बुन्देलखण्ड का प्रसिद्ध एवं शाही व्यंजन की श्रेणी में अपने है इंदरसे महीन आकार की कुदई जो अन्न भोज्य पदार्थ के अंतर्गत आता है। बुन्देलखण्ड में कृषक, श्रमिक कुदई को चॉवल नुमा पकाकर आज भी खाते हैं मकर संक्रांति पर कुदई के लड्डू भी बनाये जाते है । इंदरसे कुदई से ही बनते हैं इसमें मेहनत करना पड़ती और सावधानी रखना जरूरी है। यदि लापरवाही हुई तब व्यंजन का आकार एवं स्वाद बिगड़ जाता है और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है। यूँ पौष्टिक होता है ।
सामग्री - एक किलो कुदई का आटा, शक्कर आधा किलो, दूध, घी आदि ।
विधि - सर्वप्रथम कुदई का आटा बनाने की विधि जानना आवश्यक है । कुदई को ओखली में डालें फिर ऊपर से मूंसर से कूटना आरंभ करें । कूटने से कुदई के ऊपर का छिलका निकला आता है तब उसे सूपा से फटक लेवें और धूप में सुखा लेवें सूखने के बाद पिसाकर या स्वयं जाने से पीसकर आटा तैयार करें आटा को छलनी से छान लेवें । शक्कर को पीसकर कुदई के आटे में मिलवों तथा उसमें एक पाव करीब घी मोन लगा देवें इसे 4-6 घन्टे ढक कर रखें तत्पश्चात् दूध का छींटा लगाकर गूंथ लें इसमें पानी बिल्कुल न मिलायें । पेड़े के आकार की टिकिया बनाकर कढ़ाही में घी डालकर धीमी आँच में सेंके। गुलाबी होने पर निकाल लेवें । लीजिए इंदरसे तैयार गाँवों में आज भी मान्यता है कि सेंकते समय इंदरसे शब्द नहीं कहते हैं। इसे 15-20 दिन खाने में लाया जा सकता है। तोमरकाल, बुन्देलकाल से प्रचलित है वर्तमान में शहर में कम गाँवों में इसका प्रचलन है ।
पौष्टिकता - पौष्टिकता की दृष्टि से वसा, कार्बोज एवं दूध में सम्पूर्ण आहार तथा कुदई में प्रोटीन कार्बोज की मात्रा होती है ।