पंडित महादेव शास्त्री का जन्म सागर जिले के पिपरिया करकट गाँव में हुआ। इनकी माता श्रीमती इंदिरा देवी तथा पिता - श्री गणेश राम जी थे।
कक्षा आठ तक उन्होंने प्रचलित विषयों के साथ अंग्रेजी भी कुछ पढ़ी थी। साङ्ग वाजसनेय संहिता और शतपथ ब्राह्मण को उनके भाष्य सहित अध्ययन और कंठस्थ करने के बाद, उन्होंने अद्वैत वेदांत, धर्मशास्त्र, कात्यायन श्रौतसूत्र और पारस्कर गृह्यसूत्रों का भाष्य सहित अध्ययन किया। वे देव-याज्ञिक पद्धति से अग्निहोत्र, दर्शपूर्णमास, चतुर्मास्य आदि का स्वयं अनुष्ठान करते थे और शिष्यों को सिखाते थे। ऋषिकेश में उन्होंने आध्यात्मिक अध्ययन किया और अध्यापन भी किया। उन्हें पुराण और व्याकरण का गहन ज्ञान था। वे कर्मकांड के प्रायोगिक पक्ष के ज्ञाता थे। उन्होंने शतचंडी यज्ञ करवाया। श्रीमद्भागवत कथा में भी वे पारंगत थे।
चातुर्वेद महाविद्यालय और वेद भवन से भी उनका संपर्क रहा। शंकराचार्य श्री जयेंद्र सरस्वती से उनकी भेंट हुई और शंकराचार्य ने उन्हें सांग वेद विद्यालय में नियुक्त किया। कांची काम कोटि विद्यापीठ, दिल्ली में वे वेद पढ़ाते रहे। श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय दिल्ली में शास्त्र चूड़ामणि के रूप में अध्यापन कार्य किया। उनके शिष्य देश और विदेश में वेद अध्यापन का कार्य कर रहे हैं। उनके एक शिष्य डॉ. शैलेंद्र प्रसाद उनियाल मॉरीशस में अध्यापन कर चुके हैं। विश्व हिंदू परिषद के श्री अशोक सिंघल उन्हें बहुत मान देते थे। श्री मंडल मिश्र, कुलपति एलबीएस दिल्ली उन्हें बड़ा आदर करते थे। शास्त्री जी ने हजारों छात्र पढ़ाए। उनके शिष्य डॉ. बैकुंठ नाथ शर्मा ने वृंदावन में उनके नाम पर श्री महादेव शास्त्री वेद पाठशाला की स्थापना की। कश्मीर राजवंश के उत्तराधिकारी डॉ. कर्ण सिंह से उनके बड़े आत्मीय संबंध रहे। उनके एक शिष्य श्री चंद्रभानु शर्मा ने अयोध्या में राम मंदिर के ध्वजारोहण कार्यक्रम में पौरोहित्य किया।
राष्ट्रपति पुरस्कार (2005) और उत्तर प्रदेश, दिल्ली आदि सरकारों से सम्मानित वेदनिधि पंडित महादेव शास्त्री की चाह थी कि संस्कृत में आधुनिक रुचिर साहित्य का सृजन हो। उनकी कामना को ध्यान में रखते हुए संस्कृत भारती ने अपनी ग्रंथ माला उन तपोधन को समर्पित की।
वे योग के परम साधक थे । उनकी कुंडलिनी जागृत थी । वे आजीवन धर्मरक्षा के लिए जागृत और कटिबद्ध रहे । इसे लेकर न उन्होंने दुकानदारी की, न ढोल बजाए । ऐसे जागृत पुरुषों नें भारत में धर्म को जागृत रखा है । धन्य हैं ऐसे महापुरुष ।
उनके पुत्र श्रीदेव शर्मा ने तिरुपति से संस्कृत का अध्ययन किया है और वर्तमान में दिल्ली में निवास करते हैं। शास्त्री जी की पुत्री- दामाद दिल्ली में निवास कर रहे हैं। इन महापुरुष ने दिल्ली में अंतिम सांस ली। वर्ष 2008 में अक्षय नवमी तिथि को वे देवलोक को गमन कर गए।