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पं. चंद्रशेखर व्यास

इनका जन्म शाजापुर जिले में एक संभ्रांत औदिच्य परिवार में हुआ था। उनके पिता माता सागर आकर बस गए। उनकी गणना सागर के प्राचीन पंडितों में की जाती है। समय के दीर्घ अंतराल ने उनकी पहचान खो दी है। सागर में इतवारी टौरी पर निवास करने लगे। सागर से प्राथमिक अध्ययन कर संस्कृत के अध्ययन हेतु बनारस चले गए। वहां से शास्त्री, आचार्य तक की शिक्षा प्राप्त कर सागर आ गए। सागर में श्री सत्यनारायण मंदिर का निर्माण कराया और शाजापुर से अपने साथ लाए बाल रूप द्वारकाधीश को विराजित किया।

मंदिर में इन्होंने गरीब ब्राह्मण परिवारों के बच्चों को संस्कृत की शिक्षा प्रदान करना शुरू कर दिया। विद्यार्थियों के मंदिर में ही रहने और खाने की निशुल्क व्यवस्था की गई। उनके पढ़ाए गए कोई भी विद्यार्थी अब इस दुनिया में नहीं है। उनकी पत्नी सभी शिष्यों के साथ पुत्रवत् स्नेह रखती थीं। उनके सभी शिष्य प्रायः बनारस से उच्च शिक्षा प्राप्त कर अध्यापन और पौरोहित्य का कार्य करने लगे। उनके भतीजे लड्डू महाराज के नाम से जाने जाते थे और भतीजे की पत्नी रामकुंवर बाई आज भी उस क्षेत्र में आई के नाम से जानी जाती हैं। वर्तमान में मंदिर में उनकी तीसरी पीढ़ी के सदस्य श्री गिरिराज व्यास विधिवत पूजन कार्य कर रहे हैं।

वर्तमान में मंदिर के पास अच्छी संपत्ति है। उस समय के नगर सेठ राधावल्लभ बजाज ने कनेरा गांव स्थित अपनी कई एकड़ जमीन दान में दी। मंदिर की व्यवस्था पूर्ण वैभव के साथ सुचारू रूप से चल रही है। व्यास जी भागवत के अच्छे पंडित थे तथा अनेक स्थानों पर उन्होंने भागवत पर प्रवचन दिए। उनके समय की अनेक ग्रन्थों की बहुमूल्य हस्तलिखित पाण्डुलिपियां लगभग कुछ वर्ष पहले संस्कृत विभाग के पांडुलिपि विभाग को भेंट कर दी गई हैं। जीवन पर्यंत इन्होंने संस्कृत की सेवा की और बनारस परंपरा से प्रेरित होकर निशुल्क शिक्षा प्रदान करते रहे ।

1960 के दशक में लगभग 90 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। उनकी शव यात्रा उनके शिष्यों द्वारा विमान रूप में निकाली गई थी। दाह संस्कार शमशान में न करके लेहदरा नाका की नदी किनारे किया गया। वहां उनकी समाधि भी बनाई गई थी।

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