भारत के नव्यन्याय दर्शन के जानकारों में पंडित लक्ष्मी नारायण द्विवेदी जी की गणना प्रमुख रूप से की जाती है। उनका जन्म 13 जनवरी 1908 को सागर जिले के बटयावदा गांव में एक गरीब कान्यकुब्ज ब्राह्मण परिवार में पंडित अयोध्या प्रसाद द्विवेदी के यहां हुआ। सागर से प्राथमिक शिक्षा प्राप्त कर बनारस चले गए। सन 1932 में राजकीय महाविद्यालय से नव्य न्याय विषय लेकर संपूर्ण मध्यमा की परीक्षा उत्तीर्ण की। फिर 1937 में नव्य न्याय में शास्त्री की परीक्षा उत्तीर्ण की और 1949 में नव्य न्यायाचार्य की उपाधि प्राप्त की। इसके साथ ही नव्य व्याकरण विषय लेकर लाहौर की राष्ट्रीय परीक्षा उत्तीर्ण करने पर महामहोपाध्याय की उपाधि से विभूषित किए गए।
काशी के श्रेष्ठ गुरुजनों के बीच बैठकर अन्य शास्त्रों का अध्ययन नियुक्त करते रहे। 1940 में खुर्जा के राधाकृष्ण संस्कृत महाविद्यालय में अध्यापक नियुक्त हो गए। 1947 तक इसमें एम. ए. की कक्षाओं को पढाते रहे । बनारस में उनकी विद्वत्ता की धूम मच गई । फलस्वरूप रामानुज संस्कृत महाविद्यालय में अध्यापन कार्य करने लगे। सागर के पंडितों के आग्रह पर धर्मश्री संस्कृत पाठशाला और ढाना संस्कृत पाठशाला में अध्यापन कार्य करने लगे। शायद यह इनकी भूल थी अन्यथा बनारस विश्वविद्यालय से संस्कृत के प्रोफेसर के पद से सेवानिवृत होते। सागर में उनके ज्ञान का न तो सही मूल्यांकन हो सका और न ही अर्थ प्राप्ति हो सकी।
सागर विश्वविद्यालय के दर्शनशास्त्र विभाग में 'दर्शनशास्त्र बृहत कोष' के निर्माण में उन्होंने 3 वर्ष कार्य किया ।
फिर 3 वर्ष तक संस्कृत विभाग में शास्त्रचूड़ामणि योजना के अंतर्गत अध्यापकों और शोध छात्रों को दर्शनशास्त्र पढ़ाया। संस्कृत विभाग के प्रो. अच्युतानंद दाश दर्शन पढ़ने उनके घर जाया करते थे। द्विवेदी जी वाचिक परंपरा के पंडित थे। वे पढ़कर और सुना कर अध्ययन करते और कराते थे । कई ग्रंथ उन्हें कंठस्थ थे। किताब खोलकर पढाने की आवश्यकता ही नहीं होती थी। संभव है लेखन कार्य हेतु उतनी आर्थिक व्यवस्था नहीं जुटा पाए । जीवन के अंतिम समय तक बड़ी पायगा स्थित अपने जर्जर मकान में विद्यार्थियों को निशुल्क शिक्षा प्रदान करते रहे। दिनांक 10 जून 2008 को इन महान् न्यायाचार्य महोपाध्याय का निधन हो गया।