बुंदेलखंड की सांस्कृतिक धरोहर का डिजिटल संग्रह
बुंदेलखंड विश्वकोश

सन्तुलित भोजन को प्रभावित करने वाले कारक

personडॉ. प्रेमलता नीलम sourceस्रोत: बुंदेलखंड के व्यंजन की वैज्ञानिकता

हम जानते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति को भोजन की आवश्यकता होती है, किन्तु एक व्यक्ति के लिए जो सन्तुलित आहार है, वह दूसरे के लिए भी सन्तुलित हो, यह आवश्यक नहीं । यह भिन्नता व्यक्ति की आयु, लिंग, शरीर का आकार, कार्य, जलवायु के कारण होती है । अतः उनके सन्तुलित भोजन भिन्न-भिन्न होते हैं । भोजन की भिन्नता के प्रमुख कारण निम्न हैं-
1. आयु (Age) - आयु के अनुसार व्यक्ति के भोजन में भिन्नता आना एक स्वाभाविक बात है । एक बच्चे का भोजन एक व्यस्क पुरूष की अपेक्षा अधिक होता है क्योंकि आहार से वे केवल शक्ति व गर्मी ही प्राप्त नहीं करते वरन् यह उनके शरीर की वृद्धि के लिए भी आवश्यक होता है। बच्चों को वसा व कार्बोज अधिक मात्रा में चाहिए । इसी प्रकार वृद्धावस्था में भोजन की मात्रा कम होने का कारण है कि वृद्धों की पाचन शक्ति कमज़ोर पड़ जाती है और उन्हें कम ऊर्जा तथा कम पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है। वे शारीरिक कार्य भी कम करते हैं ।

2. लिंग (Sex) - सामान्य स्त्री को पुरुष की अपेक्षा कम आहार की
आवश्यकता होती है क्योंकि स्त्रियों का भार कम होता है और उन्हें कार्य भी कम करना पड़ता है । पुरूषों की क्रियाशीलता के कारण उन्हें निर्माणक तत्वों जैसे - प्रोटीन, वसा, खनिज लवण आदि की अधिक आवश्यकता होती है, परन्तु गर्भावस्था व स्तनपान की अवस्था में स्त्रियों को अपेक्षाकृत अधिक भोज्य तत्वों की आवश्यकता होती है ।

3. शारीरिक श्रम (Physical Work) - जो व्यक्ति जितना अधिक शारीरिक श्रम करता है । उसे उतनी अधिक भोजन की आवश्कयता होती है। परिश्रम करने में अधिक ऊर्जा व्यय होती है। उस कमी को पूरा करने के लिए भोजन में प्रोटीन, कार्बोज की मात्रा अधिक होनी चाहिए । अतः एक साधारण व्यक्ति की अपेक्षा शारीरिक श्रम करने वाले व्यक्ति को अधिक सन्तुलित भोजन चाहिए । इसके विपरीत आराम से बैठने वालों, हल्का शारीरिक श्रम करने वालों तथा मानसिक कार्य करने वालों को कम भोजन की आवश्यकता होती है । इनके भोजन में कम कार्बोज तथा कम प्रोटीन होनी चाहिए ।

4. जलवायु तथा मौसम (Climate and Weather) - भोजन की मात्रा पर
जलवायु का भी प्रभाव पड़ता है। ठण्डे देश के निवासियों को गरम देश के निवासियों की अपेक्षा अधिक भोजन की आवश्यकता होती है, क्योंकि ठण्डे देशों में गरम की तुलना में ताप का उपयोग अधिक होता है । इसी प्रकार गर्मी के मौसम की अपेक्षा ठण्डे मौसम में भूख ज्यादा लगती है तथा शरीर का भार बढ़ता है उसी प्रकार गर्मी में ठण्डा व जाड़े में गर्म भोजन अच्छा लगता है ।

5. सामाजिक कारण (Social Factors) कुछ सामाजिक कारण ऐसे होते हैं जो
व्यक्ति के सन्तुलित भोजन को प्रभावित करते हैं, क्योंकि मनुष्य जिस समाज में रहता है उनके नियमों का पालन, करना भी जरूरी है। सबसे पहले धर्म (Religion) को ही लें, जैसे-हिन्दु धर्म में व्यक्ति मांस, मछली, अण्डा आदि का सेवन निषेध मानते हैं । अतः इनसे मिलने वाले पोषक तत्वों से वे वंचित रह जाते हैं । इसी प्रकार कुछ जैन धर्म के लोग कई खाद्य पदार्थों को त्याग देते हैं तथा जमीन के अन्दर पैदा हुई चीजों को ग्रहण नहीं करते हैं । सामाजिक अवसरों पर अतिथि को भोजन पर बुलाने की प्रथा आज भी है । अतिथि को घर में तब ही बुलाया जाता है जब घर में पर्याप्त आहार उपलब्ध होता है ।

6. आर्थिक स्थिति (Financial Condition) - परिवार की आर्थिक स्थिति का आहार आयोजन से अत्याधिक घनिष्ठ सम्बन्ध है । जो गृहिणी अपने आय के साधनों को ध्यान में रखे बिना आहार आयोजन करती है उसे बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है । इसलिए गृहिणी को परिवार की आर्थिक स्थिति के अनुपम बजट बनाना चाहिए । उस बजट में भोजन हेतु निर्धारित धनराशि के अनुरूप ही आहार आयोजन करना चाहिए ताकि परिवार के सभी सदस्यों को आवश्यकतानुसार पोषणयुक्त आहार मिल सके । यदि परिवार की आय कम हो तो सस्ते मूल्य के पोषण युक्त पदार्थों का समायोजन करना चाहिए। जैसे - मेवे के स्थान पर मूँगफली, मँहगे विटामिन के स्थान पर मूली, गाजर, ककड़ी, पालक आदि ।

7. धर्म व संस्कृति (Religion and culture) - भारत विभिन्न जातियों, धर्मों एवं
संस्कृतियों का देश है । यहाँ हर प्रदेश के निवासियों की सांस्कृतिक परम्पराओं में भिन्नता होने के कारण बंगालियों, पंजाबियों, पहाड़ियों, दक्षिण भारतीयों व मध्य भारतीयों में भोजन सम्बंधी भिन्नता मौजूद है। जैसे-बंगाली चावल व मछली खाना पसन्द करते हैं, पंजाबी तंदूरी रोटी, उड़द की दाल व घी में पकी सब्जियाँ पसन्द करते हैं, दक्षिण भारतीय इडली, डोसा व साँभर पसन्द करते हैं, मध्य भारतीय रोटी, पूड़ी-कचौड़ी, मिठाईयाँ व वसायुक्त भोजन अधिक स्वाद से खाते हैं। स्वतंत्रता के पश्चात् आवागमन की सुविधा का विकास तथा व्यावसायिक व शैक्षणिक कारणों से लोगों की प्रवासी प्रवृत्ति में विकास होने तथा देश-विदेश की संस्कृतियों में मिश्रण होने के कारण खान-पान में भी परिवर्तन हुआ है। जैसे -पंजाब व उत्तर भारत के लोग भी डोसा, इडली, साँभर व चावल से बने पदार्थ स्वाद से खाते हैं । इसी प्रकार बंगाली व दक्षिण भारतीय तन्दूरी रोटी, सरसों का साग, मिठाईयाँ व पूड़ी-कचौड़ी स्वाद ले-लेकर खाते हैं इस प्रकार भारतीय भोजन पश्चात्य देशों में लोकप्रिय होता जा रहा है। संस्कृतियों के सम्मिश्रण एवं घुलने-मिलने के परिणाम स्वरूप भोजन शैली व भोज्य पदार्थों के प्रयोग में बहुत परिवर्तन आया है ।

8. भोजन सम्बंधी आदतें (Food Habites) - आहार आयोजन पर व्यक्तियों की भोजन संबंधी आदतों का पर्याप्त प्रभाव पड़ता है। प्रारंभ में व्यक्ति को भोजन संबंधी जैसी आदतें पड़ जाती हैं वे आजीवन बनी रहती हैं । उन्हें परिवर्तित करना कठिन होता है । जैसे -कुछ लोग अधिक मिर्च-मसाले वाली चाट, पकौड़ी आदि का सेवन करना अधिक पसन्द करते हैं । इससे शरीर में ऊर्जा की अधिकता व अन्य तत्वों की कमी हो जाती है । कुछ लोगों को भोजन करने के पश्चात् मिष्ठान या गुड़ खाने की आदत होती है, यदि मिष्ठान न मिले तो भोजन से संतुष्टि नहीं होती । उसी प्रकार बच्चों को आइसक्रीम, चॉकलेट व टॉफियाँ खाने की आदतें भी उनके संतुलित भोजन को प्रभावित करती हैं । कुछ लोगों को सुबह उठने के साथ कुछ खाने की या चाय पीने की आदत होती है तथा कुछ लोगों को रात में सोने के पहले दूध या चाय, कॉफी पीने की आदत होती है । अतः परिवार के सदस्यों की आदतों का आहार आयोजन करते समय गृहिणी को ध्यान रखना चाहिए। जिससे कि जिन सदस्यों को भोजन संबंधी गलत आदत पड़ गयी है तो उनके स्थान पर अच्छी आदतें विकसित करने का प्रयास किया जा सके

9. अन्धविश्वास एवं मान्याएँ - किसी देश एवं संस्कृति में प्रचलित मान्याएँ, अन्धविश्वास व परम्पराएँ तो वैज्ञानिक आधर पर आधारित नहीं होती है। कुछ लोग तो बिना सोचे समझे अन्धविश्वासों का पालन करते हैं, जैसे- भारत में लोगों का विश्वास है कि तरबूज खाकर दूध पीने से शरीर पर सफेद दाम पड़ जाते हैं । इसी प्राकर मछली खाकर दूध नहीं पीना चाहिए । दूध पीकर या मिठाई खाकर अर्थात् मीठे मुहँ से बाहर नहीं जाना चाहिए या यात्रा नहीं करनी चाहिए, ऐसा करने से भूत-प्रेत लगने का भय रहता है । इस प्रकार भारत में अनेक अन्धविश्वास प्रचलित हैं । इनका भोजन के पोषण से सम्बन्ध है या नहीं, यह जाने बिना लोग उनका पालन करते हैं । इस प्रकार हमारी भोजन की आदतों में मान्यताएँ व अंधविश्वास महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं ।
10. भोज्य पदार्थों की उपलब्धता - आहार आयोजन करते समय गृहिणी को यह देखना आवश्यक है कि आहार हेतु किस मौसम में कौन सी वस्तुएँ सरलता से उपलब्ध हो रही हैं क्योंकि बेमौसमी भोज्य पदार्थों को यदि आहार आयोजन में समावेश किया जाए तो उनको प्राप्त करना कठिन होगा तथा धन भी अधिक खर्च होगा । इसलिए बेमौसमी भोज्य पदार्थों के स्थान पर मौसमी पदार्थों से ही पोषक तत्व प्राप्त करना चाहिए । ऐसा करने से सस्ते दामां में पोषणयुक्त भोज्य सामग्री मिल सकती है, जैसे-बरसात में प्रोटीन हेतु हरे मटर के स्थान पर रमास या ग्वाँरफली की सब्जी का आयोजन उपयुक्त रहेगा ।

क्या इस लेख में कोई त्रुटि है?