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डॉ. किरण आर्या

शास्त्रार्थ समर्थ, मूर्धन्य व्याकरणाचार्या डॉ. किरण आर्या का इनका जन्म 03.01.1981 को उज्जैन के पं. श्री राजेंद्र त्रिपाठी के यहां हुआ। इनके पिता संस्कृत में स्नातक और हरिद्वार से आचार्य की उपाधि प्राप्त हैं । वे प्रतिष्ठित अखबार दैनिक भास्कर में पत्रकार और वेदमाता पत्रिका के संपादक भी रहे। वर्तमान में वे संन्यास ले चुके हैं। डॉ. किरण तीन भाई तथा एक बहन हैं। यह सबसे बड़ी हैं। तीनों भाई दिल्ली, उज्जैन में अपने- अपने व्यापार तथा अन्य सेवा में संलग्न हैं। इनकी माता श्रीमती पुष्पा त्रिपाठी हायर सेकेंडरी तक शिक्षा प्राप्त एक सुयोग्य गृहिणी हैं। डॉ. किरण आर्या ने गुरुकुल सासनी में 2 वर्ष तक अध्ययन किया। उस समय उनकी उम्र मात्र 5 वर्ष थी। 8 वर्ष की आयु में गुरुकुल पाणिनि कन्या महाविद्यालय और आगे की पढ़ाई नित्यानंद वेद महाविद्यालय वाराणसी से पूर्ण की। बाद में 2004 में संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय वाराणसी से व्याकरण में आचार्य और डॉ. श्रीकांत पांडेय के निर्देशन में 2009 में पीएच.डी. की उपाधि अर्जित की। इसके बाद 2011 में महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से एम.ए. संस्कृत की उपाधि प्राप्त की। इन्होंने सभी परीक्षाएं प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कीं । ये यूजीसी से नेट तथा जेआरएफ उत्तीर्ण हैं। इन्होंने भारत की मूर्धन्य व्याकरणविद श्रीमती पुष्पा दीक्षित द्वारा संस्थापित पाणिनि शोध संस्थान बिलासपुर में शोध सहायिका के रूप में 2 वर्ष कार्य किया । 23 मार्च 2012 से 30 मई 2013 तक श्री रामसुंदर संस्कृत महाविद्यालय दरभंगा बिहार में अध्यापन कार्य किया । वर्तमान में 04.06.2013 से संस्कृत विभाग डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय सागर में सहायक प्राध्यापक के रूप में कार्य कर रही हैं।

29.11.2011 को इनका विवाह महोबा निवासी डॉ. सुकदेव वाजपेयी के साथ संपन्न हुआ। वाजपेयी जी वर्तमान में स्वामी विवेकानंद विश्वविद्यालय सागर में संस्कृत विभाग के अध्यक्ष हैं। संस्कृत के अतिरिक्त रामचरितमानस के भी अच्छे विद्वान हैं। इनकी तीन संतान हैं। डॉ. किरण आर्या ने व्याकरण में विशेषज्ञता भारत की प्रसिद्ध व्याकरण ज्ञाता डॉ. पुष्पा दीक्षित से प्राप्त की है। इनके 7 ग्रंथ तथा 65 से अधिक शोध पत्र प्रकाशित हैं। ये लगभग 70 राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियों में शोध पत्रों का वाचन कर चुकी हैं। ये वेद और व्याकरण विषय की विशेषज्ञ हैं तथा इस रूप में 30 से अधिक व्याख्यान दे चुकी हैं। इनकी पढ़ाने की शैली अत्यंत सरल तथा बोधगम्य है। इसीलिए ये विद्यार्थियों में अत्यंत लोकप्रिय हैं, खासकर छात्राओं के साथ तो इनका व्यवहार मित्रवत है। ये स्त्रियों के वेद अध्ययन करने की समर्थक हैं ।

वाराणसी की शास्त्रार्थ परंपरा से ये पूर्ण परिचित हैं और शास्त्रार्थ करने की पर्याप्त योग्यता रखती हैं। तत्काल ही संस्कृत की छंद पदावली रचना की इनकी अद्भुत क्षमता है जिसे सुनकर सुधी जन प्रभावित होकर प्रशंसा करने लगते हैं। इनकी पदावली में पदलालित्य प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। 'गौर गौरव गीतिका' रचना का प्रत्येक पद्य इसकी पुष्टि करता है। इनके निर्देशन में एक शोधार्थी ने पीएच. डी. उपाधि प्राप्त की है तथा चार शोधार्थी शोध कार्य कर रहे हैं। भविष्य में इनकी भारत की प्रमुख व्याकरणविद् बनने की पूर्ण संभावना है। ये सागरिका पत्रिका की प्रबंध संपादक तथा नाट्यम पत्रिका की संपादक मंडल की सदस्य हैं। इन्हें सागर में आर्ष परिषद द्वारा युवा सम्मान, ललितपुर में शिक्षा एवं समाज सेवा सम्मान तथा भोपाल में व्याकरण सम्मान प्राप्त हुए हैं।

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