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राजराजेश्वरी देवी

राजराजेश्वरी का जन्म 1993 में सागर के धर्मश्री महाविद्यालय के प्राचार्य पंडित वासुदेव दुबे के घर हुआ। पंडित दुबे ग्राम तोड़ा, तहसील जैसीनगर, जिला सागर के मूल निवासी हैं और कान्यकुब्ज ब्राह्मण परिवार से हैं। इनकी तीन संतान हुईं। राजराजेश्वरी सबसे छोटी हैं ।राजराजेश्वरी की माता श्रीमती लक्ष्मी दुबे आदर्श गृहिणी हैं। राजेश्वरी ने बी.कॉम. तथा एम.बी.ए. की शिक्षा सागर से ही प्राप्त की। वर्तमान में संस्कृत विषय में एम.ए. कर रही हैं जो उनके कार्य में सहयोगी सिद्ध होगा। वर्ष 2024 में इनका विवाह सुभाष नगर सागर निवासी चंद्रिका प्रसाद पाराशर जी के पुत्र श्री अनुराग के साथ संपन्न हुआ।

बचपन से ही एकदम शांत स्वभाव और भागवत के प्रति सहज आकर्षण इनके व्यवहार में स्पष्ट दिखाई दिया। 12 वर्ष की उम्र से इन्होंने मंच संभाला और भागवत पर प्रवचन देना शुरू कर दिया। प्रदेश और प्रदेश के बाहर तथा नेपाल 100 से अधिक भागवत कथाएं यह कर चुकी हैं। इतनी छोटी सी उम्र में भागवत प्रवचन से लोगों के मन में इनके प्रति आदर एवं आकर्षण बना और यह शीघ्र ही लोकप्रिय हो गई और लोग इन्हें देवी राजराजेश्वरी के नाम से संबोधित करने लगे ।

संस्कृत साधना के क्षेत्र में इन्होंने एक असाधारण कार्य किया। इन्होंने भागवत पुराण के 18000 श्लोकों को सस्वर पाठ कर ऑडियो वीडियो बनाया। इस कार्य को मूर्त रूप देने में इन्हें 2 वर्ष का समय लगा। इनका यह कार्य राष्ट्रीय स्तर की श्रेणी में माना गया। आचार्य राधावल्लभ त्रिपाठी ने इनके इस कार्य को 21 वीं सदी का सबसे बड़ा कार्य बताया। मलूक पीठाधीश्वर द्वाराचार्य राजेंद्र दास महाराज ने इनके कार्य की मुक्त कंठ से प्रशंसा की। आदर्श संगीत विद्यालय के पूर्व प्राचार्य श्री सुनील भट्ट से इन्होंने संगीत की शिक्षा प्राप्त की। कथा वाचन की परंपरा में पंडित रामकृष्ण शास्त्री अगरिया वाले, पंडित बलराम नगायच की परंपरा में बाल विदुषी राजराजेश्वरी देवी का नाम हमेशा याद किया जाएगा। देखा जाए तो घर के ही संस्कृतमय आध्यात्मिक वातावरण में राजेश्वरी देवी को भागवतमय कार्यों में रुचि जागृत हुई। प्रयागराज के प्रख्यात महंत गोपालदास महाराज से विधिवत शिक्षित दीक्षित होकर श्रीमद् भागवत कथा का प्रवचन प्रारंभ किया। कालांतर में राजराजेश्वरी जी के मन में यह बात आई कि जो भक्तजन कथा स्थल पर आकर भागवत नहीं सुन पाते हैं उनके कल्याण के लिए इस प्रकार ऑडियो वीडियो के माध्यम से कथा श्रवण कराई जा सके। कई भागवत प्रेमी अपने गर्भस्थ शिशु को इसी माध्यम से कथा श्रवण कराते हैं जिससे शिशु भविष्य में धार्मिक प्रवृत्ति का हो। ये भिन्न-भिन्न स्थानों से प्राप्त आमंत्रण पर भागवत कथा का रसपान कराती हैं। अस्तु वर्तमान में श्रीमती राजराजेश्वरी सागर में अपने परिवार के साथ धार्मिक और सुखद जीवन व्यतीत कर रही हैं।

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