डॉ. वासुदेव मोरेश्वरराव आठले उर्फ मामा आठले का जन्म 6 अक्टूबर 1922 को सागर में हुआ था। इनकी माता श्रीमती सरस्वती और पिता श्री मोरेश्वर राव आठले का पुश्तैनी मकान सागर के बड़े बाजार में था। अपने अंतिम समय तक मामा का निवास यहीं पर रहा। मामा ने प्राथमिक से लेकर एम.ए. (हिंदी एवं संस्कृत) तथा पीएचडी तक की संपूर्ण शिक्षा सागर में ही प्राप्त की। मामा पाँच बहनों में सबसे छोटे और अकेले भाई थे और इस नाते परिवार का सारा उत्तरदायित्व अकेले मामा ने ही निभाया ।
मामा की धर्मपत्नी श्रीमती सुशीला आठले नागपुर की थीं और विवाह के बाद वे भी सागर के महिला विद्यालय में हाई स्कूल शिक्षिका रहीं। इनकी कोई संतान नहीं थी, मगर मामा की बहनों के बच्चे उनके यहाँ रहकर पढ़े-बढ़े। मामा की नातिन दीपा तीन-चार महीने की आयु से ही उनके पास रही। उसकी शिक्षा और बाद में उसका विवाह भी मामा ने ही करवाया। इस प्रकार वह मामा की मानस पुत्री के रूप में मामा-मामी के पास रही।
मामा मूलतः राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक थे। वे राजनीति में अप्रत्यक्ष रूप से सक्रिय रहे। श्री अटल बिहारी वाजपेयी आदि नेताओं से उनके व्यक्तिगत संबंध रहे।
कई मामलों में मामा इन राजनेताओं को अपने मंतव्य से अवगत कराते थे। मामा 1964 तक जबलपुर, बम्बई, तथा सागर की विभिन्न शालाओं में अध्यापनरत रहे। फिर 1964 में सर हरि सिंह गौर महा विद्यालय सागर की स्थापना की और उसके संस्थापक प्राचार्य के रूप में 1983 तक कार्यरत रहे। इस दौरान वे सामाजिक क्षेत्र में भी सक्रिय रहे। सागर विश्वविद्यालय में मामा एग्जीक्यूटिव काउंसलर रहे। मामा के कांग्रेसी नेताओं से भी अच्छे संबंध रहे। इन्हें संस्कृत, हिंदी, मराठी एवं अंग्रेजी, इन चार भाषाओं का ज्ञान था। संस्कृत को योगदान के मामले में इन की लिखी संस्कृत व्याकरण की पुस्तक संस्कृत कलिकावली तीन भागों में प्रकाशित हुई जो सागर में माध्यमिक कक्षाओं में पढ़ाई जाती थी।
वर्ष 1970 में उन्होंने शिक्षकों के संगठन मध्यप्रदेश शिक्षक संघ की स्थापना की। वे हमेशा धोती कुर्ता पहनते थे। सेवानिवृत्त होने पर सागर की कई शैक्षणिक सांस्कृतिक संस्थाओं द्वारा इनका सम्मान किया गया। 14 जुलाई सन् 1990 को सागर में इन्हें तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री सुंदरलाल पटवा द्वारा प्रतिभा सम्मान दिया गया। वर्ष 1992 में जबलपुर में श्री बाबूलाल परांजपे के हाथों शिक्षा प्रतिभा सम्मान दिया गया।
22 अगस्त 2007 को मामा के दाह संस्कार में अग्नि उनकी मानस पुत्री दीपा ने दी। उनके लेखन में अनंत पथ, राष्ट्रीय एकात्मता के आधार, राष्ट्रीयता एकता और समरसता, राष्ट्रीयता यह है, हिंदुत्व पुस्तकें प्रमुख हैं।