इनका जन्म 16.08.1942 को मध्य प्रदेश के धार जिले में एक संपन्न परिवार में हुआ था। इनके पिता पं. लक्ष्मी नारायण जी शर्मा चंदन की लकड़ी का व्यापार करते थे। इनके तीन भाई थे। यह अपने माता-पिता की सबसे बड़ी संतान थीं। इनके पिता बेटी को ज्यादा पढ़ाने लिखाने के पक्ष में नहीं थे । प्राथमिक शिक्षा धार में पूरी करने के बाद यह इंदौर में अपने मामा श्री लक्ष्मी नारायण दुबे, पुलिस अधीक्षक इंदौर के पास आकर रहने लगीं। मामा के यहां कोई संतान नहीं थी, इसलिए मामा ने इन्हें गोद ले लिया था।
बाद की शिक्षा इंदौर में ही पूरी हुई। लगभग 2 वर्ष तक इन्होंने इंदौर में ग्लाइडर (दो सीट वाला छोटा विमान) उड़ाने का प्रशिक्षण भी लिया। हायर सेकेंडरी पास करते ही इंदौर के शासकीय स्कूल में इनकी नौकरी लग गई । और इस प्रकार इन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में प्रवेश किया। यहीं से संस्कृत में स्नातकोत्तर की परीक्षा उत्तीर्ण की। इनका विवाह इतवारी टौरी सागर में प्रतिष्ठित परिवार के पंडित द्वारका प्रसाद शर्मा के पुत्र डॉ. बिहारी लाल शर्मा के साथ संपन्न हुआ । इनके पति सागर विश्वविद्यालय के भौतिक शास्त्र विभाग में अध्यापक रहे। विवाह उपरांत इन्होंने बी. एड., एम. एड. तथा काव्यतीर्थ की परीक्षाएं उत्तीर्ण कीं । सागर विश्वविद्यालय से 1966 में प्रो. रामजी उपाध्याय के निर्देशन में संस्कृत में पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। इनके शोध प्रबंध का विषय था 'पंडिता क्षमादेवी राव' डॉ. शर्मा का यह शोध ग्रंथ अत्यंत महत्वपूर्ण जान पड़ता है कई विद्वानों ने संस्कृत विभाग में आकर इस शोध प्रबंध का अवलोकन किया है।
दमोह तथा जैसीनगर में अपनी उत्कृष्ट सेवाएं देते हुए सागर की बी टी आई में व्याख्याता के पद पर कार्यरत रहीं। इसके बाद सागर के एमएलबी कन्या विद्यालय में लंबे समय तक प्राचार्य रहीं। इन्हें ज्योतिष और तंत्र विद्या का अच्छा ज्ञान था। समय-समय पर ज्योतिष सम्मेलनों में भाग लेती थीं। इन्होंने मिडिल स्कूल के स्तर की कुछ किताबें लिखीं जो पाठ्यक्रम में शामिल की गईं। इनकी हिंदी कालिंदी विद्यार्थियों में लोकप्रिय किताब रही। यह इनका उस समय संस्कृत के प्रति विशेष अवदान माना गया। ये सरल स्वभाव तथा अत्यंत आकर्षक व्यक्तित्व की धनी थीं। उस समय की उच्चतम शिक्षाविद होने के कारण काफी ख्याति प्राप्त प्राचार्य रहीं। शालेय स्तर के पाठ्यक्रम निर्धारण समिति की सक्रिय सदस्य रहीं।
ज्योतिष के क्षेत्र में इन्हें कई सम्मान प्राप्त हुए। प्राचार्य के पद से डिप्टी डायरेक्टर पद पर इनकी पदोन्नति हुई। पति सेवानिवृत हुए तो इन्होंने भी ऐच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली। सागर में भापेल रोड पर स्थित अपने बंगले में सुखद, शांत और संपन्न जीवन व्यतीत करने लगीं। 2003 में इनके पति का निधन हो गया। एकाकी जीवन से वे दुखी रहने लगीं। बाद में मधुमेह बीमारी से ग्रस्त हो गईं। 11.07.2008 को इनका निधन हो गया।