। जल सूख जाने पर शर्करा की मात्रा बढ़ जाती है, यही कारण है कि किशमिश, अंजीर, छुआरे, खजूर आदि फल मेवे के रूप में काफी समय तक रखे रहते हैं। अतः पौष्टिकता बढ़ जाती है। नमक, शक्कर द्वारा संरक्षण से ऑवला, खट्टपन, आम एवं अन्य सब्जियों को नमक पानी में डुबाकर या उनमें नमक मिलाकर संरक्षित करते हैं। नमक की मात्रा अधिक होने से बैक्टीरिया उत्पन्न नहीं होते । शक्कर के घोल से अधिकतर जीवाणु नष्ट हो जाते हैं और खाद्य पदार्थ आहार योग्य बने रहते हैं । अतः संरक्षित विधि का पोषक तत्वों पर कोई बुरा असर नहीं पड़ता है। बल्कि पोषक तत्वों के गुण बढ़ जाते हैं । कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन वसा विटामिन, खनिज लवण, संरक्षित पदार्थों में भली भांति प्राप्त हो जाता है ।
बुन्देलखण्ड खेतीहर किसानी क्षेत्र है, समृद्ध होते हुये भी पोषण का ज्ञान न होने पर पोषक तत्वों की कमी आहार में होने पर विविध प्रकार की हानियों का सामना करना पढ़ता है और अज्ञानतावश उचित पोषक तत्वों का समावेश भोजन में नहीं हो पाता जबकि विवेक से सस्ते और मँहगे दोनों आधार पर पौष्टिक तत्वों को प्राप्त किया जा सकता है। इसके लिए आवश्यक तालिका के माध्यम से जानकारी प्राप्त करना।
बुन्देलखण्ड में पाए जाने वाले पोषक तत्व युक्त आहार
| भोजन तत्व मँहगे साधन | महंगे साधन | सस्ते साधन |
|---|---|---|
| प्रोटीन | दूध, दही, पनीर | दालें, मक्खन निकाला दूध, मट्ठा, चौरई भाजी, हरी- पत्तेदार सब्जियाँ, सोयाबीन |
| कार्बोज | गेहूँ, चावल, चीनी, शहद, मुरब्बे, मिठाईयाँ, सूखे फल, मेवे | चना, जौ, बाजरा, गुढ़ आलू, शकरकंद आदि |
| वसा | घी, मक्खन, दूध, मलाई, पनीर क्रीम | तेल, सरसों, अलसी, वनस्पति घी |
| खनिज लवण | दूध, सभी प्रकार के मेवे फल | सब्जियाँ, भिण्डी, फतकुली, फूल गोमी एवं पत्ता गोभी ककड़ी, मूली, गाजर, गेहूँ, चना, दालें ! प्याज, लहसुन, अदरक, करेला, बरबटी |
| विटामिन | सभी प्रकार के फल | अमरूद, बेर, अचार, मऊआ मकोरा करौंदा आदि । |
सस्ते खाद्य पदार्थों में सूखे भुने चना, मूंगफली दाना, दलिया, साबूदाना की खीर, चॉवल खीर, गेहूँ खीर आदि । मूँग, चनादाल, गेहूँ, चना को अंकुरित कर भोजन में सम्मिलित किए जायें तो इससे पोषक तत्व शुद्ध मात्रा में प्राप्त हो जाते हैं ।
बुन्देलखण्ड में राजाओं के भोजन में सस्ते मँहगे सभी भोज्य पदार्थ सम्मिलित होते थे । वीरभूमि में वीरों के आहार के लिए बहुत कुछ उत्पादित किया बस । आवश्यकतानुसार, ग्रहण करना मानव प्राणी पर निर्भर है। समय काल के अनुसार भोज्य सामग्री में पोषक तत्व आज भी बरकरार है । वर्तमान में बुन्देली व्यंजन का सेवन भली भाँति हो रहा है, व्यंजन नहीं है मात्र सही बुन्देली नाम ज्ञात नहीं हो पाने के कारण, परिवर्तित नाम जाने गए। जैसे "बफोरी" का पूरा रूप 'ढोकला' 'में देखने मिलता है । दाल, साब्जियों सही मिक्स बनती हैं जिसे सांवर नाम दिया गया । प्राचीन समय में "भरता' (भुर्ता) अंगारों पर भटा, टमाटर, प्याज भूनकर मिक्स करके खाने में उपयोग करते थे आज उसी को सब्जी जैसा बघार कर खाया जाता है। रूचि वही है विधि वही है समय परिस्थिति बस परिवर्तन देखा गया । कभी भोजन पकाने की विधि त्रुटिपूर्ण होने के कारण भोज्य पदार्थ उपयोगी होते हुए अनुपयोगी हो जाता है। जैसे कुछ सब्जियाँ धीमी आँच में पकाई जाती है । भाप के द्वारा पकाने से पौष्टिकता बनी रहती हैं । यदि तेज आँच में पकाया गया तो भोजन के तत्व नष्ट हो जाते हैं, वह भोजन सुपोषण नहीं कुपोषण का रूप ले लेता है ।
भोजन की पौष्टिकता "रसुइया" अर्थात भोजन पकाने वाले के ऊपर निर्भर करती हैं। भोजन पकाने के पूर्व की तैयारी साफ स्वच्छ करे जैसे सब्जी काटने के पहिले साफ करके काटना ! भोजन जिस स्थान पर पकाया जा रहा है वह साफ रखना उपयोग में आने पानी शुद्ध हो पानी ढंककर रखा जावे। जिन बर्तनों में भोजन पकाया जा रहा है वह साफ हो । अन्यथा जीवाणुओं की गतिशीलत त्वरित गति से आरम्भ हो जाती है और व्यंजन में वह रस नहीं होता जो होना चाहिए ।
भोजन पकाने की विधियों - भोजन कई विधियों द्वारा पकाया जाता है प्रत्येक विधि में ताप का किसी न किसी रूप में प्रयोग अवश्य किया जाता है। भोजन पकाना भी एक कला है। प्रमुख विधियाँ- (1) वायु द्वारा भोजन पकाना इसके अंतर्गत भूनना, सेंकना आता है। (2) चिकनाई द्वारा पकाना, तलना, इसके अंतर्गत उथली विधि, गहरी विधि, सूखी विधि, का उपयोग किया जाता है। (3) जल द्वारा उबालना, धीमी आँच पर पकाना (4) भाप द्वारा पकाना, वर्तमान में इस विधि के अंतर्गत कुकर का उपयोग होती है जिसमें पौष्टिक तत्व नष्ट नहीं होता । (5) सौर ऊर्जा द्वारा पकाना इस विधि का प्रयोग सूर्य की किरणों का ताप ऊर्जा देता है जिससे भोजन पकाया जाता है पौष्टिक तत्व मौजूद रहते हैं परन्तु समय अधिक लगता है आज के जमाने में इतना वक्त कहाँ रहता कि चार-पाँच घन्टे रसोई तपी जावे । आज के वैज्ञानिक युग में चहुँमुखी प्रगति हुई है जैसे बिजली का चूल्हा, बिजली का स्टोव, बिजली की भट्टी । पुराने समय में मिट्टी का चूल्हा, ऊला सिगढ़ी होती थी जिसमें लकड़ी, कोयला, कण्डा का उपयोग ईंधन के रूप में होता था । पुरानी पद्धति और नवीनतम पद्धति से भोजन पकाने में स्वाद की दृष्टि से बहुत अंतर है । किन्तु समय शक्ति की बचत आज की आवश्यकता हो गई है। इन सभी भोजन पकाने की विधियों में एक मात्र भाप की विधि है जो पौष्टिक तत्व मौजूद रखती है । शेष विधियों में तत्व नष्ट हो जाते हैं
भोजन की स्वादिष्टता तथा पोषकता में भोजन पकाने के बर्तनों का भी प्रभाव पड़ता है । बुन्देलखण्ड में प्राचीनकालीन परम्परा में भोजन पकाने के बर्तन मिट्टी द्वारा निर्मित होते थे दाल, सब्जी, चॉवल पकाने के पात्र को "हड़िया' कहते थे । सुआरी जिसमें सेंकी जाती थी उसे "तइया" कहते थे । रोटी सेंकने के बर्तन को "कैयला" कहते थे । मिट्टी की "नाद" जिसमें दूध पकाया जाता था मिट्टी का "तसला" जिसमें दही जमाया जाता था । मट्ठा मथने की "चपिया" होती थी छोटे बड़े डबले, डबलियाँ होती थे । उस जमाने के बुजुर्ग आज भी इन सब बर्तनों का बयान करते हैं और कहते हैं कि " उस जमाने में कढ़ी, दार, चाउर, आलू भटा टमाटर की सब्जी को, जो स्वाद हतो आज ऊसों कहाँ है, हमाये समइया दही, मट्ठा देखतई बनत तो ।" डबला में घी रखा जाता था वह भी "छींके" पर उस जमाने में और आज की परिस्थितियों में तुलना नहीं की जा सकती है । अतः यूँ कहें कि प्राचीन बुन्देलखण्ड और आधुनिक बुन्देलखण्ड में अंतर है क्या वैज्ञानिकता भौतिकता का प्रभाव । चूल्हें की रोटी रूचि कर स्वादिष्ट होती है आज के जमाने की गैस परम्परा ने चूल्हे छीन लिए है । फिर भी अधिकांश जनपदों में मिट्टी बर्तन, मिट्टी के चूल्हे भारतीय बुन्देली परम्परा बरकरार है । पत्थर की सिल और लोड़ा बुन्देली प्राचीन परम्परा है। चटनी एवं मसाले का स्वाद लाजबाव होता है । भले इलेक्ट्रिक मिक्सी का प्रचलन है लेकिन बुन्देलखण्ड के अधिकांश घरों में पत्थर की "सिल" और पीसने का "लोड़ा" जरूर होता है । "सिल" पर उड़द की दाल, मूँग की दाल पीसी जाती है जिससे बरा एवं मगोड़ी का स्वाद अलग ही होता है । कहने का तात्पर्य यह है कि बुन्देली संस्कृति और परम्परायें बुन्देलखण्ड की पहचान है । धरोहर है इन्हें सहेजकर रखना प्रत्येक बुन्देलखण्ड के जनपदीय क्षेत्र का परम कर्तव्य है
कभी-कभी भोज्य पदार्थों को पकाने की विधि त्रुटिपूर्ण होने से भोजन उपयोगी होते हुए अनुपयोगी हो जाता है। जैसे कुछ सब्जियाँ धीमी आँच पर पकाने से कम तेल मसाले के प्रयोग से पौष्टिकता मौजूद रहती है, लेकिन इन्हीं सब्जियों को अधिक तेल मसाले तथा तेज आँच पर पकने से पौष्टिकता समाप्त हो जाती है इसी प्रकार समस्त प्रकार की दालों को भाप द्वारा पकाने से पौष्टिकता बनी रहती है ।
प्राचीनकाल में भोजन लकड़ी, कोयले, कण्डे जैसे ईंधन को जलाकर पकाया जाता था । बर्तन पीतल, कांसा, एल्युमीनियम के होते थे पर मिट्टी की हड़ियां में दाल, सब्जी, कढ़ी, महेरी बनती थी जो अत्याधिक स्वादिष्ट होती थी दही मठा मिट्टी के बर्तन में ही जमाकर मथा जाता था। जिसमें सौंदापन होता था । चपाती अर्थात् रोटियाँ मिट्टी के कयला जो तबा से ज्यादा गहरा और ऊपर से उठा हुआ होता था ।
ये रोटियाँ मिट्टी के चूले में लकड़ी, कण्डे के ईंधन से अंगार पर सैकी जाती थी । जो स्वादिष्ट और रूचिकर सौंधी हुआ करती थी भोजन के आनंद को दुगुना करतीं थीं । अब आधुनिक उपकरण में गैस चूल्हा एवं हीटर तथा पकाने के बर्तनों में स्टील की धातु और कुकर का प्रचलन है । समय शक्ति की बचत तो होती है पर पौष्टिक मूल्य में कमी होती है । कुकर एक ऐसा पात्र है जिसमें खाद्य सामग्री को पकाने के बाद पौष्टिक तत्व नष्ट नहीं होते हैं।
चटनी मिक्सी से ज्यादा पत्थर की सिल बट्टा द्वारा पीसी जाने पर अधिक स्वादिष्ट लगती है । जिस बट्टा का चलन प्राचीन आदिकाल से चला हा रहा है । बुन्देलखण्ड में अधिकांश घरों में आज भी सिल बट्टा होता है । जिस पर चटनी, बड़ी, मंगोड़ी, बरा की दाल पीसी जाती है जिसमें प्राकृतिक स्वाद होता है ।
बुन्देली व्यंजन की एतिहासिकता और वैज्ञानिकता से अवगत कराना हमारा कर्तव्य है । बुन्देलखण्ड के भूले बिसरे व्यंजनों की सुधि करना भी हमारा कर्तव्य है । नव पीड़ी समझ सके बुन्देली व्यंजन और पाश्चात्य व्यंजन में क्या अंतर है आप स्वयं ज्ञात कर व्यंजनों का आनंद लेगें । बुन्देली व्यंजनों को मैंने तीन खण्ड में विभाजित किया है। प्रथम गेहूँ से बने व्यंजन, द्वितीय चना से बने व्यंजन, तृतीय अन्य बुन्देली व्यंजनों का वर्णन पकाने की विधि एवं पौष्टिकता सहित किया है । मुझे विश्वास है बुन्देली गृहणियाँ इन व्यंजनों को अपनी रूचि के अनुसार भली भाँति विधिवत् पकाएंगी और परिवार के सदस्यों को भोजन में परोंसेगी तभी बुन्देलखण्ड की लोक संस्कृति, लोक व्यंजनों की परम्परा जीवंत रहेगी । भोजन के तत्वों से अवगत करने का उद्देश्य है । परिवार के सदस्यों को संतुलित आहार मिले और तीज त्यौहारों पर पकवानों का आंनद ले सकें । सभी व्यंजनों में पोषक तत्वों की मात्रा पाई जाती है। इसका ध्यान जरूर रखिएगा। निवेदन यह है कि अधिकता सर्ववर्जित है संयम, नियम आवश्यक है तभी भोजन का महत्व है । मानव प्राणी की पहिली आवश्यकता रोटी फिर वस्त्र और मकान है । स्वविवेक से जितना प्रस्तुत कर सकी सुधि पाठकों का इसमें सहयोग रहेगा । और सदैव की तरह आपके स्नेहाशीष की आकाँक्षी रहूंगी तभी कलम चलेगी । त्रुटि के लिए अपना समझकर क्षमा करें अंत में यही कहूँगी
व्यंजन आपके, स्वाद आपका हम मात्र निमित्त हैं ।
रसुइया बना परोसा है रूच-रूच ग्रहण करें ।।
डॉ. प्रेमलता नीलम