बुंदेलखंड की सांस्कृतिक धरोहर का डिजिटल संग्रह
बुंदेलखंड विश्वकोश

बुंदेली व्यंजन की अपरिहार्य कृति

personश्यामसुंदर दुबे sourceस्रोत: बुंदेलखंड के व्यंजन की वैज्ञानिकता

पृथ्वी का एक नाम 'रसा' है । पृथ्वी में ही समस्त रस-संसार समाहित है मिट्टी रसों की रासायनिक प्रयोगशाला की आधारभूत भूमिका प्रस्तुत करती है मिट्टी का वैभिन्नय ही रस-प्रकारों का आविष्कारक है। विभिन्न अंचलों को मिट्टी में विभिन्न प्रकार की उत्पादक शक्तियां निहित रहती हैं। यदि महाराष्ट्र के संतरे को बुंदेलखण्ड में रोपा जायेगा तो यहां उत्पन्न होने वाले संतरे में वह स्वाद वह रस उपलब्ध नहीं होगा जो महाराष्ट्र की भूमि ने सिरजा था । अंचल विशेष की पहचान इसीलिये उसकी उत्पादित जिन्सों में भी समाई रहती है। बुंदेलखण्ड अंचल जिन सांस्कृतिक उपादानों से अपनी अलग पहचान बनाये हुये है - उनमें उसकी जिन्स उत्पादन क्षमता का भी योगदान है। बुंदेलखण्ड की ज्वार, यहाँ का बाजरा, यहाँ का समा का कौंदव, यहाँ की कुटकी, यहाँ के महुवा-बेर-अचार, यहाँ की तिलि, अलसी, अरहर, मूंग और यहाँ के गेहूँ-चना ये सब मिट्टी की उर्वर, क्षमता के सुपरिणामों के द्योतक रहे हैं। इन फसलों की प्रचुरता ने यहां के भोज्य पदार्थों का निर्धारण किया है और इन भोज्य पदार्थों की सरसता का सीधा संबंध बुंदेली जमीन में निहित स्वाद - संवेदनों की उत्तेजनाओं से ही है । इस रूप में आंचलिक व्यंजनों की पाव विधियाँ केवल एक सामान्य प्रक्रिया को ही नहीं दर्शाती, बल्कि वे अंचल विशेष की भूमि जलवायु, रहन-सहन, शारीरिक स्वास्थ्य की निर्देशक भी हैं। मैं ने यह जो भूमिका बांधी है - वह 'बुंदेलखंड के व्यंजनों की वैज्ञानिकता' कृति की तासीर को समझने के लिये ही बांधी है । यह कृति सुप्रसिद्ध कवयित्री डॉ. प्रेमलता नीलम द्वारा विरचित है।
डॉ. प्रेमलता नीलम की सार सम्हाल में बुंदेली अंचल का ही योगदान है - उनके व्यक्तित्व के प्रत्येक परमाणु का निर्माण बुंदेली माटी के कण-कण से ही हुआ है । अतः वे जो बुंदेलखंड के विषय में कहती लिखती हैं वह परात्म नहीं है वह उनका अपना निजी स्वत्व है। बुंदेलखंड उनके व्यक्तित्व से ध्वनित होता है - इसलिये जब वे यहां के व्यंजनों की चर्चा करती हैं, तो यहां की संपूर्ण प्रकृति की चर्चा करती हैं । बुंदेली भूमि के इतिहास, बुंदेली भूमि के संघर्ष, बुंदेली भूमि की सहजता और बुंदेली भूमि की रस सिकतता को वे बिसारती नहीं हैं। भूमि के गुण रस बनाते हैं - रस स्वाद को सिरजता है और स्वाद स्वभाव निर्मित करना है । स्वाभाव का सूत्रधार मन बनाता है, इसलिये बुंदेली कहावत स्पष्ट करती है कि जैसा खाओ अन्न-वैसा बने

मन्न - अन्न और मन का नाता अटूट है इसी आधर पर आहार का निरूपण अनेक दृष्टियों से संभव हुआ है। अन्न का संबंध जितना मिट्टी से है, उतना संबंध ऋतु-प्रकृति से भी है। इन तीनो तत्वों को शरीर की कद-काठी और प्रकृति का गठन होता है, इसलिये मिट्टी, पानी, वायु आदि के साथ परिवर्तित ऋतुओं की क्रियाशीलता का सीधा समायोजन शरीर के साथ होता है। यही वजह है कि बाह्य और आंतरिक शरीरिक स्थितियों को इन सबके साथ जो रासायनिक क्रिया का अवसर प्राप्त होता है वह भोजन के माध्यम से ही प्राप्त होता है। भोजन ही वह माध्यम है जो शारीरिक क्रियाओं और मानसिक क्रियाओं के साथ बाह्य वातावरण की अंतः क्रियायें निर्धारित करता है। इसलिये ऋतु परक भोजन चर्या के निषेधक और विधेयक संदर्भों को अनेक तरह से बुंदेली में अभिव्यक्त किया गया है । मासिक दृष्टि से निषेधपरक खाद्य पदार्थों की सूची अनेक प्रयोगों के अनुमान पर आधारित है । 'चेते गुर बैसाखे तेल, जेठे लटा अषाढ़े बेल सावन साग भांदों मही, क्यार करेला कातक दही । अघनौ जीरौ पूसे धना, मावै मिसरी फागुन चमा । इतनी चीजें खेहों सभी, मरहों ने तो पर हो सही ।" इसी तरह विधेयक भोज्य पदार्थों को भी सूचीबद्ध किया गया है, “चैत मीठी चीमरी, बैसाख मीठो मठाख जेठ मीठी डूबरी, आसाढ़ मीठे लटा । सावन मीठी खीर " जैसे कथनों में आचंलिक अनुभवों का सार संग्रहीत है ।

प्राकृतिक परिवेश, खान-पान पर गहरा असर डालता है। बुंदेलखंड अपनी डॉगों-पहाड़ों और घास के मैदानों से पहचाना जाता है। यहां के जंगलों में महुआ, अचार, आम, बेर की बहुतायत है । घास की उपलब्धता, पशु-पालन के उपयुक्त अवसर प्रदान करती रही है इसलिये दूध, दही, घी का टोटा यहाँ नहीं रहा है। इन आधारों पर लेखिका ने अनाज से निर्मित व्यंजन, फल-फूलों से निर्मित व्यंजन तथा गोरस से निर्मित व्यंजनों की चर्चा प्रस्तुत कृति में की है। अनाज की प्रचुरता ही व्यंजनों की विविधता को जन्म देती है। बुन्देलखंड में गेहूँ और चना जैसे अनाजों का आधिक्य है, इसलिये इनसे निर्मित व्यंजनों की लंबी सूची है, रोटी, मांडे, फरा सुआरी, लपसी, चीला, पूरन पूड़ी, सिमैंयां, गुजिया, खुरमा, गकरियाँ, पंजीरी, हथपऊ, दरिया, पपड़िया, चूरमा, सलौनी आदि गेहूं से बनाये जाते हैं । चना से बनाये जाने वाले भोज्य पदार्थ भी कम नहीं हैं, बिर्रा की रोटी, बेसन के लड्डू, कढ़ी बरी बतिया, पपड़िया, भजिया, चीला, दाल, औरिया, लपटा, अमघोरा, मीढ़ा, बेसन बर्फी, बेसन लड्डू, बफौरी, सेब आदि चना निर्मित भोज्य पदार्थ हैं। चूंकि बुंदेलखण्ड में इन अनाजों का प्राचुर्य है - इसलिये इन अनाजों के आटा, दानों आदि के साथ यहां के चतुर रसोईयों को प्रयोग करने के खूब अवसर प्राप्त हुये, इसलिये इनसे निर्मित भोज्य पदार्थों की संख्या भी असीमित है । लेखिका ने भोज्य पदार्थों की पाक विधि और उसकी पौष्टिकता का उल्लेख करके इस कृति को अधिक उपयोगी बना दिया है। पाक-विधि में प्रयुक्त संसाधन भी देशी रहते हैं -इसलिये पाक विधि भी अधिक जटिल नहीं है। पाक विधियों के आधार पर भी आंचलिकता की पहचान स्पष्ट होती है । गकड़ियाँ बनाते की बरौसी बुंदेली पाक संसाधन का ही नमूना है। मांडे बनाने के लिये उपयोग में लाया जाने वाला कैला अन्य अंचलों में अनुपलब्ध है । लेखिका ने विधियों के माध्यम से भी बुंदेली भोज्य-व्यापार का अचूक वर्णन किया है' लेखिका ने विधियों के माध्यम से भी बुंदेली भोज्य-व्यापार का अचूक वर्णन किया है

फल-फूलों से निर्मित भोज्य पदार्थ के रूप में 'लटा' की चर्चा विशेष मायने इसलिये रखती है कि इससे बुंदेलखंड की पहचान बनी है। लटा महुआ के से बनाया भोज्य पदार्थ है । बुंदेलखंड महुआ से भरपूर है । इसे ईसुरी ने इसे मानुष पालनहार बताया है। बुंदेलखंड जो गौंडवाना को भी अपनी गोद में बैठाये हुये है कि अस्तित्व संरचना में महुआ की भूमिका अपरंपार है । 'महुआ, मेवा, बेर, कलेवा, गुलगुच की मिठाई । इतनी चीजें चाहो तो गुड़ाने करो सगाई ।' महुआ ही यहां मेवा है। बुंदेली व्यंजनों में से झांकती यहाँ की गरबीली गरीबी को लेखिका ने अनेक स्थलों पर रेखांकित किया है । भोज्य पदार्थ के साथ मानवी प्रकृति जैसे हेलमेल करती है - 'गकरियाँ' के संदर्भ में लेखिका ने सामाजिक संदर्भों की अन्वेसिका दृष्टि का निष्कर्ष ध्यान देने योग्य है । इन्हें एकबार पूर्णतः खाने के बाद शीघ्रता से पुनः भूख नहीं लगती है, इसलिये विशेष किसान वर्ग, मजदूर वर्ग जो शारीरिक श्रम करते हैं ये उन्हें ज्यादा समय तक कार्य करने की ऊर्जा देती है । 'गकरियाँ के साथ ही गोबर के कंडों की चर्चा बुंदेली परिवेश की चर्चा ही है। भोजन की सामाजिक उपयोगिता उसकी सहज सुलभता से भी जुड़ी है। बुंदेली जन समान्य में वे भोज्य पदार्थ अधिक लोकप्रिय हैं, जिनको पकाने के लिये अधिक संसाधनों की जरूरत न पड़े जो अधिक समय भी न लें । सत्तू भी एक ऐसा ही भोज्य पदार्थ है, जो अपनी अंतिम तैयारी में अधिक समय नहीं लेता है जिसे अधिक बर्तन - भांड़ों की जरूरत नहीं रहती है, इसलिये सतुआ के विषय में कहावत प्रचलित है - "सत्तू मन भत्तू कब घोरे कब खाये । धान बिचारी कूटी पीसी खाई ।" सतुआ सामान्य जन का साथी है - न केवल सतुआ बल्कि महेरी, डुबरी, जैसे भोज्य पदार्थ सामान्य जन के भोजन में शुमार हैं । बुंदेलखंड का सामान्य जन शताब्दियों से शोषित और उत्पीड़ित रहा है उसकी माली हालत भी जर्जर रही है, इसलिये उसके भोजन में मसालों एवं मेवों का उपयोग कम हुआ है। बुंदेली जीवन में मट्ठा का उपयोग अनेक व्यंजनों के साथ किया गया है। के साथ रोटी, पूड़ी, समा के चावलों को खाने का प्रचलन है । मठ्ठा गोरस में सर्वाधिक सुलभ पेय पदार्थ है । कलेवा या नाश्ते के लिये भी बुंदेली जन ने अपने तरह के भोज्य बनाये हैं। ज्वार के भुट्टों को वाष्पित करके, ऊष्पित करके ज्वार-दानों को गुड़ में मिलाकर घुंघटी बनायी जाती है। गेहूं की वालों को भूंजकर तथा चना-बूटों को भूंजकर होरा तैयार किया जाता है। इन सबका अपना समय है - अपना स्वाद है । सामान्य जन का यह भोजन पौष्टिकता में किसी भी प्रकार न्यून नहीं है - ये सहज सुपाच्य भी हैं, इसलिये इनकी उपयोगिता असंदिग्ध है।

बुंदेलखंड अपनी प्रकृति-बीहड़ता के कारण लंबे अरसे तक एकांतिकता में ही निर्वाह करने वाला रहा है - इसलिये उसके भोजन व्यापार पर आसपास के लोकांचलों का प्रभाव न्यून ही पड़ा है । यहां के उच्चवर्गीय भोजन में यह प्रभावकवचित ही परिलक्षित होता है, अन्यथा शाही भोजन की यहां की प्रकृति का ही परिचायक है । घी, दूध और दही के साथ मक्खन, मिश्री, गुड़-शक्कर के विभिन्न मिश्रणों एवं पागों के परिणाम स्वरूप मिष्ठ व्यंजनों की यहां परंपरा रही है - खीर और तस्मै जैसे व्यंजन इसी श्रेणी में आते हैं। खीर के साथ बुंदेली के पाक कला विशारदों ने अनेक प्रयोग किऐ हैं। गुड़ की खीर को गुड़ला कहा गया है, इसी तरह जगत्मयिक कुम्हड़े की खीर कुमड़ खीर कहलाती हैं। मिष्ठ व्यंजनों के तहत इंदरसे, गड़िया घुक्ला, हलुवा, आदि का उपयोग भोजन सामाती में किया जाता है। मीठी पुड़ी, मालपुवा, गुजिया, खुरमा, खुरमी, जैसे भोज्य पदार्थ भी इसी श्रेणी में परिगणित होते हैं। इनमें से अनेक भोज्य पदार्थ अपने नजदीकी अंचलों की आवाजाती के परिणाम से नये विन्यास को स्वीकार करते गये । सेवईंया की खीर का संबंध मुगलकालीन सभ्यता के आगमन के परिणाम के रूप में स्वीकार किया जा सकता है। विवाह-बारातों के अवसरों पर जो विशेष भोजन निर्मित किये गये, वे भी विशेष की श्रेणी में ही गिने जायेंगे । बारात के स्वागत के लिये मिर्चवानी जैसे पेय पदार्थ को तैयार किया जाता है, फिर बड़े गोल आयतन वाली पुड़ी को पौंछक के रूप में परोसा जाता है-यह एक तरह का ब्रेकफास्ट ही है। विवाह के अवसर दो तरह की पंगतों का विधान रहा है। प्रारंभिक पंगत पक्की पंगत कही जाती रही है -पक्की पंगत में पूड़ी, कचौड़ी, मिठाईयाँ, विभिन्न सब्जियां आदि का प्रयोग होता है । इसमें सामाजिक आधार पर सार्वजनिकता का समावेश रहता है - इस पंगत में सभी सम्मिलित होते हैं-दूसरे तरह की पंगत कच्ची पंगत कहलाती है-इस पंगत में स्वजातीय जनों के साथ ग्रामीण क्षेत्र के कामगारों को सम्मिलित किया जाता है। यह विशेष पंगत रोटी, दाल, कढ़ी, दरया, बरा, घी-शक्कर, बिजौरा, पापड़ आदि भोज्य पदार्थों से युक्त होती है । इसे समूदी कहा गया है । लेखिका ने भी संमूदी शब्द का प्रयोग अपने इस ग्रंथ में किया है। समूदी बुंदेली आंचल की खास भोज्य व्यवस्था है । चावल, कढ़ी, बरा या दरया के मिश्रण में घी, शक्कर, पापड़ बिजौरा को मिलाकर जो भोजन -समिष्ठि बनाती है - उसे कलौंजी कहा जाता है। यह समूदी का ही केन्द्रीय पक्ष है। छाछ या मठ्ठा का रायता बनता है । बुंदेली में इसे सभाटा कहा गया है। सभाटा अपनी स्वाद क्षमता के शरीर की नस-नस को उत्तेजित करने की क्षमता रखता है । उत्तेजना के बाद समूचे शरीर में सभाटा खिंच जाता है । इसीलिये इसे सभाटा नाम दिया गया । पेय पदार्थों में यह स्वास्थ्यवर्द्धक पेय है। अन्य पेयों में पना, दही, दूध आदि का उपयोग किया जाता है । विवाह के बाद लड़की की विदा के साथ टिपारा रखा जाता है। टिपारा में अनेक मिष्ठान्न और पकवान रखे जाते हैं - वर के घर पहुँच कर यह टिपारा और चुलिया बायने में तब्दील हो जाता है। पुरा-पड़ौस में इन पकवानों-मिठाईयों को बांटा जाता है । यह बांटना रिश्तेदारी को घर-घर पहुंचाना जैसे है इसी तरह मैहर की गुलरियां, वंश तथा जरियाकाट संगियों ने मध्य बांटी जाती हैं । जरिया काट वे कहलाते हैं जो एक साथ प्रव्रजन करते हुये नयी बस्ती बसाने के उद्यम में एकजुट थे । भोजन के ये अंग-अंश सामाजिकता के समरसता से भरे रेशों को पुष्ठ करते हैं ।
भोज्य सामग्री का संबंध तीज-त्यौहारों और व्रत-उपवासों से भी है, मकर संक्रांति पर बुंदेलखंड में बतिया-खुरमा, गेहूँ, तिल, ज्वार, बेसन, चावल के लड्डू बनाने का प्रचलन है - इन्हें इस तरह से मजबूत बनाया जाता है कि महिनों कूट-पीसकर ये खाये जा सकते हैं । मकर संक्रांति का संबंध ठंड के उत्कर्ष से है - इसलिये इस समय पाचन क्षमता भी अच्छी रहती है । अतः गरिष्ठ पदार्थ खाने में नुकसान नहीं रहता है। नयी ब्याही बहिन की ससुराल से इसी अवसर पर भाईयों के लिये गड़ियाघुल्ला आते हैं । शक्कर से बनी विभिन्न आकृतियों वाले गड़ियाघुल्ला बुंदेलखंड की मिठाई ही माने जा सकते हैं। रक्षाबंधन के अवसर पर गुजिया, खुरमी, खीर, पुड़ी जैसे भोज्य पदार्थों को महत्व दिया जाता है । आषाढ़-सावन में गांव के देव स्थलों पर जाकर गकरियाँ खाने का रिवाज़ है। दीवाली-दशहरे पर सामान्य जनों में ही सुस्वादु और शाही भोजन करने की पंरपरा है । उपवास-काल के फलाहारों में महावरी, खनुआ जैसे कंदों को खाने का प्रचलन है । देशज प्रकृति से भोज्य वस्तुओं का संतुलन ही इनका आधार है ।

लेखिका ने यथावसर बुंदेली चटनियों की भी चर्चा की है । इन चटनियों में इमली की चटनी, आँवला की चटनी, कैथा की चटनी, टमाटर और आम की चटनी, छुआरा और पिंड खजूर की चटनी का उल्लेख है। कैथा की चटनी बुंदेलखंड सर्वहारा वर्ग की चटनी है । इन सभी चटनियों का स्वाद भिन्न-भिन्न है किंतु ये भोजन को अधिक रूचिकर बना देती हैं । चटनियों के साथ अचार और मुरब्बा की भी अपनी भोजन-संगति है। बुंदेली भोजन का अचार विशिष्ट अंग है । जब दाल, साग-सब्जी आदि रोटी के साथ खाने के लिये न रहे, तब अचार ही रोटी का साथ देता है नींबू, आम, कैथा, कमल नाल, सूरन का अचार बुंदेलखंड में रखा जाता है । अचार सामान्य जन की भोजन-व्यवस्था का अनिवार्य अंग है ।

डॉ. नीलम की यह पुस्तक आज इसलिये महत्वपूर्ण है कि हमारा लोकजीवन अब ग्लोबालाईजेशन की चपेट में है । विश्वग्राम का स्वप्न देखते-देखते हम अपने ग्राम को छोड़ रहे हैं। हमारी प्रकृति के अनुरूप जो भोज्य पदार्थ थे वे इतिहास की वस्तु बनते जा रहे हैं । इतिहास भी बिना रिकार्ड के विस्मृति के गर्भ में चला जाता है । फिर इतिहास कयासों में जीवित रहता है । बुंदेलखंड के भोजन से संबंधित यह डाक्यूमेंटेशन महत्वपूर्ण इसलिये है कि समय रहते लेखिका ने विस्मृत होती है। पाक-विधियों को सुरक्षित कर लिया है। नयी पीढ़ी जिन भोज्य चोष्य और लेह्य भोज्य पदार्थों से परिचित नहीं है । उनका उल्लेख इस पुस्तक में है । यह पुस्तक आश्वस्त करती है कि बुंदेली पाकविधियां न केवल बुंदेलखण्ड में अपनी पहचान कायम किये रहेंगी, बल्कि इस पुस्तक के माध्यम से ये अन्य अंचलों तक अपना महत्व प्रसारित करेंगी । लेखिका ने प्रत्येक पाक - विधि का संगोपांग विवेचना व्यवहारिक रूप में किया है । आवश्यक सामग्री, उसकी मात्रा, उनको मिश्रित करने पकाने की विधि के साथ उसकी तापीय स्थितियों तक का जिक्र इस पुस्तक में है । यह पुस्तक बुंदेलखंड में एक रेडी रेकनर की तरह रहना चाहिये ताकि गृहणियां अपने स्थानीय पकवानों, भोजन और ओदन संबंधी परंपराओं को पुनर्जीवन दे सकें । लेखिका ने इस पुस्तक को वैज्ञानिक स्तर पर भी अपटूडेट किया है । प्रत्येक भोज्य पदार्थ की पौष्टिकता का संकेत आधुनिक दृष्टि से प्रस्तुत किया गया है। इसलिये यह पुस्तक गृह-विज्ञान जैसे विषय को पढ़ने वाली छात्र-छात्राओं के लिये भी उपयोगी हैं । पुस्तक के अंत में पौष्टिक आहार संबंधी जानकारियां एवं टिप्स इस पुस्तक को

लोक-शिक्षा की दिशा में एक स्थायी कदम निरूपित करने वाले हैं । पुस्तक की भाषा, सहज और सरल है - बोधगभ्यता इसकी मूल्य-चेतना है । इसे पढ़कर आम ग्रामीण भी इससे लाभाविन्त हो सकता है ।

डॉ. प्रेमलता नीलम का यह कार्य उन्हें यह श्रेय देता है कि वे अपनी परंपराओं के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हैं और उन्हें सुरक्षित रखने का भरसक प्रयास कर रही हैं- न केवल सुरक्षित रखने का बल्कि उन्हें आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टि के आलोक में पुनर्परीक्षित करने का उन्होंने साहस इस कृति में जुटाया है। इतने अच्छे कार्य के लिये मैं उन्हें बधाई देता हूँ और मंगलमय से कामना करता हूँ कि वे इस तरह के अन्य कार्यों का सिलसिला आगे बढ़ाती रहें और बुंदेली जन-जीवन की जागृति का हिस्सा बनती रहें ।

भीमसेनी एकादशी 2012
श्यामसुंदर दुबे
निर्देशक
मुक्तिबोध सृजन पीठ
डॉ. हरीसिंह केन्द्रीय विश्वविद्यालय, सागर (म.प्र.)

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